'सूखी लकड़ी की तरह टूट रहे थे हाथ..'

केन्या बस हमला

पिछले महीने कीनिया-सोमालिया सीमा पर अल शबाब के लड़ाकों ने एक बस पर हमला कर 28 लोगों की जान ले ली थी.

हमले में एक स्कूली प्रधानाध्यापक डगलस ओंडारी बच गए थे, पर उनकी पत्नी और अन्य 27 लोगों को उनके सामने ही मार डाला गया था.

ओंडारी ने अपनी दर्दनाक कहानी बीबीसी से साझा की.

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हम मनडेरा से नैरोबी के लिए रात दो बजे निकले. मैं सीट नंबर 34 पर था और मेरी पत्नी मुझसे अगली सीट नंबर 31 पर थीं.

क़रीब 15 किलोमीटर आगे सड़क पर खड़े छह लोगों ने ख़ुद को सैनिक बताते हुए गोलियां चलाईं और बस रोकने को कहा.

उनके चेहरे ढके थे, सिर्फ़ आंखें दिख रहीं थीं. ड्राइवर ने कहा-"ये अल शबाब हैं, सैनिक नहीं हैं."

ड्राइवर ने बस भगाने की कोशिश की, पर लड़ाकों ने बस पर गोलियां चला दीं. आगे कुछ लड़ाके ग्रेनेड लिए खड़े थे.

वो चिल्लाए, अगर बस न रुकी, तो वो उसे उड़ा देंगे.

कुछ लोगों ने ड्राइवर से बस रोकने को कहा. उन्हें ग्रेनेड का निशाना बनने से यही बेहतर लगा.

ज़बर्दस्ती रोका

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एक तरह से ड्राइवर को बस रोकने के लिए मजबूर किया गया.

ड्राइवर ने बस रोक दी, पर दरवाज़ा नहीं खोला. बंदूक़धारियों ने दरवाज़े पर गोलियां चलाईं और अंदर घुस आए.

वे अगला शीशा तोड़कर भी बस में घुसे. कुछ बस की छत पर चढ़ गए. वे अंग्रेज़ी, स्वाहिली और सोमाली बोल रहे थे.

हम सब एक दूसरे के ऊपर बस के फ़र्श पर लेट गए थे. उन्होंने हमसे सीटों पर बैठने और ड्राइवर से उसी रास्ते पर नैरोबी की ओर बस ले चलने को कहा.

मैंने देखा कि मुझसे अगली सीट पर सोमाली सा दिख रहा आदमी एक ओर झुका हुआ है. उसके बदन से खून बह रहा था. एक गोली उसे लगी थी.

मैंने उससे बात करने की कोशिश की. उसका हाथ हिलाया, लेकिन वह मर चुका था.

बंदूकधारी सोमाली दिख रहे व्यक्ति को गोली लगने पर उदास से दिखे.

हाथ तोड़े

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Image caption हमलावरों ने ग़ैर मुसलिमों को चुन-चुन कर गोली मारी थी.

वो ड्राइवर पर चिल्लाए और उसे फ़र्स्ट एड देने को कहा.

एक बंदूक़धारी ने उसका इलाज करने की कोशिश की, पर जल्द ही उन्हें भी पता चल गया कि वह मर चुका है.

एक जगह बस मुख्य रास्ते से भटक गई और कीचड़ में फँस गई.

उन्होंने ड्राइवर और कंडक्टर से बस से बाहर निकलकर कीचड़ साफ़ करने को कहा. लेकिन कुछ फ़ायदा नहीं हुआ. बस फँसी ही रही.

उन्होंने हमारे पहचान पत्र पहले ही जांच लिए थे. हममें से जो सोमाली नहीं थे या नज़दीक के किसी क़बीले से थे, उनसे बस से बाहर निकलने के लिए कहा गया.

उन्होंने पहले महिलाओं से जाने के लिए कहा, जो बस के एक ओर खड़ी हो गईं. उसके बाद उन्होंने पुरुषों से बाहर निकलने के लिए कहा.

जब पुरुष दरवाज़े पर पहुंचते तो उनके हाथ को हैंडल में फंसाकर तोड़ दिया जाता. सूखी लकड़ी टूटने की सी वह आवाज़ बहुत भयावह थी.

