जलवायु, जियो इंजीनियरिंग और गंभीर ख़तरा

  • 13 दिसंबर 2014
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जलवायु परिवर्तन पर अंकुश लगाने वाली कोई भी योजना अरबों लोगों के लिए भयावह साबित होगी. लेकिन शोध वैज्ञानिकों के मुताबिक पृथ्वी के हित के लिए ये जरूरी हो सकता है.

दरअसल ये जियो इंजीनियरिंग से जुड़े नए अध्ययनों का नतीजा है.

वैसे अब तक जलवायु में वैज्ञानिक दखल से तापमान कम नहीं हो पाया है.

इसके बावजूद कई तरह के वैज्ञानिक प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है. इसमें सूर्य से पृथ्वी को ढंकने की कोशिश या कार्बन डायक्साइड को सोखने के विचार शामिल है.

गंभीर अध्ययन

इसके अलावा एयरक्राफ्ट से ऊंचाई पर जाकर सल्फ़र कणों का छिड़काव शामिल है. इसे ज्वालामुखी को शांत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. कार्बन डायक्साइड को सोखने के लिए कृत्रिम पेड़ों को उगाने का भी विचार है.

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ग्लोबल वार्मिंग पर अंकुश पाने की तमाम कोशिशों और जियो इंजीनियरिंग के विकल्पों के बावजूद दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन कम नहीं हो पाया है.

अब लीड्स, ब्रिस्टल और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटीज के शोध वैज्ञानिकों के तीन दलों ने इन प्रयोगों के प्रभावों का गंभीरता से अध्ययन किया है.

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ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के डॉ. मैट वाटसन के मुताबिक जियो इंजीनियरिंग से जुड़े प्रयोगों के प्रभाव काफ़ी पेचीदा हैं.

उन्होंने कहा, " व्यक्तिगत तौर पर ये नतीजे डराने वाले हैं लेकिन अगर इसकी तुलना विश्व के तापमान में 4 डिग्री सेंटीग्रेड की बढ़ोत्तरी से की जाए तो ये कुछ भी नहीं है."

प्रतिकूल असर

इन अध्ययनों में कंप्यूटर मॉडल के जरिए विभिन्न तकनीकों के इस्तेमाल से संभावित परिणामों को आकलित किया गया है. इसमें रेगिस्तान बनाने,समुद्र और बादल को ज़्यादा रिफ्लेक्टिव बनाने जैसे प्रयोगों का भी अध्ययन किया गया.

इन अध्ययनों में कई प्रतिकूल परिणाम भी देखने को मिले. मसलन सौर विकिरण को पृथ्वी पर आने से रोकने की कोशिशों से भारतीय मानसून पर विपरित असर पड़ सकता है.

लीड्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पीयर्स फॉरर्स्टर ने कहा, "मानसून के पैटर्न के गड़बड़ाने से 1.2 अरब से 4.1 अरब लोगों पर संकट आ सकता है."

दरअसल जलवायु परिवर्तन की बढ़ती समस्या पर अंकुश पाने के उपायों में जियो इंजीनियरिंग बेहद विवादास्पद उपाय है और इससे संबंधित कुछ प्रयोग किए जा रहे हैं.

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