..कैमरा तो बस तस्वीरें लेगा!

रंगभेद के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

चार नवंबर 2008 की रात थी वह. वॉशिंगटन, शिकागो, न्यूयॉर्क, फ़िलाडेल्फ़िया न जाने कितने अमरीकी शहरों की सड़कों पर लोग निकल आए थे गाते-बजाते, एक दूसरे को गले लगाते, हर रंग के लेकिन ज़्यादातर काले.

अमरीका ने उस रात अपना पहला काला राष्ट्रपति चुना था.

तस्वीर कुछ वैसी ही थी जैसी रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब में दिल्ली की सड़कों की खींची है जब नेहरू ने आज़ादी के ऐलान के बाद अपना मशहूर 'ट्रिस्ट विद डेस्टनी' भाषण दिया था.

पांच नवंबर की दोपहर को मैं नॉर्थ कैरोलाइना के शारलट शहर में था. उन इलाकों में एक जहां काले-गोरे की खाई का पुराना इतिहास था.

एक नाई की दुकान में एक काली महिला बाल भी काट रही थी, गा भी रही थी और थिरक भी रही थी. मैंने पूछा—आज अमरीका में क्या नया है?

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Image caption अमरीका में काले लोगों की हत्याओं के मामलों में प्रदर्शन तेज़ हो गए हैं.

उनका जवाब था—गोरा आदमी रोज़ मुझे गुड मार्निंग कहता था. आज उसने जिस तरह से गुड मार्निंग कहा, उसमें कुछ अलग सा था..वो कुछ संगीतमय था.

अगले दिन मैं कभी रंगभेद का गढ़ कहे जानेवाले अलाबामा के बर्मिंघम शहर में था.

ट्रेन स्टेशन के पास एक बुज़ुर्ग मिले- मेरे हाथ में माइक्रोफ़ोन देखकर कहने लगे: “जहां आप खड़े हैं पहले यहां दो अलग-अलग नल होते थे, एक काला पानी, एक सफ़ेद पानी यानी एक कालों के लिए नल दूसरा सिर्फ़ गोरे लोगों के लिए. आज देखिए हम कितनी दूर निकल आए हैं.”

क्या सचमुच?

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काले राष्ट्रपति से जो उम्मीदें पाल ली थीं अमरीका ने, उन्हें सुनकर लगता था जैसे ओबामा के हाथों में जादू की छड़ी होगी, जिसे घुमाते ही इस देश से काले-गोरे का भेद हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा.

पिछले कुछ हफ़्तों में लोग रातों को फिर से अमरीका की सड़कों पर निकले हैं, नारे लगा रहे हैं, हर रंग के लेकिन ज़्यादातर काले.

अब उम्मीद नहीं, नाउम्मीदी है, ग़ुस्सा है, मायूसी है. ग़ुस्सा इसलिए भी ज़्यादा क्योंकि उन्हें लगता है कि ओबामा के रहते हुए ऐसा हो रहा है.

येल विश्वविद्यालय के काले छात्रों ने अपने अजन्मे बच्चों के नाम खत लिखा है—इस देश में तुम कुछ भी बन जाओ, लोगों को तुम्हारा कालापन ही नज़र आएगा.

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दूसरे ने लिखा है—ये दुनिया तुम्हारे लिए तैयार नहीं है. मैं तुम्हें सीने से लगाए रखूंगा तब तक, जब तक ये दुनिया तुम्हें प्यार करने को तैयार न हो जाए.

गोरे पुलिसवालों पर कालों का यकीन नहीं है. कालों की कद-काठी गोरे पुलिसवालों के मन में कहीं न कहीं एक ख़ौफ़ पैदा करती है. बातचीत हो तो कैसे हो?

रंग का फ़ैसला!

कहीं किसी का बेटा पुलिस का शिकार बना है तो कहीं छह बच्चों का बाप. किसी की दम घुटने से मौत हुई है तो किसी की बंदूक़ की गोली से.

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मरने वाला अक्सर काला होता है, मारनेवाला अक्सर गोरा. सही-ग़लत की लकीर अक्सर धुंधली सी होती है. कालों का पक्ष रखने वाले ज़्यादातर काले हैं, पुलिस का पक्ष रखने वाले ज़्यादातर गोरे.

ओबामा ने हर पुलिसवाले की वर्दी पर कैमरा लगाने का ऐलान किया है. लोग सही-ग़लत का फ़ैसला नहीं कर पाए, तो कैमरा क्या करेगा? वह तो बस तस्वीरें लेगा, रंग तो उसमें लोग ही भरेंगे.

पूरी दुनिया को नसीहत देने वाले अमरीका को आज अपने आप से बात करने की ज़रूरत है, अपने अंदर झांकने की ज़रूरत है.

वहां किसी कैमरे के बगैर ही, सही और ग़लत बिल्कुल साफ़ नज़र आता है.

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