क्या पाकिस्तान हमेशा के लिए बदल जाएगा?

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पेशावर में एक आर्मी स्कूल पर हुए हमले से जहां दुनिया स्तब्ध है, वहीं इसने पाकिस्तान में सेना और सरकार दोनों को अंदर तक झकझोर दिया है.

इसीलिए उन्हें अपनी नीतियों पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ 'अच्छे और बुरे तालिबान' में कोई फ़र्क़ न करने की बात कर रहे हैं, जबकि इस हमले ने सेना को वहां चोट दी है जहां तकलीफ़ सबसे ज़्यादा होती है यानी बच्चों को निशाना बनाया.

चरमपंथियों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के आरोप झेलने वाले पाकिस्तान को पेशावर हमला क्या हमेशा के लिए बदल देगा?

सुबह से शाम तक बेटे को तलाशता रहा

पढ़िए विस्तार से पूरा विश्लेषण

वो देश जिसने 13 साल के दौरान अपने 70 हज़ार नागरिक चरमपंथी हिंसा की घटनाओं में गंवाए हैं, उसके लिए निर्णायक चरण की बात करना आसान नहीं है.

लेकिन पेशावर में एक आर्मी स्कूल पर तालिबान के हमले में 132 बच्चों का मारा जाना शायद एक ऐसे देश के लिए बदलाव का वो लम्हा हो जिस पर दुनिया चरमपंथियों को एक रणनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के आरोप लगाती रही है.

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पेशावर हमले के अगले दिन देश में मातम छाया था और मारे गए लोगों को दफ़नाया जा रहा था, उसी दौरान पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व ने घोषणा की कि वो अच्छे और बुरे तालिबान में कोई फर्क नहीं करेगा.

प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ ने अपने समर्थकों और विरोधियों के साथ बैठकर ये संकल्प किया कि लड़ाई आख़िरी चरमपंथी के मारे जाने तक जारी रहेगी.

जब ये घोषणा हो रही थी, तो पाकिस्तानी के सेना प्रमुख अफ़ग़ान राष्ट्रपति से मिल रहे थे ताकि इस नासूर से लड़ने के लिए उनकी मदद ली जा सके.

नीति से स्तर पर भ्रम

क्या ये वही मौक़ा है जिसकी पाकिस्तान को कई बरसों से तलाश थी.

इसका जवाब शायद नवाज़ शरीफ़ के बयान में है जो न सिर्फ़ एक नई नीयत की निशानदेही करता है बल्कि इस बात को स्वीकार करता है कि पाकिस्तान ने अपनी सरज़मीन से लड़ने वाले अलग अलग चरमपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ दोगली नीति अपनाई हुई थी.

आसान शब्दों में इसे ऐसे समझ सकते हैं कि जो ताक़तें अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय हैं या भारतीय सेना के ख़िलाफ़ नियंत्रण रेखा के उस पर कश्मीर में लड़ रही हैं वो 'अच्छे तालिबान' हैं और जिन्होंने 11 सितंबर को बाद अपने आपको अल क़ायदा के साथ जोड लिया है और पाकिस्तान के अंदर दहशतगर्दी फैला रहे हैं वो 'बुरे तालिबान' हैं.

समस्या यकीनन यही है कि ये फ़र्क़ न तो तालिबान के ज़ेहन में इतना साफ़ है और पाकिस्तान के नीति निर्माताओं को जेहन में.

अकसर पाकिस्तान में तालिबान से टूट टूट कर बनने वाले गुट नीति के स्तर इस भ्रम की स्थिति का फ़ायदा उठाते हैं और देश के क़बायली हिस्से में बिना रोक टोक अपनी बुनियादें मज़बूत करते रहे हैं.

कियानी की निष्क्रियता

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Image caption राहील शरीफ़ ने कार्यभार संभालते ही उत्तरी वजीरिस्तान में अभियान शुरू किया

मौजूदा सेना प्रमुख राहील शरीफ़ से पहले जनरल कियानी की निष्क्रियता ने तालिबान को एक अतिरिक्त बोनस दिया.

