मलाला को है प्रधानमंत्री बनने की चाहत

मलला युसुफ़ज़ई इमेज कॉपीरइट Reuters

पाकिस्तान में बच्चियों की शिक्षा के लिए आवाज़ उठाने की वजह से मलाला यूसुफ़ज़ई पर तालिबान ने हमला किया था. हमले के बाद इलाज के लिए उन्हें लंदन ले जाया गया.

वो वहीं से पाकिस्तान और दुनिया भर में बच्चों की शिक्षा के लिए आवाज़ बुलंद कर रही हैं. उनके इस काम को देखने हुए उन्हें भारत के कैलाश सत्यार्थी के साथ नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना गया है. उन्हें यह पुरस्कार बुधवार को दिया जाएगा.

बीबीसी से बातचीत में मलाला ने कहा है कि वे पढ़ाई पूरी करने के बाद पाकिस्तान में राजनीति में जाना चाहती हैं और शायद प्रधानमंत्री बनना चाहेंगी.

पुरस्कार मिलने से पहले मलाला ने बीबीस उर्दू से ख़ास बातचीत की.

पढ़िए मलाला यूसुफ़ज़ई की क्या हैं ख्वाहिशें...

मुझे बहुत खुशी हो रही है. मुझे गर्व हो रहा है कि पाकिस्तान को इतना बड़ा पुरस्कार मिला है. यह पुरस्कार मेरे लिए नहीं है. बल्कि मेरे देश और उन बच्चों के लिए है, जो अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाते हैं. बच्चे जिन समस्याओं का सामना कर रहे हैं, वो स्कूल नहीं जा सकते हैं, घरेलू मामलों की वजह से उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है. ऐसी समस्याओं को उठाया जा रहा है.

इमेज कॉपीरइट AFP

यह तो अभी एक बहुत लंबे सफर की शुरुआत है. आप देखेंगे कि करीब पांच करोड़ 70 लाख बच्चे स्कूलों से बाहर हैं. यह एक बहुत बड़ा ख्वाब है. आप ऐसे हर एक बच्चे को स्कूल भेजना चाहते हैं. मैं वो दिन देखना चाहती हूं जब कोई भी बच्चा स्कूल से बाहर न हो. यह एक बहुत बड़ा अभियान है. इसके लिए सबको मिलकर काम करना होगा. इल लक्ष्य को पाने के लिए यह ज़रूरी है कि दुनिया के नेता इसे पाने के लिए एक हो जाएं और इसे अपनी पहली प्राथमिकता बनाएं.

सहस्राब्दी लक्ष्य

आज से 15 साल पहले जो सहस्राब्दी लक्ष्य बनाए गए थे, तो प्राथमिक शिक्षा को उसमें शामिल किया गया था. लेकिन अब हम चाहते हैं कि इसमें माध्यमिक शिक्षा को भी शामिल किया जाए. अगर हम तरक्की पाना चाहते हैं और चाहते हैं कि हर कोई आगे बढ़े, तो इसके लिए ज़रूरी है कि हर बच्चे को शिक्षा दी जाए.

इमेज कॉपीरइट Getty

मैं बच्चों की आवाज़ को उठाउंगी. हमने मलाला फंड बनाया है. इसके अलावा मैं इस बात की भरपूर कोशिश करुंगी कि बच्चों की आवाज़ बुलंद कर सकूं. उनकी आवाज़ को दुनिया तक पहुंचा सकूं.

आप देख रहे हैं कि सीरिया के बहुत से बच्चे बेघर हो गए हैं. वो स्कूल नहीं जा सकते हैं. नाइजीरिया के हालात बहुत बुरे हैं. मेरे अपने देश पाकिस्तान के 50 लाख बच्चे स्कूलों से बाहर हैं. इसलिए मैं महसूस करती हूं कि मेरे ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारियां हैं. नोबेल पुरस्कार की जो पुरस्कार राशि मुझे मिलेगी उसे स्वात और शांगलाहील के स्कूलों पर खर्च किया जाएगा. मेरी कोशिश है कि अपने गांव में मैं एक बहुत बड़ा स्कूल देख सकूं, जहाँ पर अच्छी शिक्षा दी जाए.

यह बहुत बड़ी बात है कि बच्चों की शिक्षा के लिए काम कर रहे भारत और पाकिस्तान के दो लोगों को एक साथ पुरस्कार दिया जा रहा है. मैं हमेशा शांति की पक्षधर रही हूं. मुझे यकीन है कि जब दोनों देश अमन और शांति से रहेंगे और दोनों मुल्कों में अच्छे संबंध होंगे तो हमारी तरक्की होगी. अगर हम युद्ध में पड़े रहे और एक-दूसरे को भला नहीं चाहेंगे, तो हम दोनों कामयाब नहीं हो पाएंगे.

तरक्की की राह

इमेज कॉपीरइट Reuters

यह ज़रूरी है कि दोनों देश अमन की बात करें. स्कूलों से बाहर रह रहे बच्चे, महिलाओं के साथ भेदभाव और ग़रीबी ही हमारी असली समस्याएं हैं. इन्हें हमें मिलकर हल करना चाहिए. सीमा पर बिना बजह होने वाली लड़ाइयां और आरोप-प्रत्यारोप बंद होने चाहिए. ज़मीन के लिए एक-दूसरे के खिलाफ हो जाना बहुत ही अजीब बात है. आज ज़रूरी यह है कि हम अमन की बात करें. इसी में हमारी तरक्की है.

मेरी या मेरे अभियान का विरोध करने वाले लोगों की संख्या बहुत ही कम है. बाकी का पाकिस्तान जो असली पाकिस्तान है, वो शिक्षा का समर्थन करता हैं. मेरे अभियान का समर्थन करता है. मुझे इस बात की बुहत अधिक खुशी है कि मेरे लिए पाकिस्तान में लोगों ने दुआएं की हैं. बहुत से लोग फ़ोन करकर कहते हैं कि वो मेरे साथ हैं. वो मेरे काम पर गर्व करते हैं. मैं इस बात से बहुत अधिक खुश हूं कि मेरा देश मेरे साथ खड़ा है.

विकसित पाकिस्तान

इमेज कॉपीरइट Reuters

जो लोग मेरे खिलाफ़ हैं, मैं उनसे खफ़ा नहीं हूं. मैं नाराज़ तब होती हूं जब लोग मेरे अभियान के खिलाफ आवाज उठाते हैं. ऐसे लोगों से मैं कहना चाहती हूं कि इसमें मेरा कोई व्यक्तिगत हित नहीं है. मैं सिर्फ इतना ही चाहती हूं कि हर बच्चे को शिक्षा मिले. मैंने यह अभियान इसलिए शुरू किया था क्योंकि स्वात में मैं खुद इसी हालात से गुजरी हूं. मैं स्कूल नहीं जा सकी. मेरी सहेलियां स्कूल नहीं जा सकीं.

मैं चाहती हूं कि मेरा देश एक विकसित देश बने, जहाँ बच्चों के लिए शिक्षा की अच्छी व्यवस्था हो. अच्छे अस्पताल हों. क्योंकि अगर आप पश्चिमी मुल्कों में देखें, तो वहां पर लोगों के लिए बहुत सी सुविधाएं हैं. मै सोचती हूं कि मेरा देश वैसा क्यों नहीं बन सकता हूं. मेरा यही सपना है. मैं यही करना चाहती हूं. मुझे उम्मीद है कि इस काम में लोग मेरा समर्थन करेंगे.

(बीबीसी संवाददाता आदिल शाहबज़ेब से हुई बातचीत पर आधारित)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार