भारत की बड़ी भूमिका में पाक अड़ंगा?

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पाकिस्तान के उर्दू मीडिया में भारत और पाकिस्तान के रिश्तों की टकराहट लगातार सुनाई दे रही है.

नवाए वक़्त ने पाकिस्तानी सरकार के इस रुख़ को सराहा है कि अब वो बातचीत की बहाली के लिए भारत से कोई संपर्क नहीं करेगी.

अख़बार के मुताबिक़ जब तक भारत सीमा पर तनाव बढ़ाने वाले क़दम उठाने से बाज़ नहीं आता, जब तक उससे बातचीत करने का कोई मतलब नहीं है.

वहीं रोज़नामा एक्सप्रेस ने अपने संपादकीय से भारत से कहा है कि वो अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के लिए अमरीका के विशेष प्रतिनिधि डेनियल फील्डमैन के हालिया बयान पर ग़ौर करे.

इसमें उन्होंने कहा था कि अगर भारत विश्व स्तर पर बड़ी भूमिका निभाना चाहता है तो पहले उस पाकिस्तान से रिश्ते बेहतर करने होंगे.

'बंद हो सियासी इंतक़ाम'

इसी बयान के सिलसिले में दैनिक दुनिया की टिप्पणी है कि कश्मीर मुद्दे के हल में अगर अमरीका सीधे तौर पर कोई भूमिका अदा नहीं कर सकता है तो उसे से कम ये सुनिश्चित करना चाहिए कि भारत पाकिस्तान के साथ बातचीत की मेज़ पर बैठे और बेबुनियादी बातों को बुनियाद बना कर कश्मीर मुद्दे से न भागे, क्योंकि इस मुद्दे के हल होने से दक्षिण एशिया में स्थायी शांति क़ायम होगी.

वहीं उम्मत ने बिजली की क़ीमतों में वृद्धि पर संपादकीय लिखा है- मरे और मारे शाह मदार.

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Image caption मोतीउर रहमान निज़ामी का संबंध बांग्लादेश की धार्मिक पार्टी जमात-ए-इस्लामी से रहा है

बांग्लादेश में एक इस्लामी नेता को 1971 के युद्ध के दौरान युद्ध अपराधों के लिए मिली मौत की सज़ा पर जंग का संपादकीय है- अब सियासी इंतक़ाम बंद हो जाना चाहिए.

अख़बार कहता है कि बांग्लादेश की सरकार उन लोगों को लगातार निशाना बना रही है जिन्होंने पाकिस्तान के विभाजन को रोकने के लिए पाकिस्तानी सरकार और पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था.

अख़बार सवाल करता है कि अगर अब बांग्लादेश के किसी हिस्से में देश से अलग होने का आंदोलन शुरू हो जाए तो क्या वहां की सरकार उसे नाकाम बनाने वालों को मुजरिम क़रार देगी.

'खोदा पहाड़ निकला चूहा'

रुख़ भारत का करे तो हिंदोस्तान एक्सप्रेस का संपादकीय है शाही दस्तारबंदी.

अख़बार लिखता है कि शाही इमाम ने अपने बेटे की दस्तारबंदी में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को तो न्यौता दिया है लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नहीं, जिस पर भाजपा ने शाही इमाम की आलोचना की है.

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Image caption मोदी को शाही इमाम ने नहीं भेजा न्यौता

लेकिन शाही इमाम की तरफ़ से भाजपा के राजनाथ सिंह, हर्षवर्धन और विजय गोयल को निमंत्रण दिए जाने पर अख़बार लिखता है कि इन नेताओं की मुश्किल ये है कि अब प्रधानमंत्री को नज़र अंदाज़ करने वाले कार्यक्रम में कैसे जाएं.

काले धन पर जारी घटनाक्रम पर राष्ट्रीय सहारा लिखता है कि 2006 में जब स्विस बैंकों में काला धन रखने वालों के नाम बताने की दरख़्वास्तों का सिलसिला शुरू हुआ तो रक़म 23 हज़ार करोड़ रुपए बताई गई, अब जब मामला खुल कर सामने आ रहा है तो मालूम होता है कि रक़म घट कर नौ हज़ार करोड़ रुपए रह गई है.

अख़बार इस बात पर हैरान है कि वित्त मंत्रालय ये बताने को भी तैयार नहीं है कि ये नौ हज़ार करोड़ रुपए भी भारत कब आएंगे, और आएंगे भी या नहीं. अब इसे खोदा पहाड़ निकला चूहा ही कहना होगा.

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