थार: अकाल, भूख और अवसाद से जंग

  • 8 नवंबर 2014
थार रेगिस्तान अकाल

पाकिस्तान के थार मरुस्थल में मौत की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं. ग़रीब लोग भूख के अलावा मानसिक अवसाद के भी शिकार हो रहे हैं.

इलाक़े से बाहर रोज़गार की तलाश में गए कुछ नौजवानों ने काम न मिलने पर आत्महत्या कर ली है.

डॉक्टरों का मानना है कि आम लोग जब बाहरी इलाक़ों से लौटते हैं तो वो अवसादग्रस्त हो जाते हैं.

इलाज़ के लिए ग़रीबों को अपने पशु और दूसरे सामान बेचने पड़ रहे हैं.

रियाज़ सोहैल की रिपोर्ट

चमू मीघवाड़ इस साल अकाल के साथ ही एक और सदमा झेल रहे हैं. अकाल ने पहले हरियाली, बाद में पशु और कुछ दिन पहले उनका जवान बेटा छीन लिया.

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पाकिस्तान में थार मरुस्थल की तहसील चहाछरू के गांव चहापुर दीन मोहम्मद के 60 वर्षीय चमू के जवान बेटे ने 15 दिन पहले कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली थी.

चमू बताते हैं कि उनका 21 वर्षीय बेटा राय मिल मज़दूरी के लिए बैराज क्षेत्र में गया था पर रोज़गार नहीं मिला और वापस आ गया. उसके बाद उसके दिमाग़ में गड़बड़ी हो गई थी.

वे कहते हैं, "पता नहीं क्या हुआ, उसने कुएं में छलांग लगा दी. मैं उसकी मौत का ज़िम्मेदार किसी को नहीं मानता. बस, मेरा भाग्य ही खराब था."

'गंभीर स्थिति'

पति, पत्नी और आठ बेटों के इस परिवार के पास छह भेड़ें, दो बकरियां और ऊंट की एक जोड़ी बाक़ी है, जिन्हें वे पेड़ों से पत्ते तोड़कर खिलाते हैं.

चमू कहते हैं कि जानवर भी भूखों मर रहे हैं. घटना के बाद जो दूसरे बच्चे बैराज क्षेत्रों में गए थे, वह भी वापस आ गए हैं.

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थार के मरुस्थल में इस साल आत्महत्या की घटनाओं में वृद्धि हुई है.

ग़ैर-सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर वाटर एंड एप्लाइड एजुकेशन एंड रिन्यूएबल एनर्जी के निदेशक अली अकबर राएमू कहते हैं कि स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2012 में 24 लोगों ने आत्महत्या की थी और इस साल 10 महीने में 41 लोग अपनी जान ले चुके हैं.

आत्महत्या करने वालों में 90 प्रतिशत हिंदू हैं, जिनमें साक्षरता दर बहुत कम है. इस कारण अकाल उनके लिए भयानक परिणाम लाता है. इससे बचने के लिए ये लोग माल-मवेशियों सहित बैराज क्षेत्रों की ओर पलायन करते हैं.

'पशुओं पर गुज़ारा'

अघरू मीघवाड़ नगर पार्कर बस से पांच घंटे का सफ़र तय कर उमरकोट में डॉक्टर के पास पहुंचे थे.

किराए, डॉक्टर की फ़ीस और दवा ख़रीदने के लिए उन्हें तीन में से एक गाय को सात हज़ार रुपए में बेचना पड़ा.

अघरू के चार बच्चे हैं, उनमें से केवल एक मैट्रिक पास है और वह भी बेरोज़गार है. बात करते समय उनका दायां हाथ लगातार कांप रहा था.

वह बताते हैं कि बारिश के बाद कुछ काम धंधा होता था, लेकिन इन दिनों खाली बैठे हैं. कुछ पशु हैं जिन पर गुज़ारा हो रहा है.

डॉ लकेश खत्री थार और आसपास के क्षेत्र में एकमात्र डॉक्टर हैं.

उनका कहना है कि अघरू मीघवाड़ अवसाद के शिकार हैं.

वे कहते हैं, "अकाल के परिणामस्वरूप आर्थिक दबाव ने लोगों पर मानसिक दबाव बढ़ा दिया जिससे अवसाद रोगियों में वृद्धि हो रही है. इसलिए आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं."

'भूख से कोई नहीं मरा'

डॉ लकेश के अनुसार अकाल के कारण लोगों के पास पैसे नहीं हैं, आहार की बेहद कमी है इससे मानसिक विकास भी प्रभावित होता है.

वे कहते हैं, "पीड़ित जब बैराज क्षेत्रों में जाते हैं तो वहां देखते हैं कि लोगों के पास इतना कुछ है और उनके पास खाने तक को नहीं. इससे उनमें हीन भावना पैदा होती है. ऐसे में कुछ लोग यह सोचते हैं कि ऐसे जीवन से बेहतर है कि उसे ख़त्म कर दिया जाए."

थार में भोजन की कमी के कारण महिलाओं में ख़ून की कमी आम है. नतीजतन बच्चे कमज़ोर पैदा होते हैं.

हर दूसरे दिन यहां से बच्चों की मौत की ख़बरें आ रही हैं लेकिन सिंध सरकार का कहना है कि किसी भी बच्चे की मौत भूख के कारण नहीं हुई क्योंकि प्रति परिवार 50 किलो गेहूं दिया गया है.

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