बर्मा में चीन को हरा पाएगा भारत?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह के लिए दक्षिण एशिया में भारत के पड़ोसी देशों को आमंत्रित किया. मगर इनमें म्यांमार यानी बर्मा शामिल नहीं था.

अब मोदी बर्मा में 12-13 नवंबर को हो रहे नौवें पू्र्व एशिया शिखर बैठक में हिस्सा लेने जा रहे हैं.

मोदी का दौरा कई मायनों में अहम है. ख़ासकर तब जब बर्मा अपने गैस भंडारों और रणनीतिक स्थिति की वजह से क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता का इलाक़ा बन गया है.

भारत-बर्मा सीमा पर चरमपंथ, बर्मा के गैस रिज़र्व से लेकर उत्तर पूर्व एशिया के लिए बर्मा को सेतु की तरह देखने तक भारत अपनी विदेश नीति में कई स्तरों पर सुधार चाहता है.

‘ऐक्ट ईस्ट’

शायद यही वजह है कि सालों पुरानी ‘लुकिंग ईस्ट’ पॉलिसी के बाद अब मोदी सरकार ‘ऐक्ट ईस्ट’ पॉलिसी की बात कर रही है.

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1857 के ग़दर में भागीदारी की वजह से ब्रिटिश शासकों ने आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र को रंगून निष्कासित कर दिया था. जहां उनकी मौत हुई और उनका मक़बरा आज भी मौजूद है.

मगर बर्मा और भारत के रिश्ते ऐतिहासिक रहे हैं. देश की आधे से ज़्यादा आबादी बौद्ध धर्म की थेरवाद शाखा का पालन करती है.

इसके अलावा भारतीय फ़िल्मों में उस रंगून की याद को ज़िंदा रखा गया, जो 1935 से पहले 'ब्रिटिश इंडिया' का हिस्सा था.

चीन और चरमपंथ

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भारत और बर्मा के संबंध कई साल अच्छे रहे पर जब बर्मा में लोकतंत्र को स्थगित कर सैन्य शासकों ने सत्ता संभाली तो भारत के साथ उसके राजनीतिक रिश्तों में भी खिंचाव आ गया. ये खिंचाव वाजपेयी सरकार के समय ख़त्म हुआ जब सरकार ने बर्मा पर चीन के बढ़ते असर को महसूस किया.

बर्मा में राजदूत रहे राजीव भाटिया कहते हैं, ‘‘इसमें कोई शक नहीं कि बरसों पहले 1954-55 के समय के एम पणिक्कर ने कहा था कि बर्मा की सुरक्षा भारत की सुरक्षा है. अगर बर्मा पर कोई नियंत्रण स्थापित कर लेता है, तो वह भारत के लिए घातक हो सकता है. इसीलिए हम शुरू से मानकर चलते रहे हैं कि हमें बर्मा में अच्छी उपस्थिति रखनी चाहिए.’’

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चीन के असर के अलावा भारत बर्मा के साथ लगी अपनी पूर्वोत्तर सीमा पर चरमपंथ से भी परेशान रहा है.

हालांकि चरमपंथी गतिविधियां 1990 के दशक के मुक़ाबले कम हैं पर ड्रग्स कारोबार और दूसरी ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों को लेकर भारत की चिंताएं अब भी बरक़रार हैं.

भारत चाहता है कि बर्मा इन पर अंकुश लगाए. इसी के चलते हाल ही में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने आसियान विदेश मंत्रियों की बैठक में बर्मा के विदेश मंत्री के सामने यह मामला उठाया था.

पूर्वोत्तर

विदेश मामलों के विशेषज्ञ और पूर्व राजदूत रंजीत गुप्ता का मानना है कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में जब तक विकास की समस्याएं हैं तब तक ये चिंताएं परेशान करती रहेंगी. इसलिए पहले अपना घर ठीक करना ज़रूरी है.

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वह कहते हैं, ‘‘जो नगा अल्फ़ा लोग रहते हैं, उन्होंने म्याँमार सरकार, सेना और नागरिक का विरोध कुछ नहीं किया और जहां वे डेरा बनाते हैं वो म्याँमार का कम विकसित क्षेत्र है तो वो म्याँमार के लिए खतरा नहीं है. ऐसे में म्याँमार एक और लड़ाई क्यों मोल ले.’’

सुरक्षा जानकार मानते हैं कि अगर पूर्वोत्तर राज्यों में विकास पर ध्यान दिया जाए तो न केवल भारत चरमपंथ पर अंकुश लगा सकता है बल्कि कारोबार के ज़रिए दक्षिण पूर्व एशिया के बाज़ारों तक पहुंच सकता है.

मगर भारत में रहने वाले बर्मी समुदाय को लगता है कि उनके मुल्क में पहले अमन होना चाहिए. तभी हालात सुधरेंगे.

लोकतंत्र

दिल्ली में रह रहे बर्मा के शरणार्थियों की संस्था चिन रिफ़्यूजी कमेटी के अध्यक्ष बियाक था ह्मुन मानते हैं कि भारत सरकार को लोकतंत्र के लिए बर्मा सरकार पर दबाव बनाना चाहिए. उनका कहना है कि भारत इस दिशा में बहुत कुछ कर सकता है.

बर्मा में सैन्य शासन से लोकतंत्र में स्थानांतरण को भारत भी ज़रूरी मानता है. विश्लेषक मानते हैं कि बर्मा में राजनीतिक स्थायित्व का फ़ायदा भारत को उसके कारोबार में मिल सकता है.

भारत बर्मा के रास्ते दक्षिण पूर्व एशिया के बाज़ारों तक अपनी पहुंच बना सकता है. भारत के लिए दूसरा बड़ा सवाल बढ़ती बिजली ज़रूरतों के लिए बर्मा के प्राकृतिक गैस भंडारों तक अपनी पहुंच बनाना है, जिसमें फ़िलहाल चीन ने भारत से बाज़ी मार ली है.

विश्लेषकों को लगता है कि भारत की 'ऐक्ट ईस्ट' नीति प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के बाद शायद किसी सकारात्मक नतीजे तक पहुंच सकती है.

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