'अगर मेरा क़त्ल कर दिया गया'

  • 18 नवंबर 2014
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किताब का नाम: अगर मेरा क़त्ल कर दिया गया

लेखक: ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो, पृष्ठ: 336, मूल्य: 800 रुपये, प्रकाशक: भुट्टो लीगेसी फ़ाउंडेशन, 119, तारिक़ ब्लॉक, न्यू गार्डन, लाहौर.

कोई 35 साल पहले प्रकाशित होने वाली यह किताब दरअसल उस श्वेत पत्र का जवाब है जो जनरल ज़ियाउल हक़ की सैनिक सरकार ने ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो और उनके शासनकाल के बारे में जारी किया था और जिसका उद्देश्य उनकी प्रतिष्ठा के हर पहलू को बर्बाद कर देना था.

भुट्टो 1971 से 1977 तक सिविल चीफ़ मार्शल, एडमिनिस्ट्रेटर, राष्ट्रपति और फिर प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता में रहे और फिर क़त्ल के मुक़दमे में उन्हें चार अप्रैल 1979 को फांसी पर चढ़ा दिया गया.

राजनीतिक पहलू

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Image caption ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की किताब 'अगर मेरा क़त्ल कर दिया गया'

जनरल ज़िया के श्वेत पत्र का बुनियादी मक़सद भी यही था कि जब अदालत से भुट्टो को सज़ा सुनाई जाए तो भुट्टो की पहचान को इतना कमज़ोर कर दिया जाए कि सज़ा के फ़ैसले पर अमल में कोई रुकावट पैदा न हो.

उस वक़्त के पर्यवेक्षक इस बात को लेकर स्पष्ट थे कि जनरल ज़िया और उनके साथी भुट्टो से बहुत भयभीत थे और महसूस करते थे कि भुट्टो उनकी ज़िंदगियों के लिए एक ऐसा ख़तरा थे जिसे जल्द से जल्द ख़त्म कर दिया जाना चाहिए.

शायद भुट्टो भी इस बात को महसूस कर चुके थे, फिर भी उन्होंने अपने दुश्मनों के इस डर को दूर करने की रणनीति अपनाने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं की और अपने ख़िलाफ़ चल रहे मुक़दमे के राजनीतिक पहलू पर अधिक ज़ोर दिया और अदालत में मौजूद अपने विरोधियों का काम आसान कर दिया.

तख़्तापलट

भुट्टो ने ही जनरल ज़िया उल हक़ को चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ बनाया था.

जनरल ज़िया ने पांच जुलाई 1977 को ठीक उस समय उनका तख़्ता पलटा जब वह कथित चुनाव धांधलियों का विरोध कर रहे पाकिस्तान राष्ट्रीय गठबंधन से बातचीत के बाद समझौता करने वाले थे.

हालांकि सुलह के इस समझौते पर हस्ताक्षर होने से कहने को तो तख़्तापलट का औचित्य समाप्त हो जाता, क्योंकि विद्रोह का होना तय था.

और इसकी सूचना एक जनरल समर्थक के माध्यम से भुट्टो को दो दिन पहले ही मिल चुकी थी, लेकिन तब तक जवाबी प्रशासनिक या सैन्य कार्रवाई करने का समय गुज़र चुका था.

प्रकाशन पर पाबंदी

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जनरल ज़िया और उनके सहयोगियों से बेहतर कोई नहीं जानता था कि न तो चुनाव में बड़ी धांधली हुई है और न ही भुट्टो की लोकप्रियता में कोई बड़ी कमी आई है. श्वेत पत्र इसीलिए जारी किया गया था.

भुट्टो रावलपिंडी जेल में थे और श्वेत पत्र का जवाब वहीं से लिख-लिख कर वकीलों के माध्यम से भेजते थे. इस तरह से एक दस्तावेज़ तैयार हो गया जिसे सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया, लेकिन सैन्य सरकार ने पाकिस्तान में इसके प्रकाशन पर पाबंदी लगा दी.

