ये करते हैं 'डिप्रेस्ड' तालिबान का इलाज

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तालिबान के इस रूप की शायद ही किसी ने कल्पना की हो. आमतौर पर तालिबान का नाम लेते ही ज़ेहन में ख़ौफ़ भर जाता है.

तालिबानी भी डरते होंगे, अवसाद का शिकार होते होंगे....ऐसी कल्पना कर पाना थोड़ा मुश्किल है.

लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में एक मनोचिकित्सक ऐसे हैं जिन्होंने हज़ारों ऐसे तालिबानी लड़़ाकों का इलाज किया जिन्हें रात को डरावने सपने आते थे और उदासी का दौरा पड़ता था.

आख़िर क्या कारण है कि जिनसे दुनिया डरती है, उन्हें एक मनोचिकित्सक का सहारा लेना पड़ा?

ताहिर क़दीरी की विशेष रिपोर्ट

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Image caption अफ़ग़ान मनोचिकित्सक अलेमी क़ादिरी तालिबान के कई अधिकारियों का इलाज कर चुके हैं.

साल 1990 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान ने क़ब्ज़ा तो कर लिया, लेकिन सत्ता के इस संघर्ष के बाद कई तालिबान चरमपंथी युद्ध के बाद के मनोवैज्ञानिक असर से ग्रस्त हो गए.

एक डॉक्टर ने उनकी परेशानी को पहचाना और तालिबान की विचारधारा से इत्तेफाक नहीं रखने के बावजूद, उनका इलाज करने के लिए राजी हो गया.

साहसी और दयालु अफ़ग़ान मनोचिकित्सक नादिर अलीमी कहते हैं, "वो अकेले नहीं, बल्कि अक्सर समूह में आते थे. काग़ज पर मेरे नाम की पर्ची लेकर आते थे और कहते थे कि आपने हमारे एक साथी को ठीक किया है, अब मैं भी ठीक होना चाहता हूं."

अफ़ग़ानिस्तान में अच्छी पहचान रखने वाले अलीमी उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के मज़ार-ए-शरीफ में रहते हैं. तालिबान चरमपंथियों ने 1998 के अगस्त में इस शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया था.

जब तालिबान के लड़ाके मैदान में जीत हासिल कर रहे थे, अलीमी ने सालों के संघर्ष से उपजे उनके मानसिक तनाव को महसूस किया.

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उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी चरमपंथियों की भाषा पश्तो जानने वाले अलीमी एकमात्र मनोचिकित्सक हैं. पश्तो अधिकांश तालिबान लड़ाकों की ज़ुबान है.

गोलियों की आवाज़, चीखें

पहली बार तालिबान के प्रांतीय गर्वनर अख़्तर उस्मानी ने अपने इलाज के लिए अलीमी को बुलाया. अख़्तर तालिबान के आध्यात्मिक नेता मुल्ला उमर के बाद दूसरे बड़े नेता थे.

अलीमी का कहना है, "उन्हें आवाज़ें सुनाई देती थीं और कई तरह के भ्रम होने लगे थे. उनके बॉडीगार्ड बताते थे कि वे रात में पागलों की तरह चिल्लाते थे."

अख़्तर के कर्माचारियों का कहना है कि उनके मालिक अक़्सर उन्हें पहचान नहीं पाते थे.

मनोचिकित्सक अलीमी ने बताया, "यह आदमी न जाने कितने दिनों तक मोर्चों पर रहा था और उसके सामने न जाने कितने लोगों की हत्या हुई थी. आरामदायक ऑफ़िस में बैठे रहने के बावजूद विस्फोट और चीखें उनके दिमाग़ में गूँजती रही होंगी."

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अलीमी चाहते थे कि वे मुल्ला अख़्तर का लंबा इलाज करें. लेकिन उनके मरीज को हर तीन महीने पर किसी न किसी मिशन पर जाना होता था. काफ़ी बाद में साल 2006 में मुल्ला अख़्तर की एक हवाई हमले में मौत हो गई.

