अराफ़ात की ख़ाली पिस्तौल का राज़

  • 8 नवंबर 2014
यासेर अराफ़ात, इंदिरा गांधी इमेज कॉपीरइट PHOTO DIVISION

13 नवंबर 1974. न्यूयॉर्क के संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में उस दिन काफ़ी कड़ी सुरक्षा थी.

फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन के प्रमुख यासिर अराफ़ात को संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्लेनरी सत्र में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया था.

पहली बार किसी राष्ट्र का नेतृत्व न करने वाले शख़्स को ये सम्मान हासिल होने वाला था.

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उस ज़माने में अराफ़ात के क़रीबी और बाद में फ़लस्तीनी प्रशासन के पहले विदेश मंत्री नबिल शाथ को वह दिन अभी तक याद है.

वो कहते हैं, "अराफ़ात ने पहली बार वह चीज़ मानी थी जो उन्होंने पहले कभी भी स्वीकार नहीं की थी. उन्होंने अपनी दाढ़ी पूरी तरह से साफ़ करा दी थी और नया सूट भी पहना था. उनके ख़ाकी सूट पर बहुत ढंग से प्रेस की गई थी और वह बिल्कुल चमक रहे थे."

उस दिन अराफ़ात न्यूयॉर्क हवाई अड्डे से हैलिकॉप्टर से सीधे संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पहुंचे थे.

ठीक उसी समय कारों का एक काफ़िला वॉलडॉर्फ़ एस्टोरिया होटल की तरफ़ रवाना हुआ था ताकि अराफ़ात के विरोधियों को ये आभास दिया जाए कि वह कार के ज़रिए अपने होटल जा रहे हैं.

'जैतून की शाख'

उस दिन अराफ़ात ने अपने भाषण का अंत दो यादगार वाक्यों से किया था. वह बोले, "मैं यहां जैतून की शाख और स्वतंत्रता सेनानी की बंदूक लिए आया हूँ. मेरे हाथ से जैतून की इस शाख को गिरने मत दीजिए."

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अगले दिन यह भाषण दुनिया के हर बड़े अख़बार की सुर्ख़ी बना और उस भाषण के नौ दिन के भीतर संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपना प्रस्ताव नंबर 3237 पारित कर पीएलओ को संयुक्त राष्ट्र में पर्यवेक्षक का दर्जा दे दिया.

अराफ़ात छोटे क़द के शख़्स थे. सिर्फ़ पाँच फ़ुट चार इंच लंबे या शायद इससे भी छोटे! उनकी शक्ल ऐसी दिखती थी मानो उन्हें तुरंत नहाने की ज़रूरत है.

भारत के पूर्व राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र उप महासचिव चिनमय गरेख़ान को उनसे कई बार मिलने का मौका मिला था.

वह कहते हैं, "अराफ़ात से मेरी कई बार मुलाक़ात हुई... कह सकते हैं.. सैकड़ों बार, क्योंकि मैं संयुक्त राष्ट्र की तरफ़ से गज़ा में तैनात था. वह बहुत चार्मिंग हो सकते थे अगर वो चाहते. उनकी छोटी दाढ़ी होती थी और वह हमेशा फ़ौजी लिबास में होते थे.''

"सीधे इंसान थे. लेकिन जहाँ तक फ़लस्तीनी आंदोलन या इसराइल के साथ संबंधों की बात थी, उसे वह बहुत गंभीरता से लेते थे और शंका की दृष्टि से देखते थे."

अराफ़ात का परिवार

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गरेख़ान कहते हैं कि उन्होंने बहुत देर से शादी की. पहले तो कहा करते थे कि उनकी शादी तो फ़लस्तीन से है. बाद मे उन्होंने सुहा से शादी की.

"सुहा ईसाई थीं जबकि अराफ़ात सुन्नी मुसलमान थे. कहते हैं कि सुहा अराफ़ात को बहुत चाहती थीं. उनकी एक बच्ची भी थी जो अब बड़ी हो गई होगी."

वह गज़ा में बहुत साधारण और छोटे से घर में रहते थे, जिसमें दो मंज़िलें थीं. अराफ़ात पहली मंज़िल पर रहते थे और ग्राउंड फ़्लोर पर उनकी पत्नी रहती थीं अपनी बच्ची के साथ.

अराफ़ात की जीवनी लिखने वाले ऐलन हार्ट लिखते हैं कि अराफ़ात चाहे जहां भी हों, कुछ भी कर रहे हों, या किसी के भी साथ हों... वह एक जगह स्थिर होकर नहीं बैठ सकते थे.

वह दो पारियों में सोया करते थे. सुबह चार बजे से सात बजे तक और शाम को चार से छह बजे.. इसलिए आधी रात के समय अराफ़ात अपनी सर्वश्रेष्ठ फ़ॉर्म में रहा करते थे.

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गरेख़ान कहते हैं, "जब भी उनसे अप्वाइंटमेंट मांगो या मिलने को कहो, तो कभी भी मना नहीं करते थे और हमेशा रात को 11-12 बजे ही मिलते थे और रात को ही वो सबसे ज़्यादा अलर्ट रहते थे."