लाहौर के जिस प्रेस ने इस दस्तावेज़ को छापने की कोशिश की उस पर भी छापा पड़ा. सभी प्रतियां ज़ब्त कर ली गईं और ‘रोज़नामा मसावात’ के ख़्वाजा नज़ीर और प्रमुख पत्रकार अब्बास अतहर को देश छोड़ भागना पड़ा.

आंतरिक हालात

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यह दस्तावेज़ ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से लंदन पहुँचा. उसकी प्रतिलिपियां दूतावासों और मीडिया को दी गईं. इसी दस्तावेज़ को दिल्ली के विकास प्रकाशन हाउस ने साल 1979 में किताब की शक्ल में छापा.

सैन्य सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद पाकिस्तान में इस किताब की फ़ोटो स्टेट कॉपी के रूप में चलने लगी.

इस किताब को 35 शीर्षकों में विभाजित किया गया है जिसमें से पहले 20 भागों में ज़्यादातर पाकिस्तान के आंतरिक हालात के बारे में लगाए जाने वाले आरोपों के जवाब दिए गए, जबकि बाक़ी में ज़्यादा अध्याय विदेशी और नीतिगत मामलों से संबंधित हैं.

श्वेत पत्र

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Image caption पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की बेटी थीं.

पहले अध्याय में अगर चुनाव आयोग, ख़ुफ़िया एजेंसियों, चुनावी धांधलियों, सरकारी मशीनरी और कुछ लोगों की सफ़ाई पेश की गई है तो दूसरे हिस्से में बख़्तियार फ़ॉर्मूले और कसूरी हत्याकांड के अलावा अफ़ग़ानिस्तान और भारत से संबंध, निर्गुट सम्मेलन, परमाणु परिशोधन संयंत्र, रबात सम्मेलन का ज़िक्र है.

श्वेत पत्र में अगर भुट्टो की कमियां गिनाई गई हैं तो जवाब में भुट्टो ने भी अपनी तारीफ़ के पुल बांधने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. उनकी नम्रता भी उनके विश्वास से अधिक अहंकारी लगती है.

इसी सिलसिले में एक बेहद उम्दा अध्याय 'कू-जेमोनी' के शीर्षक से लिखा गया है और ख़ासे रहस्योदघाटनों से भरा है.

कराची की हड़ताल

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भुट्टो को पता था कि सेना साल 1958 के मार्शल लॉ के दौरान चक्का जाम करने का सफल अभ्यास कर चुकी है. उन्होंने कराची के चक्का जाम हड़ताल के हवाले से यह बात जनरल ज़िया को भी जता दी थी.

और यह कि जमाते इस्लामी के मियां तुफ़ैल को ग़ैरमुल्की धन की एक भारी-भरकम रक़म दी गई थी जो उन्हें पीएनए की पार्टियों में बांटनी थी.

भुट्टो इस अध्याय में सेना के महत्व का भी जायज़ा लेते हैं और यह भी बताते हैं कि ब्रिटिश राज का अंत हो चुका है और तीसरी दुनिया के देशों के लिए सबसे बुरा जोखिम फ़ौजी बग़ावत है.

पाक का इतिहास

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किताब में ख़ुफ़िया एजेंसियों के बारे में जो सवाल उठाए गए हैं वे आज भी महत्व रखते हैं.

ख़ासकर अब क्योंकि जनरल ज़िया का जारी श्वेत पत्र दुर्लभ हो चुका है और यही किताब इसकी ज़रूरत भी पूरा करती है.

स्क्वैड्रन लीडर (रिटायर्ड) अब्दुल ग़नी शौकत का अनुवाद अच्छा और ख़ासा बेलौस है. प्रूफ़ पढ़ने पर ध्यान अधिक दिया जाना था. पुस्तक उम्दा प्रकाशित हुई है, लेकिन क़ीमत ज़्यादा है.

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