मैं बस में बैठे-बैठे पसीने-पसीने हो गया था. मेरा हाथ मुझसे अगली सीट पर मरे पड़े व्यक्ति के ख़ून से लाल हो गया था.

मेरा हाथ फिसल गया और बंदूक़धारी को लगा कि उसने उसे तोड़ दिया है. सिर्फ़ कीनियाई पुरुषों के ही हाथ तोड़े गए.

पैसे लिए

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फिर उन्होंने लोगों से क़ुरान की आयतें सुनाने को कहा. जो सुना सकते थे, उन्हें अलग खड़ा कर दिया गया.

जिन्होंने नहीं सुनाया, उन्हें सिर झुकाकर ज़मीन पर लिटा दिया गया. हम 30 लोग थे.

महिलाओं को एक तरफ़ लिटाया गया और पुरुषों को दूसरी तरफ़.

जो पुरुष मेरे बगल में लेटे थे मैं उन्हें जानता था. एक मेरा दोस्त था. दो मनडेरा के सैनिक थे, दो अन्य डॉक्टर थे.

उनसे ड्राइवर ने पैसे लेकर छोड़ने की ग़ुहार लगाई, पर वो नहीं माने.

मेरी पत्नी ने अपने पर्स में रखे सभी पैसे मुझे दे दिए थे. मैंने एक बंदूक़धारी, जो स्वाहिली बोलता था, से कहा कि भाई तुम पैसे लो और हमें छोड़ दो.

उसने पूछा तुम किसके साथ हो? मैंने बताया अपनी पत्नी के साथ.

पहले उसने मना किया, फिर उन्होंने उन सबसे पैसे ले लिए जो सोमाली नहीं थे.

'वो मेरे दोस्त का मांस था'

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उन्होंने फिर जांच की और उनके पहचान पत्र लिए जिनके पहले नहीं लिए थे.

फिर 12 बंदूक़धारी एक ओर से आए और बाक़ी दूसरी ओर से.

उन्होंने कहा, "अपने कीनियाई सैनिकों से कहो कि आएं और तुम्हें बचाएं."

फिर उन्होंने एक-एक करके लोगों को मारना शुरू कर दिया. मेरा नंबर पांचवां था.

मैंने अपनी पत्नी को मारे जाते देखा. मैंने सुना कि मेरी पत्नी ने कहा, "हे ईश्वर." मैंने उसके मुंह से बस यही बोल सुने.

मैंने अपने पत्नी के पास जाने की कोशिश की, लेकिन मेरे पास लेटे सैनिक ने कहा कि कुछ मत करो, बस पड़े रहो. अपने हाथ भी ऊपर मत उठाओ.

उन्होंने गोलियां चलानी शुरू कर दीं. मेरे दोस्त की बारी आ गई. मुझे लगा कि मेरे सिर पर कुछ मिट्टी सी गिरी है. फिर मुझे अहसास हुआ कि वह मेरे दोस्त का मांस है.

वे हर व्यक्ति को छह गोलियां मार रहे थे.

मैं बच गया

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मेरे बदन पर बस में मुझसे आगे बैठे व्यक्ति का ख़ून पहले से लगा था. मेरे सिर पर मेरे दोस्त का मांस भी लगा था. मुझे लगता है कि उसी ने मेरी जान बचा दी.

जब गोलियों की आवाज़ रुकी तो मैंने उन्हें सोमाली बोलते हुए सुना. वो हम सबको गोलियां मार रहे थे.

फिर उन्होंने तालियां बजानी शुरू कीं. क़रीब 30 मिनट बाद सभी आवाज़ें शांत हो गईं.

मुझे नहीं पता कि कितना वक़्त और बीता. फिर मैंने कुछ सैनिकों को बोलते सुना. वे कह रहे थे, "क्या उन्होंने हमारे लोगों की जान ले ली."

ये सुनकर मैं उठ गया. वे मनडेरा से आए सैनिक थे. वही मुझे अस्पताल ले गए.

मैं जब से अस्पताल पहुंचा हूँ, बहुत बुरी मानसिक हालत में हूं. मैं ईश्वर से दुआ करता हूं कि वो उन लोगों को माफ़ करे, जिन्होंने हमारे साथ ऐसा किया. सभी को मासूमों के लिए दुआ करनी चाहिए.

(डगलस ओंडारी द्वारा बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के आउटलुक कार्यक्रम में सुनाई गई आपबीती पर आधारित)

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