सार्क ग्रिड बनेगा, दूर करेगा अंधियारा

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दक्षिण एशियाई देश क्षेत्रीय ऊर्जा नेटवर्क बनाने की योजना पर सहमत हो गए हैं ताकि बेहद चुनौतीपूर्ण स्थितियों का मुक़ाबला किया जा सके.

अधिकारियों के अनुसार नेपाल की राजधानी काठमांडू में हुए सार्क सम्मेलन में इस समझौते को अंतिम रूप दिया गया.

इस बारे में अभी ज़्यादा जानकारी नहीं दी गई है लेकिन लगता है कि आख़िरी क्षणों में सार्क ग्रिड बनाने का विचार सामने आया.

इस हफ़्ते हुए सार्क सम्मेलन के बाद भारत सरकार ने कहा, "इस समझौते से पूरे सार्क क्षेत्र में ऊर्जा की उपलब्धता बेहतर होने की उम्मीद है और यह एकीकृत क्षेत्रीय ग्रिड के संचालन को बेहतर करेगा."

हालांकि क्षेत्रीय सहयोग पर काम करने को लेकर सार्क का ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा नहीं है पर मुमकिन है कि ऊर्जा की मुश्किल चुनौतियों का सामना करने के लिए उनकी सोच केंद्रीकृत हो गई है.

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दक्षिण एशिया में क़रीब-क़रीब सभी देश अपर्याप्त बिजली आपूर्ति से जूझ रहे हैं, कुछ में तो गंभीर कमी है.

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Image caption मोदी ने सार्क देशों के बीच व्यापार बढ़ाने की वकालत की है.

पाकिस्तान के ऊर्जा मंत्री के अनुसार वहां रोज़ 12 से 16 घंटे की कटौती हो रही है.

नेपाल में गर्मियों में रोज़ 15 घंटे से ज़्यादा बिजली कटौती होती है.

सर्दियों में अफ़गानिस्तान में भी बिजली कटौती होती है और इसकी ज़्यादातर आबादी बिजली से वंचित है.

बांग्लादेश सरकार का दावा है कि उसने 2013 में अपनी स्थापित ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य से ज़्यादा हासिल कर लिया था पर सरकारी आंकड़ों के अनुसार 30 फ़ीसदी से ज़्यादा आबादी के पास बिजली नहीं है. कुछ अनुमानों के अनुसार यह आंकड़ा 50 फ़ीसदी है.

एक चौथाई श्रीलंकाई आबादी के पास घरेलू ज़रूरतों के लिए बिजली उपलब्ध नहीं है.

छह करोड़ के पास बिजली नहीं

भारत ने हालिया वर्षों में अपनी अधिकतम मांग को कम करने में सफलता हासिल की है लेकिन अनुमान है कि उसका मूलभूत ऊर्जा उपयोग 2032 तक चार से पांच गुना तक बढ़ सकता है.

अनुमान के मुताबिक़ क़रीब छह करोड़ भारतीयों के पास अब भी बिजली नहीं है.

विशेषज्ञों का कहना है कि क्षेत्र में भरपूर ऊर्जा संभावनाएं हैं और संकेंद्रित आपूर्ति नेटवर्क दिक़्क़तों को दूर कर सकता है. इससे 2012 में भारत के बड़े क्षेत्र में और इस नवंबर की शुरुआत में बांग्लादेश में हुए भारी ब्लैकआउट से बचा जा सकता है.

क्षेत्र के ऊर्जा सेक्टर पर एशियाई विकास बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया, "जहां भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर प्राकृतिक गैस और कोयले के भंडार हैं, वहीं नेपाल और भूटान में बड़ी मात्रा में जलशक्ति है. इन संसाधनों को साझा करके पूरे क्षेत्र की ऊर्जा ज़रूरतों को सबसे बेहतर ढंग से हासिल किया जा सकता है."

