लड़कियों को नहीं लगता 'तालिबान से डर'

  • 9 दिसंबर 2014
अफगानिस्तान में स्कूली लड़कियां इमेज कॉपीरइट

अफ़ग़ानिस्तान में महिलाएँ घरेलू हिंसा, अशिक्षा, जबरन विवाह और तालिबान जैसी कई चुनौतियों से जूझती रही हैं.

लेकिन बदलते राजनीतिक माहौल के बाद यहां बदलाव की सुगबुगाहट महसूस की जा सकती है.

पढ़िए पूरी रिपोर्ट.

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काबुल में जारगुआना बालिका विद्यालय में पढ़ने वाली 19 साल की रीता फैजी निडरता से कहती है, "मुझे अपने देश पर गर्व है, स्कूल जाने पर गर्व है. क्योंकि मैं अपने देश का भविष्य बनाना चाहती हूं."

तो क्या अब अफगान में लड़कियां अपनी मर्जी से जीने लगी हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं.

अब भी लड़कियाँ अकेली बाहर नहीं जा सकतीं. यहाँ बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं.

चुनौतीपूर्ण किरदार

रीता जैसी लड़कियां जानती हैं कि उनकी बोल्ड शख्सियत अफ़ग़ानी लड़कियों और महिलाओं से जुड़ी चुनौतियों से मेल नहीं खातीं.

इनकी निडर आवाज़ में वो कंपन भी महसूस होता है जो उनके सिर पर आजीवन लटकती दोधारी तलवार के कारण पैदा होता है.

अफ़ग़ानिस्तान में मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल की ओर से प्रायोजित नए नाटक "इवेन इफ वी लूज आवर लाइव्स" में तीन जाबांज महिलाओं का चुनौतीपूर्ण किरदार है.

लेकिन अफ़सोस कि इन तीनों किरदारों ने चुप्पी तोड़ी तो उनकी जिंदगी बेआवाज़ हो गई.

इनमें से एक स्त्री रोग विशेषज्ञ और दूसरी स्कूल की प्रधान अध्यापिक प्रवीणा हैं जिन्हें जान की धमकी के कारण छिप कर जीने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.

तीसरी महिला मीनाक्षी की जिंदगी पर भी ख़तरा मंडरा रहा है. वे महिला अधिकार कार्यकर्ता हैं.

मातओं की मृत्यु दर घटी

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अफ़ग़ानिस्तान में इन ख़ामोश औरतों के उलट काबुल स्थित रबिया बाल्की अस्पताल में औरतों की दुनिया की एक नई खिड़की खुलती है.

यहां का नजारा ही अलग है. सुशिक्षित अफगान महिला डॉक्टर, प्रशिक्षित महिला नर्स महिला मरीजों की देखभाल में जुटी हुई हैं.

अस्पताल के हॉल में नीले रंग के कोट और कैप पहनी युवतियों का झुंड खड़ा है. ये महिलाएं देईकुंदी प्रांत जैसे दूर दराज इलाकों से दाई का काम सीखने आई हैं.

प्रशिक्षण कार्यक्रम की प्रमुख मीरा सरवर बताती हैं, "दो साल के प्रशिक्षण के बाद हम इन्हें उन्हीं के इलाक़े में भेज देंगे जहां क्लीनिक, नर्स और डॉक्टर नदारद हैं."

अफ़ग़ानिस्तान में अधिक दाइयों, अधिक क्लीनिकों और कुछ इलाकों में इलाज की बेहतर सुविधाओं के कारण माताओं की मृत्यु दर घट रही है. कभी ये दुनिया में सबसे अधिक थी.

चुप्पी टूट रही है

रबिया बाल्की अस्पताल में लिंगभेद से जुड़ी हिंसा की शिकार महिलाएं भी आती हैं.

अस्पताल प्रमुख डॉ. अवीद देयार बताती हैं, "इन मरीजों में शारीरिक हिंसा, मानसिक उत्पीड़न और बलात्कार सहित यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाएं शामिल हैं."

अवीद कहती हैं कि इन मरीजों में किशोरियों से लेकर छोटी उम्र की लड़कियां भी शामिल हैं.

वे बताती हैं कि पहले इस तरह की हिंसा के 10 मामलों में से केवल एक मामला ही सामने आता था. लेकिन अब महिलाएं चुप्पी तोड़ने लगी हैं.

उन्हें अब पहले से कहीं अधिक मजबूत कानूनी हथियार मिल गया है.

साल 2009 से प्रभाव में आया 'महिलाओं के खिलाफ हिंसा उन्मूलन' से जुड़ा क़ानून औरतों के लिए मील का पत्थर साबित हुआ है.

निडर लड़कियां

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Image caption मीरा सरवर दाई के काम के लिए महिलाओं को प्रशिक्षित करती हैं.

काबुल में जारगुआना जैसे स्कूलों के जरिए महिलाओं को सशक्त करने की कोशिश की जा रही है.

यहां पढ़ने वाली रीता फैजी के क्लास की लड़किया उन तालिबान के बारे में क्या सोचती हैं जिन्होंने कभी उनकी शिक्षा पर पाबंदी लगाई थी. कहीं उनके मन में तालिबान के लौटने का ख़ौफ़ तो नहीं है?

लड़कियों एक स्वर में कहती हैं, "हम उन्हें अपने ज्ञान और शिक्षा से हरा देंगे."

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