पिस्टल का राज़

अराफ़ात हमेशा अपनी कमर में पिस्टल लटका कर चलते थे. जब वह पहली बार संयुक्त राष्ट्र में भाषण देने गए तो उनसे कहा गया कि सभागार में हथियार ले जाने की मनाही है.

समझौता इस बात पर हुआ कि वह अपनी ख़ाकी वर्दी पर पिस्टल का होल्सटर तो लगाए रहेंगे, लेकिन इसमें पिस्टल नहीं होगी.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी को उनसे कई बार मिलने का मौका मिला था.

येचुरी बताते हैं, "अराफ़ात को भी फ़िदेल कास्त्रो की तरह ज़ोर से गले लगाने की आदत थी. एक बार काहिरा में जब वह मुझसे गले मिले तो मेरे पास उनकी कमर पर बंधी पिस्टल को निकाल लेने का बहुत अच्छा अवसर था. मैंने उनसे कहा भी कि आप सावधान क्यों नहीं रहते. कोई भी यह काम कर सकता है."

"इस पर उन्होंने कहा कि एक राज़ की बात बताऊँ, इस पिस्टल में कोई गोली नहीं है. मैंने उनसे पूछा कि तब आप पिस्टल क्यों रखते हैं? इस पर अराफ़ात ने कहा कि क्योंकि मेरे पास पिस्टल है कई लोग जो मुझ पर गोली चलाना चाहते हैं, वह ऐसा करने से पहले सौ बार सोचते हैं."

'बड़ी बहन'

यासिर अराफ़ात अपनी हवाई यात्रा को बहुत गुप्त रखते थे और मेज़बान देश को पहले से नहीं बताया जाता था कि वह वहाँ आने वाले हैं. उनका अक्सर भारत आना होता था.

वह इंदिरा गाँधी को अपनी बहन मानते थे.

चिन्मय गरेख़ान याद करते हैं, "जब भी अराफ़ात यहाँ आते थे पहले से हमें बताते नहीं थे. एक-दो घंटे पहले ही ख़बर आती थी कि वह आ रहे हैं. इसके बावजूद इंदिरा गांधी उन्हें हमेशा रिसीव करने हवाई अड्डे पर जाती थीं. वह हमेशा इंदिरा गांधी को 'माई सिस्टर' कह कर पुकारते थे."

1983 में भारत में जब गुटनिरपेक्ष देशों का शिखर सम्मेलन हुआ तो वह इस बात पर नाराज़ हो गए कि उनसे पहले जॉर्डन के शाह को भाषण देने का मौका दिया गया.

भारत के पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह उस सम्मेलन के महासचिव थे.

नटवर कहते हैं, "उस सम्मेलन में सुबह के सत्र में फ़िदेल कास्त्रो अध्यक्ष थे. उसके बाद इंदिरा गांधी अध्यक्ष बन गईं थीं. सुबह के सत्र के बाद मेरे डिप्टी सत्ती लांबा मेरे पास दौड़े हुए आए और बोले कि बहुत बड़ी आफ़त आ गई है. यासिर अराफ़ात बहुत नाराज़ हैं और तुरंत ही अपने विमान से वापस जाना चाहते हैं. मैंने इंदिरा जी को फ़ोन किया और कहा कि आप फ़ौरन विज्ञान भवन आ जाइए और अपने साथ फ़िदेल कास्त्रो को भी लेते आइए."

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"कास्त्रो साहब आए और उन्होंने फ़ोन कर यासिर अराफ़ात को बुला लिया. उन्होंने अराफ़ात से पूछा कि आप इंदिरा गाँधी को अपना दोस्त मानते हैं कि नहीं. अराफ़ात ने कहा, दोस्त नहीं... वो मेरी बड़ी बहन हैं. इस पर कास्त्रो ने तपाक से कहा तो फिर छोटे भाई की तरह बर्ताव करो और सम्मेलन में भाग लो."

अराफ़ात मान गए और शाम के सत्र में भाग लेने के लिए पहुंच गए.

'चुनाव प्रचार का प्रस्ताव'

राजीव गांधी के साथ भी उनकी बहुत घनिष्टता थी. कहा जाता है कि एक बार उन्होंने भारत में राजीव गांधी के लिए चुनाव प्रचार करने की पेशकश की थी.

चिन्मय गरेख़ान कहते हैं कि राजीव गाँधी बहुत भावुक थे. इंदिरा यथार्थवादी थीं और उनका तजुर्बा भी अधिक था.

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गरेख़ान कहते हैं, "राजीव गांधी जब भी अराफ़ात से मिलते थे, तो ज़ोर से गले लगते थे. अराफ़ात ने मुझे ख़ुद बताया था कि उन्होंने राजीव के लिए चुनाव प्रचार करने का ऑफ़र किया था. मुझे लगता है कि राजीव गाँधी इस पेशकश से नाख़ुश नहीं थे."

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