अपने छह साल के कार्यकाल में कयानी को आलोचना भी झेलनी पड़ी क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व की तरफ से पूरा अधिकार दिया जाने के बावजूद उन्होंने चरमपंथ को ख़त्म करने के लिए कोई निर्णायक नीति नहीं अपनाई.

इसका परिणाम ये हुआ कि तालिबान का सैनिकों पर ताज़ा हमला सेना में बेचैनी पैदा करता है. इसने सेना में न सिर्फ़ सरकार के ख़िलाफ़ बल्कि अपने नेतृत्व के ख़िलाफ़ भी नाराज़गी बढ़ाई है.

यही वजह है कि राहील शरीफ़ ने बिना कोई वक़्त गंवाए, उत्तरी और दक्षिणी वजीरिस्तान में ऑपरेशन शुरू किया जहां बड़े इलाक़े तालिबान के नियंत्रण में हैं.

इसके बावजूद नीतिगत स्तर पर भ्रम में घिरे पाकिस्तानी के राजनीतिक नेतृत्व की इस ऑपरेशन पर प्रतिक्रिया बहुत उत्साहजनक नहीं थी.

जनरल राहील शरीफ़ ने साफ़ तौर पर कहा कि 'हम उन्हें पकड़ेंगे बेशक वो पाकिस्तानी तालिबान हो, पंजाबी तालिबान हो, अल कायदा के साथी और समर्थक हो या सबसे ज़्यादा ख़ौफ़नाक हक्कानी नेटवर्क के लोग हों.'

ये अलग बात है कि पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व ने इस पर चुप्पी साधना ही बेहतर समझा.

लेकिन पेशावर ने हमले में बेशक हालात को बदला है.

'घरों तक पहुंची लड़ाई'

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Image caption घायलों का हालचाल लेते प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ और सेना प्रमुख राहील शरीफ़

संक्षेप में तालिबान को वो तो हासिल नहीं हुआ जिसकी उन्हें तमन्ना थी लेकिन उन्होंने सेना को वहां चोट दी जहां उसे सबसे ज़्यादा तकलीफ़ हुई.

सेना के तत्वाधान में चलने वाले 128 स्कूलों में डेढ़ लाख छात्र पढ़ते हैं और इनमें 90 फ़ीसदी बच्चे सेना के अफ़सरों और जवानों के होते हैं.

इस हमले ने लड़ाई को फ़ौज के घर तक अपनी पूरी बर्बरता के साथ पहुंचा दिया है.

तालिबान के लिए हमला एक बदला था और इसके पीछे कोई रणनीतिक या राजनीतिक सोच काम नहीं कर रही थी सिवाए इस सोच के कि दहशत के ज़रिए शासन किया जाए.

ये उनके लिए बेशक कोई मायने नहीं रखता है कि हमला कर उन्होंने पाकिस्तान के सिविल और फौजी नेतृत्व को अच्छे और बुरे तालिबान की अपनी नीति पर फिर से विचार करने को मजबूर कर दिया है.

'आंसुओं में बही सहानुभूति'

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जनरल राहील शरीफ़ के लिए ज़्यादा अहम बात ये है कि अगर सेना के अंदर तालिबान के लिए कोई सहानुभूति थी, इस हमले के बाद वो सैकड़ों सैनिकों के परिवार के आंसुओं में बह गई होगी.

क्या इसका ये मतबल है कि पाकिस्तान में चरमपंथ के ख़िलाफ़ असल लड़ाई शुरू हो गई है.

तालिबान के साथ पाकिस्तान के रिश्तों के पेचीदा इतिहास को देखते इस सवाल का निश्चित जवाब देना अभी मुश्किल है.

लेकिन जो स्पष्ट है वो ये कि पाकिस्तान अब स्पष्ट और दमदार बदला चाहता है. कम से कम अभी तो ऐसा ही लगता है.

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