दरवेशों के यरूशलम में बाबा फरीद की सराय

  • 24 नवंबर 2014
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यरूशलम में एक छोटा सा कोना है जहां भारत बसता है.

कहते हैं कि इसकी शुरुआत आठ सौ साल से भी पहले हुई थी और इसकी देखरेख करने वाली मौजूदा पीढ़ी का इरादा है कि उनकी नस्लें यहां भारत के झंडे को फहराती रहें.

यह कोई 1200 ईस्वी के आस पास की बात रही होगी. एक हिंदुस्तानी दरवेश ने तब यरूशलम की ज़मीन पर कदम रखे थे.

बाबा फ़रीद के नाम से मशहूर हुए हज़रत फ़रीद उद-दीन गंज शकर का ताल्लुक सूफ़ी मत के चिश्ती संप्रदाय से था.

इस मत को मानने वाले लोग आज भी भारत, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में रहते हैं.

बाबा फ़रीद के बारे में माना जाता है कि उन्होंने यहां अल-अक़्सा मस्जिद के आस पास पत्थर की बनी फर्श को साफ करने में या फिर शहर की दीवारों के भीतर बनी एक गुफा में उपवास करते हुए गुज़ारे़्

यरूशलम में भारत

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किसी को नहीं मालूम कि बाबा फ़रीद यहां कब तक रहे लेकिन पंजाब वापस लौट जाने के बाद वे आखिरकार चिश्ती संप्रदाय के मुखिया बन गए.

भारत के मुसलमान जब भी मक्का जाने के क्रम में यरूशलम से गुज़रते हैं तो उन जगहों पर जाना चाहते हैं जहां बाबा फ़रीद इबादत किया करते थे, सोया करते थे.

आहिस्ता आहिस्ता बाबा फ़रीद की यादों को समेटे हुए यहां एक सराय बन गया. आठ सदियों से ज़्यादा वक़्त गुज़र गया लेकिन ये सराय अब भी बरकरार है और इसकी कमान अभी भी भारतीय हाथों में है.

सराय के प्रधान 86 साल मोहम्मद मुनीर अंसारी हैं. उनकी पैदाइश द्वितीय विश्व युद्ध से पहले की है.

वे बताते हैं, "यहां रहने वाले सभी लोग भारतीय थे. मुझे लगा कि मैं भारत में हूं. जब भी मैं इस सराय में दाखिल होता हूं, लगता है कि भारत में आ गया हूं."

मुश्किल दौर

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Image caption शेख मुनीर अंसारी के बचपन की तस्वीर.

पुराने दिनों की बातें याद करते हुए मुनीर अंसारी बताते हैं, "उस ज़माने में लोग यहां जहाज से आते थे. वे खाना, चावल, और यहां तक कि नमक भी भारत से ही लाते थे. आप जैसे ही सराय में दाखिल होते हैं, आपको हिंदुस्तानी खाने की गंध महसूस होने लगती है."

लेकिन यरूशलम अपनी मुश्किलों से गुजर रहा था और यहां के तनाव ने तीर्थयात्रियों की आवक पर रोक लगा दी और मुनीर के बचपन की रंगीन तस्वीरें भी बस यादों का हिस्सा बन कर रह गईं.

एक वक़्त ऐसा भी आया जब इस सराय में इंडियन फोर्थ इंफ़ैंट्री डिविज़न के जवान भी ठहरे और वे सिपाही यहां से 1948 में अरब इसराइल संघर्ष के शुरू होने के बाद निकले.

ये वही वक़्त था जब मुनीर को 1952 में इस सराय की विरासत शेख की उपाधि के साथ मिले. सराय की इमारत को बमबारी से बहुत नुकसान हुआ और यहां फलस्तीनी शरणार्थियों ने डेरा जमा लिया.

इसराइली बमबारी

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Image caption अल अक्सा मस्जिद के पुनर्निमाण के लिए हैदराबाद के निज़ाम ने चंदा दिया था.

लेकिन हालात इससे भी बदतर होने बाक़ी थे. 1967 में यरूशलम पर हुए इसराइली संघर्ष में इस सराय पर रॉकेट से हमला हुआ.

इसराइली सैनिकों ने सराय पर बमबारी कर दी. हमले में मुनीर की मां, उनकी बहन और दो साल का भांजा मारे गए. मुनीर खुद भी बुरी तरह घायल हो गए थे.

पुराने शहर के अस्पताल से लौटने पर शेख मुनीर ने जो देखा उये यूं बताया, "सराय उजड़ चुका था. सराय के कमरे ध्वस्त हो गए थे. मेरे हाथ जले हुए थे. मेरी आंखें बंद थीं. मेरे केश जल गए थे. बहुत ही खराब हालत थी लेकिन सराय छोड़ने का सवाल ही नहीं पैदा होता था."

इस्लाम के शुरुआती दिनों में दुनिया भर से कई फकीरों का यरूशलम आना हुआ था. ज्ञान की तलाश में वे गली गली शहर शहर भटका करते थे. वे रेगिस्तानों में सोये, अल्लाह के लिए रोये और ख़ुदा के लिए अपनी मोहब्बत के गीत गाये.

सूफ़ी मत

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इसी माहौल में बाबा फ़रीद की सराय में भारत से आने वाले श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगने लगा. वे अपने साथ पंजाब का गीत-संगीत और उसके वाद्य यंत्र ला रहे थे.

