पूर्वी जर्मनी ने अपने लोग 'बेचे' थे 'दुश्मन' को..

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शीतयुद्ध के ज़माने में पूर्वी जर्मनी से भागने की कोशिश करने वालों को गोली मारी जा सकती थी, जेल में डाला जा सकता था या उनका उत्पीड़न हो सकता था.

लेकिन सरकार के पैसों की इस क़दर कमी थी कि उसने कई लोगों को पश्चिम जर्मनी को बेच दिया. हैरानी का बात यह है भागने वाले लोगों की शरण की पहली पसंद भी पश्चिम जर्मनी ही था.

पूर्वी जर्मनी से कैसे होती थी यह मानव तस्करी और पश्चिम जर्मनी जानते-बूझते क्यों दे रहा था अपने 'दुश्मन' देश का साथ.

पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के बीच मानव तस्करी पर गेविन हेन्स की रिपोर्ट

डेनिएला वॉल्थर 13 अगस्त 1961 की वह रात याद करती हैं, जब वह पूर्वी बर्लिन से भागने के प्रयास में पकड़ी गई थीं. वह तब पांच साल की थीं.

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वह बताती हैं, "मैंने खुद को एक पुलिस स्टेशन में पाया. वहां मैं अकेली लड़की थी और मुझे याद है एक पुलिसवाला मुझसे कह रहा था, ''तुम क्यों नहीं रो रही हो?'' मैं अब जब उसके शब्द याद करती हूं तो खुद से पूछती हूँ, हां, मैं रो क्यों नहीं रही थी. शायद मैं सदमे में थी."

वह बताती हैं कि दो दिन पहले ही एक पत्रिका में पत्रकार उनके पिता यह गोपनीय ख़बर लाए थे कि जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक (जीडीआर) के अधिकारी पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन की सीमा बंद करने जा रहे हैं.

वॉल्थर बताती हैं, "वह जानते थे कि वहां दीवार बनने जा रही है."

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यह दीवार बनी और 25 साल पहले नौ नवंबर 1989 को इसे गिरा दिया गया.

यह जानते हुए कि दीवार बनने के बाद पश्चिम जर्मनी जाना लगभग नामुमकिन हो जाएगा, वॉल्थर के पिता उसकी मां को समझाने में सफल रहे कि यहां से भागने का यह सही समय है.

वॉल्थर कहती हैं, "वह शिक्षिका की नौकरी नहीं छोड़ना चाहती थी, लेकिन आख़िर वह राजी हो गईं."

वह बताती हैं, "मेरे पिता ने हमें बताया था कि हमें कहां से सीमा पार जाना है. 11 अगस्त की रात हम वहां किसी दूसरे के शेड में सो रहे थे. मुझे याद है मेरी मां मुझे चुप रहने के लिए कह रही थीं. मैं डरी हुई थी."

गिरफ़्तारी

अगली शाम वॉल्थर के पिता उन्हें उस जगह ले गए जहां से सीमा पार जाना आसान था पर वहां भी ज़बर्दस्त पहरा था.

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वह कहती हैं, "वह सबसे आगे थे और मेरी मां से पीछे-पीछे आने को कह रहे थे, लेकिन उनमें इतनी हिम्मत नहीं थी- वह वहीं जमी रहीं. मैं उनके बगल में खड़ी थी और अपने पिता की आवाज़ सुन रही थी."

फिर वहां सुरक्षा गार्ड आ गए. "वे मेरे पिता को गिरफ़्तार कर ले गए. फिर मैंने उन्हें अगले आठ साल तक नहीं देखा."

वॉल्थर और उनकी मां को भी गिरफ़्तार कर पुलिस स्टेशन ले जाया गया. उनकी मां को नौ महीने जेल की सज़ा हुई, जबकि वॉल्थर को उनके दादा-दादी के पास भेज दिया गया.

वह कहती हैं, "सीमा पार कर भागने की कोशिश करने वाले की बेटी होना एक हत्यारे की बेटी होने से भी बुरा था."

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Image caption बर्लिन में बर्लिन वार मैमोरियल बनाया गया है. 1961 में पूर्वी जर्मनी ने इस दीवार को बनवाया था.

मेरे दादा-दादी ने मुझसे कहा, "अगर कोई पूछे तो बताना कि तुम लिलो की बेटी हो. लिलो पश्चिमी जर्मनी में मेरी आंटी थी.''

वॉल्थर जल्द ही अपने नए जीवन में रम गईं. उनके दादा के पास बहुत सारे जानवर थे. उन्होंने स्कीईंग भी सीखी.

जब उनकी मां आज़ाद हुईं तो दोनों पोत्सदाम चले गए.

हालात ख़राब

इस बीच, पूर्वी जर्मनी की आर्थिक हालत लगातार खस्ता हो रही थी. बड़ी संख्या में मज़दूर और बुद्धिजीवी देश छोड़ गए थे और सोवियत संघ ने भी सहायता बंद कर दी थी.

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1964 तक महंगाई का हाल इतना बुरा हो गया था कि अधिकारियों ने राजनीतिक क़ैदियों को पश्चिम जर्मनी को बेचने की योजना बना डाली.

1964 से 1989 तक 33,755 राजनीतिक क़ैदियों और उनके ढाई लाख रिश्तेदारों को 350 करोड़ डॉयचे मार्क्स में पश्चिम जर्मनी को बेच दिया गया.

"इस कारोबार में दोनों ही देशों की दिलचस्पी थी- जीडीआर की इसलिए क्योंकि उसे पश्चिमी मुद्रा चाहिए थी और पश्चिम जर्मनी अमानवीय व्यवहार के शिकार लोगों को बचाना चाहता था."

क़ैदियों को कॉफ़ी, तांबा और तेल के बदले भी बेचा जाता था.

हालांकि दोनों देश इसे छिपाना चाहते थे. जीडीआर इसलिए क्योंकि वह कमज़ोर नहीं दिखना चाहता था और पश्चिम जर्मनी इसलिए क्योंकि वह साम्यवादी शासन की मदद में साथ नहीं दिखना चाहता था.

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