पाकिस्तान की पांच मुश्किलें

  • 22 नवंबर 2014
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पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ़ की सरकार घरेलू मोर्चे पर लगातार सियासी और आर्थिक संकटों का सामना कर रही है.

हाल में पाकिस्तान के स्कूलों पर आई रिपोर्ट हो या ईश निंदा की घटनाएं, देश की चरमराती सामाजिक सेवाओं पर भी सवाल उठे हैं.

सरकार स्वास्थ्य, शिक्षा और अपने ही कामकाज की लाइलाज बीमारियों से बेख़बर दिखाई देती है.

अहमद राशिद का विश्लेषण

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मोटे तौर पर देखें तो पाकिस्तान के सामने पांच बड़ी चुनौतियां हैं. ये हैं सूखे का सवाल, पानी का संकट, पोलियो के बढ़ते मामले, पिछड़ती शिक्षा व्यवस्था और चरमपंथ.

अगर सरकार इन सवालों पर कोई जवाब देती भी है तो उनके बयान समस्याओं की वजह और उनके असर को नकारने की शक्ल में होते हैं.

मीडिया में अपने आलोचकों पर सख्]त रवैया बरतने की बात भी सरकार कहती रही है.

इस्लामाबाद में हाल में हुए संयुक्त राष्ट्र के एक सम्मेलन में पाकिस्तान की 44 फ़ीसदी आबादी के कुपोषित होने की बात उठाई गई, जिसमें 15 फ़ीसदी की हालत तो बेहद खराब है.

थर का सूखा

नतीजतन इस सुस्त पड़ी विकास दर का ख़ामियाजा पांच साल से कम उम्र के एक करोड़ दस लाख बच्चे भुगतेंगे.

संयुक्त राष्ट्र के अन्य सर्वेक्षणों में भी इससे ख़राब निष्कर्ष निकाले गए हैं, हालांकि अभी तक ये रिपोर्ट प्रकाशित नहीं हुई हैं.

कुछ पश्चिमी कूटनयिकों का कहना है कि पाकिस्तान सरकार ने इनके प्रकाशन पर ऐतराज़ जताया था.

लेकिन, पाकिस्तान में सरकार इन चुनौतियों पर बहुत कम ध्यान दे रही है.

कुपोषण के गंभीर मामलों की वजह अनाज की कमी नहीं, बल्कि इसका महंगा होना है.

सिंध और बलूचिस्तान सूबों में खाद्य सामग्री के लिए पहले ही दंगे हो चुके हैं. सिंध के रेगिस्तानी इलाके थर पारकर में पिछले साल सूखा घोषित किया गया था.

ग़ैर सरकारी संगठन तो मदद देने के लिए आगे आए, लेकिन सरकार की ओर से इस इलाक़े के लिए कोई दीर्घकालीन योजना नहीं रखी गई.

पानी का संकट

इस तरह के विरोध प्रदर्शन अच्छी फसल देने वाले पंजाब सूबे तक भी पहुंच सकते हैं.

पाकिस्तान में पानी को लेकर जारी संकट हर रोज़ बढ़ता जा रहा है. आशंका जताई जा रही है कि अगले दशक तक सिंध और बलूचिस्तान में पानी ख़त्म हो जाएगा.

इसके बावजूद मॉनसून के दौरान इन इलाक़ों में बाढ़ और बारिश के पानी के प्रबंधन का कोई इंतज़ाम नहीं किया गया है.

पोलियो उन्मूलन

पाकिस्तान के पोलियो उन्मूलन अभियान को ग्लोबल इंडिपेंडेंट मॉनिटरिंग बोर्ड ने पूरी तरह से नाकाम बताया है. यह बोर्ड दुनिया में पोलियो उन्मूलन कार्यक्रमों पर निगरानी रखता है.

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26 अक्तूबर को जेनेवा से जारी किए एक बयान में बोर्ड ने कहा है, "पाकिस्तान का पोलियो उन्मूलन अभियान 'एक त्रासदी' है.

पाकिस्तान में इस साल पोलियो के 217 मामले दर्ज किए गए. पोलियो उन्मूलन अभियान का विरोध करने वाले पाकिस्तानी तालिबान ने अभी तक पोलियो का टीका देने वाले 64 लोगों की हत्या की है.

अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पोलियो उन्मूलन अभियान से जुड़े लोगों को किस तरह की सुरक्षा दी जा रही होगी.

फैल रहा है पोलियो का संक्रमण

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पोलियो अभियान में लगी नर्सों और दूसरे कर्मचारियों को दो महीनों से वेतन नहीं दिया गया है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पाकिस्तान को अब इस बात के लिए भी शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है कि उसके यहां से पोलियो का संक्रमण सीरिया, मिस्र और इसराइल में भी हो रहा है.

विदेश मंत्रालय ने अपनी सफ़ाई में अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर समस्या को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगाया.

ये और बात थी कि अगले ही दिन इस बयान को वापस ले लिया गया.

स्कूलों का सवाल

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पाकिस्तान में आज भी ऐसे हालात हैं कि ढ़ाई करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं.

यह दुनिया के किसी भी देश की तुलना में सबसे बड़ी संख्या है.

हाल ही में आई एक नई रिपोर्ट 'अलिफ एलान' में कहा गया है कि पाकिस्तान के स्कूलों में दाखिला लेने वाले चार बच्चों में से सिर्फ़ एक बच्चा ही दसवीं कक्षा तक पहुँच पाता है.

आधे बच्चे पांचवीं क्लास तक पहुँचते-पहुँचते स्कूलों से बाहर हो जाते हैं, जबकि स्कूलों की स्थिति पानी, शौचालय और यहां तक कि स्कूल के कमरों की स्थिति दयनीय है.

हालांकि पंजाब सूबे की सरकार ने स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए बड़ी रकम खर्च की है, लेकिन बीते सालों में स्थिति बहुत ज़्यादा नहीं बदली है.

ईश निंदा

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पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदाय की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं कही जा सकती है. उनके खिलाफ हिंसा के मामले लगातार बढ़ रहे हैं.

चार नवंबर को ईशनिंदा के आरोप में एक ईसाई जोड़े की हत्या कर दी गई और उन्हें जला दिया गया. हालांकि बाद में ऐसी बातें भी कहीं गईं कि उनकी हत्या की वजह कुछ और थी.

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प्रदूषण नियंत्रण से लेकर पोलियो उन्मूलन अभियान चरमपंथियों की चुनौती की वजह से नाकाम रहे. और जब चरमपंथियों के ख़िलाफ़ ही कोई स्पष्ट रणनीति नहीं हो कोई अभियान कैसे चलाया जा सकता है.

राष्ट्रीय आंतरिक सुरक्षा नीति की फरवरी में घोषणा हुई थी, लेकिन इसके बाद से इस बारे में कुछ सुनने को नहीं मिला है.

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