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सार्क ने पहले भी क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग पर कई शोध किए हैं और तो और 2000 में, जबसे इस पर चर्चा शुरू हुई, तब इस्लामाबाद में एक क्षेत्रीय ऊर्जा केंद्र भी स्थापित किया था.

लेकिन इनमें से एक भी शोध के निष्कर्षो को लागू नहीं किया जा सका. इसकी वजह कुछ तो भौगोलिक-राजनीतिक दिक़्क़तें थीं और कुछ आलस्य और संकल्प की कमी.

लाइनें होंगी मज़बूत

सार्क सम्मेलन के मेज़बान नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता खगन्नाथ अधिकारी ने कहा कि ऊर्जा सहयोग पर सार्क ढांचागत समझौते का लक्ष्य मूलतः वितरण और प्रसार है.

उन्होंने कहा, "सदस्य देश इस बात पर सहमत हैं कि अधिकृत सार्वजनिक और निजी कंपनियों को बिजली खरीदने-बेचने की अनुमति होगी जबकि सरकारें वितरण की सुविधा देंगी."

नेपाल के ऊर्जा मंत्रालय के प्रवक्ता केशब धोज अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि समझौते में बिजली को बढ़ाना और पूरे क्षेत्र में वितरण बढ़ाने के प्रावधान हैं. इससे अंततः अंतरक्षेत्रीय संपर्क बढ़ेगा और धीरे-धीरे बिजली पर कर और शुल्क ख़त्म होंगे.

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पाकिस्तान सरकार के ऊर्जा सलाहकार, मुश्ताक़ मलिक भी मानते हैं कि क्षेत्र की ऊर्जा चुनौतियों का मुक़ाबला करने के लिए क्षेत्रीय नेटवर्क एक कारगर विचार हो सकता है.

"यह समस्याओं को आपस में स्वीकार्य शर्तों के आधार पर हल करने के लिए अहम हो सकता है और समझौते पर हस्ताक्षर से पहले हम चर्चा करेंगे."

भारत की पहले ही भूटान, नेपाल और बांग्लादेश के साथ सीमापार पारेषण लाइनें हैं और उसका इरादा इन्हें मज़बूत करने का है.

लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इस नेटवर्क के क्षेत्र में विस्तार आसान नहीं है. ख़ासकर भारत के पाकिस्तान से अस्थिर रिश्तों के चलते, जो अक्सर सार्क की अन्य गतिविधियों पर हावी रहते हैं.

पाकिस्तान का सवाल

पिछले महीने जब सार्क के ऊर्जा मंत्री दिल्ली में क्षेत्रीय ऊर्जा ग्रिड की तैयारियों पर वार्ता के लिए मिले थे उसमें पाकिस्तान शामिल नहीं था. इससे शायद भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर जारी तनाव का पता चलता है.

उस बैठक का उद्घाटन करते हुए भारत के ऊर्जा मंत्री ने कहा, "नदियां सिर्फ़ एक दिशा में ही बह सकती हैं लेकिन ऊर्जा हमारी मर्ज़ी से किसी भी दिशा में जा सकती है. मुझे उम्मीद है कि कुछ सालों में एक निर्बाध सार्क ऊर्जा ग्रिड काम कर रहा होगा."

इसी तरह की एक क्षेत्रीय ऊर्जा कॉंफ़्रेंस में 2011 में उनके पूर्ववर्ती केसी वेणुगोपाल ने कहा था, "सीमापार व्यापार का मामला काफ़ी जटिल है जिसमें बाज़ार, तकनीक और सबसे महत्वूर्ण भौगोलिक-राजनीतिक मुद्दे हैं".

दूसरी ओर पाकिस्तान भी विस्तार कर रहा है. उसने पिछले महीने अफ़गानिस्तान के साथ एक सीमापार पारेषण लाइन बनाने का समझौता किया है ताकि यह मध्य एशियाई देशों से बिजली आयात कर सके.

सार्क का नया सदस्य अफ़गानिस्तान पहले ही मध्य एशिया से क़रीब 500 मेगावॉट बिजली आयात करता है.

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