तेल सऊदी अरब के लिए एक हथियार है?

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तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक की हाल ही में वियना में हुई बैठक में आखिरकार वही नतीजा निकला जिसकी दुनिया को उम्मीद थी.

सऊदी अरब तेल के साथ राजनीति खेल रहा है.

सऊदी अरब ने ओपेक समूह को तेल का मौजूदा उत्पादन 30 मिलियन बैरल प्रतिदिन रखने के लिए एक तरह से मजबूर कर दिया ताकि इसकी कीमतें कम की जा सकें.

नतीजतन 2014 में तेल की कीमतें 35 फ़ीसदी गिरी हैं और मई, 2010 के बाद पहली बार ये 70 डॉलर के स्तर से नीचे है.

लेकिन सवाल ये उठता है कि आख़िर सऊदी अरब अन्य ओपेक देशों की दोस्ती को क्यों ख़तरे में डाल रहा है.

तेल की आपूर्ति

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Image caption सउदी अरब के तेल मंत्री ओपेक देशों की बैठक में.

इतना ही नहीं वो ओपेक को कमजोर कर रहा है जिसकी वजह से भविष्य में वो उनके हितों के लिए काम करने की उसकी काबिलियत कम होगी.

ये ऐसा खेल हो गया है जिस पर बड़े दांव लगे हुए हैं और मुमकिन है कि इसका खामियाजा आने वाले कल में भारत को भी उठाना पड़ सकता है.

लेकिन शायद अभी उन्हें इस बारे में तुरंत फ्रिक्र करने की ज़रुरत नहीं है.

1973 में मध्यपूर्व की लड़ाई के बाद ही सऊदी अरब ने ये समझ लिया था कि वह तेल की आपूर्ति को नियंत्रित करके इस क्षेत्र में और विश्व मामलों में अपना दखल दे सकता है.

क्षेत्रीय चिंताएं

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लेकिन हाल ही में अमरीका ने अपने तेल उत्पादन को बढ़ाया है और यह माना जा रहा था कि सऊदी अरब भी तेल की अतिरिक्त आपूर्ति में कटौती करेगा ताकि उसके खाते की सेहत अच्छी रहे.

लेकिन सऊदी अरब ने ठीक इसके उलट किया. यहां से दुनिया बड़ी मनहूस लगती है और सऊदी अरब की भी अपनी चिंताएं हैं, जिसके बारे में उसे लगता है कि पश्चिम या उसके साथियों ने पूरी तवज्जो नहीं दी.

और इन सब के बीच सऊदी अरब और ईरान का शीत युद्ध भी है जहां क्षेत्रीय चिंताओं से जुड़े हर मुद्दे पर ईरान के फ़ायदे को सऊदी अरब के नुकसान के तौर पर देखा जाता है और शाही राजघराने में हड़कंप मच जाता है.

परमाणु कार्यक्रम

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उन्हें लगता है कि अमरीका ने हार मान ली है और ईरान को हाथ से निकल जाने दिया.

अमरीका और यूरोप ने महीनों तक ईरान के कट्टरपंथियों को आर्थिक प्रलोभनों के जरिए रिझाने की कोशिश की.

सऊदी अरब को ये लगता है कि ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी उस निजाम का चेहरा हैं जो मध्य पूर्व में अपने असर को मजबूत करना चाहता है और जो दुनिया की स्वीकार्यता के लिए बुरी तरह से बेकरार है.

ईरान के परमाणु कार्यक्रम की तुलना में सऊदी अरब मध्य पूर्व के देशों तक उसकी पहुंच को लेकर अधिक परेशान है.

ईरान की अर्थव्यवस्था

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इन सब के मद्देनज़र ईरान से सीधे उलझने की बजाय उसकी जेब पर हमला करना सऊदी अरब को ज्यादा आसान लगा.

ईरान की अर्थव्यवस्था हाइड्रोकॉर्बन पर पूरी तरह से निर्भर है और 2013 में उसकी जीडीपी में 25 फ़ीसदी योगदान तेल निर्यात से आया था.

कहा जा रहा है कि सीरिया और इराक में ईरान बड़ी रकम खर्च कर रहा है ताकि उसके घर के भीतर शांति रहे.

यह भी दिलचस्प है कि ईरान ने नवंबर की ओपेक बैठक से पहले तेल उत्पादन को बढ़ाने की पेशकश की थी जिसे सऊदी अरब को संदेश देने के तौर पर देखा गया.

घाटे की भरपाई

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लेकिन यह सवाल आखिर रह ही जाता है कि सऊदी अरब इस खेल को कब तक जारी रख पाएगा और अगर तेल की कीमतें गिरती रहीं तो उसे अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है.

सऊदी अरब के पास 741 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है और पिछले वित्तीय वर्ष 15 अरब डॉलर की कमाई हुई.

इसलिए यह माना जा सकता है कि सऊदी अरब अगले कुछ सालों तक बजट घाटे की भरपाई अपनी जरूरत के मुताबिक कर सकता है.

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