अनिश्चित जीवन

अलीमी ने एक और शीर्ष तालिबान कमाडंर का इलाज किया था, जिससे उनकी दोस्ती हो गई थी. वो कहते हैं, "वर्ष 2001 में जब मज़ार-ए-शरीफ़ पर दोबारा कब्ज़ा हुआ उससे पहले मैंने तीन वर्षों तक इन लोगों का इलाज़ किया. इनकी सटीक संख्या तो नहीं याद है, लेकिन यह ज़रूर हज़ारों में रही होगी."

क्या तालिबान के कमांडर अपने लड़ाकों को इलाज से मना करते हैं?

अलीमी बताते हैं, "ईमानदारी से कहूँ तो वे अपने मिशन और रोजमर्रा के कामों में इतना बुरी तरह व्यस्त होते हैं कि उनके पास इलाज का वक़्त नहीं होता. सबसे बड़ा आश्चर्य ये है कि उन सभी को मेरे इलाज पर विश्वास है."

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वे कहते हैं, "तालिबान के लड़ाकों की बेचैनी और बीमारी का कारण उनके जीवन की अनिश्चितता है. उन्हें अपने कमांडर के अनुसार चलना होता है. वे नहीं जानते कि अगले एक मिनट में क्या होगा."

अलीमी ने पाया कि कई चरमपंथी मौत चाहते हैं. उन्होंने बताया, "चरमपंथी बताते हैं कि वे आत्महत्या करना चाहते हैं, लेकिन इस्लामी मूल्यों के कारण ऐसा नहीं करते हैं."

एक चरमपंथी ने बताया, "जब भी मै मोर्चे पर जाता हूँ, सोचता हूँ कि काश कोई मुझे यहीं ख़त्म कर दे! मगर फिर भी मैं जिंदा बच निकलता हूं. ऐसे जीवन से मुझे नफ़रत हो गई है. "

नादिर अलीमी बताते हैं, "कई बार तो वे रो पड़ते हैं और मैं उन्हें चुप कराता हूं."

वे बताते हैं कि इन चरमपंथियों के इलाज में एक बड़ी समस्या ये आती है कि अधिकांश मरीज अक़्सर मिशन पर भेज दिए जाते हैं, जिससे वे बाद के जरूरी सेशन अटेंड नहीं कर पाते.

बच्चियों के लिए अंडरग्राउंड स्कूल

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Image caption तालिबान के पीछे हटने के बाद अफ़गानिस्तान में लड़कियों के स्कूल दोबारा खोले गए.

अलीमी अफ़ग़ान तालिबान लड़ाकों की पत्नियों और बच्चों का भी इलाज करते हैं. उन्होंने बताया, "पत्नियां और बच्चे भी अवसाद का शिकार हैं, क्योंकि उनके पिता और पति लंबे समय तक घरों से दूर रहते हैं."

अचरज की बात है कि एक ओर तो अलीमी तालिबान चरमपंथियों का इलाज कर रहे थे तो दूसरी ओर उनकी पत्नी क़रीब 100 बच्चियों के लिए अंडरग्राउंड स्कूल चलाती थीं.

बच्चियों के स्कूल जाने पर तालिबान ने पाबंदी लगा रखी थी. वहाँ अलीमी की बच्चियां भी पढ़ती थीं, जिनमें आज एक डॉक्टर हैं और दो अध्यापिका हैं.

इस स्कूल को लेकर अलीमी और उनकी पत्नी डरे हुए थे लेकिन उन्हें इस बात का भरोसा था कि अगर तालिबान लड़ाकों को पता चल भी जाएगा तो वो माफ़ कर देंगे क्योंकि उन्हें उनकी जरूरत थी.

पंद्रह साल गुजर जाने के बाद, आज भी अलीमी संघर्ष के तनाव से गुज़र रहे अफ़ग़ानों का इलाज कर रहे हैं.

उनके अस्पताल के सामने लगी लंबी क़तार में ऐसे मरीज हैं जो अवसाद, बार-बार मूड बदलने और डरावने सपने आने की समस्या से परेशान हैं.

अलीमी कहते हैं कि इन लोगों की मूल समस्या है, उनके जीवन की अस्थिरता.

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