पाक: आठ हज़ार लोग फांसी की क़तार में

  • 20 दिसंबर 2014
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पाकिस्तान की जेलों में बंद सज़ा-ए-मौत पाने वालों की तादाद 8,000 से ज़्यादा है. पाकिस्तान में आतंक विरोधी कानून के तहत अदालत अब तक तकरीबन 1000 मामले में फांसी की सज़ा सुना चुकी है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ पेशावर के एक स्कूल में तालिबान चरमपंथियों के हमले के बाद चरमपंथ से जुड़े मामलों में फांसी की सज़ा फिर से बहाल करने की घोषणा कर चुके हैं.

पिछले कुछ वर्षों में क़रीब 17 ऐसे लोग हैं जिन्हें सैन्य संस्थानों और सेना के अधिकारियों को निशाना बनाने की वजह से मौत की सज़ा सुनाई गई है.

आशंका जताई जा रही है कि कुछ दिनों में उन्हें फांसी देने के बारे में आगे कार्रवाई हो सकती है.

इन लोगों को सेना के बड़े अधिकारियों को निशाना बनाने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. इनमें लेफ्टिनेंट जनरल पद के अधिकारी भी शामिल हैं.

इन्हें सबसे पहले फांसी देने का फैसला सेना और राजनीतिक नेतृत्व ने सोच-विचार कर किया था.

सज़ा-ए-मौत पर पाबंदी

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पाकिस्तान में सज़ा-ए-मौत पर साल 2008 में प्रतिबंध लगा था जब पीपुल्स पार्टी की सरकार थी.

इसके बाद के छह सालों के दौरान सिर्फ़ दो फांसी की सज़ा सुनाई गई थी. ये दो सज़ाएं भी किसी सामान्य नागरिक को नहीं बल्कि उन सैनिकों को दी गई थी जिनका कोर्ट मार्शल हुआ था.

कुछ दिन पहले चरमपंथ से जुड़े मामलों में फाँसी की सज़ा पर रोक हटने के बाद शुक्रवार शाम को सबसे पहले फांसी की सज़ा पाने वाले थे डॉक्टर उस्मान उर्फ़ अक़ील.

वर्ष 2009 में रावलपिंडी में पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय पर हुए हमले के इल्ज़ाम में उन्हें गिरफ़्तार किया गया था.

उनका कोर्ट मार्शल भी किया गया था जिसके बाद उनको फांसी की सज़ा सुनाई गई थी.

इसके अलावा दूसरे शख्स हैं अरशद मेहरबान जिन पर वर्ष 2005 में पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ पर हुए हमले का दोषी ठहराया जाता है.

अरशद मेहरबान का ताल्लुक पाकिस्तानी सेना से था.

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