नेत्रहीनता को नहीं बनने दिया अभिशाप

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बालूजी श्रीवास्तव के आँखों की रोशनी महज़ चार साल की उम्र में चली गई, लेकिन आज वे सितार वादक के रूप में दुनिया भर में मशहूर हैं.

इतना ही नहीं उन्होंने अपने जैसे नेत्रहीन लोगों का एक बैंड भी बनाया है.

उनके बैंड का नाम है इनर विज़न ऑर्केस्ट्रा. बैंड की स्थापना का उद्देश्य था नेत्रहीन लोगों के मनोबल को बढ़ाना. बालूजी अपने उद्देश्य में कामयाब रहे हैं. उनके बैंड के लोगों को अब अलग-अलग काम भी मिलने लगा है.

इनर विजन ऑर्केस्ट्रा के सदस्य कार्यक्रम के दौरान नज़रों-नज़रों में तालमेल नहीं बिठा पाते हैं लेकिन हर कोई अपने काम को बख़ूबी अंजाम देता है.

बालूजी कहते हैं, "हम लोगों का आपसी तालमेल अभ्यास से पैदा हुआ है."

वो ख़तरनाक हादसा

दरअसल, अलग-अलग वाद्य यंत्रों को संभालने वाले कलाकार अपने वादन के क्रम को याद रखते हैं. ये उनकी कामयाबी का राज़ है.

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बालूजी के जीवन का सफ़र अविश्वसनीयता से भरा है. उत्तर प्रदेश में उनका जन्म हुआ. आठ महीने के थे, तब मोतियाबिंद हो गया.

पड़ोस में रहने वाली एक औरत ने उनकी माँ को दवा के नाम पर अफीम की गोली आँखों में डालने को दे दी. तीन दिन के बाद उनके एक आँख की रोशनी चली गई और दूसरी आँख की रोशनी कम हो गई.

लेकिन वे पैदाइशी संगीतकार थे. 18 महीने की उम्र से ही गाना शुरू कर दिया. माँ ने उन्हें हॉरमोनियम बजाना सिखाया. इसके बाद बालूजी ने अजमेर के ब्लाइंड स्कूल से पढ़ाई पूरी की.

नेत्रहीनता बनी वरदान

स्कूल में उन्होंने संगीत की उस्तादी हासिल की. आठ साल की उम्र में उन्होंने सितार बजाना शुरू किया, तो फिर वे सितार के ही होकर रह गए.

दस साल की उम्र में उन्होंने अपने स्कूल के कार्यक्रम में सितार बजाया. पढ़ाई जारी ही थी कि परिवार को कारोबार में घाटा उठाना पड़ा. इसके बाद बालूजी ने बेंत की कुर्सियां बीनने का काम किया, ताकि ख़र्च चल सके.

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20 साल की उम्र के बाद सितार में मास्टर की डिग्री हासिल करने के बाद बालूजी फ्रांस चले गए और उसके बाद ब्रिटेन.

बालूजी मानते हैं कि भारत में नेत्रहीन को लेकर परिवारों और समाज का रवैया ठीक नहीं है. वे मानते हैं कि नेत्रहीनता उनके लिए अभिशाप नहीं वरदान साबित हुई.

बालूजी के मुताबिक़ अगर वे नेत्रहीन नहीं होते तो अपनी क्षमता को संगीत में विशेषज्ञता हासिल करने में नहीं लगा पाते.

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