वे यहां बाबा फ़रीद के लिखे गीत गाते थे. बाबा फ़रीद ने सैकड़ों गीत लिखे थे जिन्हें सूफ़ी साहित्य की धरोहर माना जाता है.

बाबा फ़रीद ने संस्कृत या अरबी की जगह पंजाबी में ये गीत लिखे थे. कहा जाता है कि पंजाबी साहित्य की नींव यहीं से पड़ी थी क्योंकि उनसे पहले किसी ने पंजाबी ज़ुबान में गीत नहीं रचे थे. इन गीतों की एक और खासियत है.

ये गीत सूफ़ी और सिख परंपरा को कहीं एक सूत्र में पिरोते हैं. बाबा फ़रीद के गीतों की छाप सिखों के धर्मग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में देखी जा सकती है.

अगले तीन से चार सौ सालों में दुनिया भर से सूफ़ी मत के मानने वाले लोगों ने यरूशलम में रह रहे भारतीयों का साथ दिया.

मोरक्को, क्रीमिया, एंटोलिया और उज़बेकिस्तान से लोगों ने यहां स्कूलों और सरायों के निर्माण के लिए पैसा भेजा.

दरवेशों का मक्का

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17वीं सदी में ऑटोमान साम्राज्य से यात्री एवलिया सेलेबी यहां पहुंचे तो उन्होंने पाया कि यरूशलम शहर में में कम से कम 70 सूफ़ी सराय थे.

उन्होंने लिखा यरूशलम दरवेशों का मक्का है. इनमें से कई सराय पहले विश्व युद्ध की शुरुआत तक अस्तित्व में थे. लेकिन युद्ध और आधुनिकता ने चीजें बदल दीं.

सरहदों की लकीरें खींच दी गई. रास्ते बंद हो गए.

1922 में ऑटोमान साम्राज्य के पतन तक किसी ने सोचा नहीं था कि वो भारतीय सराय एक बार फिर से आबाद हो जाएगी.

सराय के दोबारा शुरू होने की जड़ें यहां फैली निराशा में छिपी हुई थीं.

1923 में यरूशलम के सबसे बड़े मौलवी हज अमीन अल हुसैनी ने अल अस्का मस्जिद के जीर्णोद्धार के लिए मदद मांगने के मक़सद से एक प्रतिनिधिमंडल भारत भेजा.

हिंदुस्तानी मुसलमान

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Image caption शेख नज़ीर हसन

वे वहां खिलाफत आंदोलन के नेताओं से मिले. फलीस्तीनियों ने अपने भारतीय मेज़बानों को बाबा फ़रीद की सराय के बारे में बताया और गुज़ारिश की वे किसी भारतीय मुसलमान को इसकी ज़िम्मेदारी लेने वहां भेज दें.

इसके बाद 1924 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से नज़ीर हसन अंसारी यहां पहुंचे.

अगले 27 सालों तक न केवल उन्होंने इस सराय को आबाद करने का बीड़ा उठाया बल्कि यरूशलम को हिंदुस्तानी मुसलमानों के लिए एक धार्मिक केंद्र की तौर पर भी विकसित करने का विचार दिया.

और जैसे जैसे हिंदुस्तानी श्रद्धालु यहां आने लगे, बाबा फ़रीद की सराय फिर से आबाद होने लगी. 1920 और 30 के दशक में शेख नज़ीर ने भारत वापस भारत लौटकर मुसलमान बादशाहों से सराय के पुनर्निर्माण के लिए दान देने की गुज़ारिश की.

बाबा का सराय

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1937 की टाइम मैगज़ीन में दुनिया के सबसे दौलतमंद शख्स का खिताब पाने वाले हैदराबाद के निज़ाम ने भी बाबा फ़रीद के सराय के लिए चंदा दिया था.

शेख नज़ीर ने एक फलस्तीन लड़की मुशरा से निकाह कर लिया जिन्होंने 1928 में मुनीर को जन्म दिया.

मां और बहन को खोने का मुनीर का ग़म उनके पांच बच्चों की हंसी में खो जाता है. वे बच्चे इसराइली हमले में बच गए थे. मुनीर ने उनकी परवरिश इसी सराय में की है.

आज इस सराय में एक लाइब्रेरी है, एक मस्जिद है और मेहमानों के लिए कुछ कमरे हैं जहां अब भी भारत से आने वाले कुछ लोग ठहरते हैं.

आने वाला कल

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Image caption शेख मुनीर अंसारी अपनी पोती के साथ.

साल 2011 में शेख मुनीर को भारत के राष्ट्रपति ने प्रवासी भारतीय सम्मान से नवाज़ा. सराय की छत पर भारत का एक झंडा लहराता रहता है.

झंडे का केसरिया और हरा रंग शहर से देखा जा सकता है, उस यरूशलम शहर से जहां कब क्या हो जाए, कोई नहीं जानता.

हालांकि शेख मुनीर इन सब बातों से डरते नहीं हैं, "मैं डरा हुआ नहीं हूं. आने वाले कल को लेकर आश्वस्त हूं कि हमारा अंसारी परिवार अपना काम कर रहा है. मेरा बड़ा बेटा नाज़ेर मेरे बाद शेख बनेगा और सराय की ज़िम्मेदारी उठाएगा."

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