मोदी: नेपाल में चीन को पछाड़ने की चुनौती

मोदी, नेपाल इमेज कॉपीरइट EPA

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब पिछले अगस्त में नेपाल गए तो 17 सालों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की ये पहली नेपाल यात्रा थी.

नेपाल में जहां चीन ने 2013-2014 में 119 परियोजनाओं में निवेश का वादा किया तो भारत ने केवल 22 परियोजनाओं में.

क्या मोदी 17 सालों की दूरी से बनी खाई को भर पाएंगे? इन 17 सालों में भारत ने नेपाल में क्या खोया?

नेपाल के अधिकारियों की मानें तो पहले भारत की ओर से मदद के वायदे तो बहुत हुए, लेकिन वायदों के पूरे होने की रफ़्तार बेहद धीमी रही. क्या नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद नेपाल की ये शिकायत दूर होगी?

पढ़िए विस्तार से विनीत खरे की रिपोर्ट

बीते 17 सालों में पश्चिमी देशों और चीन ने नेपाल में सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक प्रभाव बढ़ाया है.

विश्लेषकों के मुताबिक़, इन 17 सालों में नेपाल में भारत का प्रभाव कम हुआ, भारत के प्रति कटुता बढ़ी और चीन ने भारी निवेश करके अपनी पकड़ मज़बूत की.

कई इसका कारण ये बताते हैं कि भारत सरकार ने नेपाल में अपनी नीतियों को नौकरशाहों के हाथों में छोड़ दिया था, जिससे नेपाल की जनता में भारत के प्रति संशय बढ़ा.

इसका फ़ायदा चीन जैसे देशों ने उठाया है.

119 चीनी, 22 भारतीय परियोजना

काठमांडू में चीनी पर्यटक, चीनी भाषा की दुकानें, चीनी भाषा पढ़ाने वाली अनगिनत जगहें दिखेंगी.

एक विश्लेषक ने धीमे स्वर में चीनी पर्यटकों की ओर इशारा करते हुए बताया कि नेपाल अभी चीनी पर्यटकों के दबाव में है और अगर ये संख्या लाखों में पहुंचती है तो नेपाल इससे कैसे निपटेगा.

उनका कहना था कि इसका प्रतिकूल असर नेपाल की सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक हालत पर पड़ेगा.

नेपाल राष्ट्र बैंक के आंकड़े दिखाते हैं कि जहां वर्ष 2013-14 में चीन 119 परियोजनाओं पर 730 करोड़ नेपाली रुपयों से ज़्यादा के निवेश का वायदा कर चुका है, भारत ने मात्र 22 परियोजनाओं पर 650 करोड़़ नेपाली रुपए के निवेश का वायदा किया है.

विश्लेषक इसके लिए नेपाल के आर्थिक हालत और कमज़ोर नेतृत्व को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

चीन का बोलबाला

चीन के आर्थिक सहयोग से आठ लेन का रिंग रोड बनाया जा रहा है. चारों ओर चीन से आए हुए कारीगर सड़कों पर काम करते दिख जाएंगे.

चीन की शंघाई कंस्ट्रक्शन ग्रुप कंपनी लिमिटेड अभी पहले चरण का काम कर रही है. तीन चरणों में बन रहा 27 किलोमीटर लंबा यह रिंग रोड मई 2016 में पूरा होने की उम्मीद है.

काठमांडू रिंग रोड एक्सटेंशन प्रोजेक्ट मैनेजर अशोक तिवारी की डेस्क के सामने नेपाल का राजनीतिक नक्शा रखा हुआ था.

वो नक्शे पर दिखाते हैं कि नेपाल में चीन और भारत किन-किन परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं. चीन की बनाई हुई एक सड़क काठमांडू से तिब्बत को जोड़ती है.

जिस इमारत में नेपाल के संविधान पर बहस चल रही है, उसे करीब 15 साल पहले चीन ने बनाया था.

पश्चिमी देशों का प्रभाव

लेकिन कुछ नेपाली अधिकारियों के अनुसार, भारत में चीन के प्रभाव को बढ़ा-चढ़ा कर आंका जा रहा है, जबकि भारत की मज़बूत उपस्थिति के अभाव में चीन से ज़्यादा पश्चिमी देशों ने नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाया है.

नेपाल में कई हलकों में धर्म परिवर्तन पर चिंता व्यक्त की जा रही है. इसके लिए कई लोग पश्चिमी देशों की संस्थाओं के बढ़ते प्रभाव को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

मधु कुमार मरासिनी नेपाल सरकार के वित्त मंत्रालय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग समन्वय विभाग के प्रमुख हैं.

वो कहते हैं, “17 साल से तो (भारत से) कोई (प्रधानमंत्री) नहीं आया. हमने देखा है, पढ़ा है कि राजनीतिक स्तर पर भी दोनो पक्षों के बीच अविश्वास था. हमारे यहां चीन से भी ज़्यादा पश्चिमी देशों के लोग, उनकी कंपनियां आई हैं.”

मरासिनी कहते हैं कि चीन जिस रफ़्तार से विकसित हो रहा है, वहां लोगों के पास ढेर सारा पैसा है और लोग अपना पैसा खर्च करना चाहते हैं.

मोदी का असर

Image caption नेपाल के वरिष्ठ पत्राकर युबराज घीमिरे कहते हैं कि मोदी ने जिस तरह रिश्ता कायम किया है, वो यहां लोकप्रिय हुए हैं.

नेपाल के अधिकारियों की मानें तो पूर्व में भारत की ओर से मदद के वायदे तो बहुत हुए, लेकिन वायदों के पूरे होने की रफ़्तार बेहद धीमी रही. क्या नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद नेपाल की ये शिकायत दूर होगी?

मरासिनी के मुताबिक नरेंद्र मोदी के आने से भारत और नेपाल के रिश्तों में 90 प्रतिशत तक परिवर्तन आया है.

मरासिनी के अनुसार, चाहे वो दिल्ली में स्थित भारतीय विदेश विभाग हो या फिर काठमांडू में स्थित भारतीय दूतावास, मोदी के आने का असर साफ़ नज़र आ रहा है और विभिन्न परियोजनाओं पर प्रगति हुई है.

Image caption अशोक तिवारी काठमांडू रिंग रोड एक्सटेंशन प्रोजेक्ट के मैनेजर हैं.

वरिष्ठ पत्रकार युबराज घीमिरे कहते हैं, “नरेंद्र मोदी ने जिस तरह नेपाल के राजनीतिक नेताओं और आम लोगों के साथ रिश्ता स्थापित किया, उससे वो काफ़ी लोकप्रिय हो गए हैं. इसलिए लोग मोदी को नौकरशाह से ऊपर रखकर देख रहे हैं.”

चाहे अफ़्रीका हो, दक्षिण पूर्व एशिया या फिर दक्षिण एशिया, भारत और चीन प्राकृतिक संसाधनों तक अपनी पहुंच बढ़ाने और अपने प्रभाव को बढ़ाने के कोशिश कर रहे हैं.

नेपाल में अधिकारी भारत के साथ बेहद नज़दीकी सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक संबंधों की बात तो कर रहे हैं, लेकिन उनका ये भी कहना है कि वो दोनों देशों की मदद से नेपाल में आर्थिक प्रगति की रफ़्तार बढ़ाना चाहते हैं.

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