रूस के रूबल संकट के लिए ज़िम्मेदार कौन?

  • 21 दिसंबर 2014
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रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने गुरुवार को साल की अपने आख़िरी प्रेस कांफ्रेंस में अमरीका और यूरोपीय संघ पर उनके देश को कमज़ोर करने का आरोप लगाया था.

लेकिन पुतिन को किसी और को ज़िम्मेदार ठहराने की बजाय ख़ुद इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.

रूस पश्चिम को दोषी ठहराता है. न केवल यूक्रेन के संकट के लिए बल्कि तेल की गिरती क़ीमतों के लिए भी और ग़ोते खा रहे रूबल के लिए भी.

यूक्रेन के सवाल पर रूस का कहना है कि वहां होने वाली उथल-पुथल के पीछे पश्चिमी ताक़तों का हाथ है.

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रूस की सत्ता के गलियारों में इस बात को लेकर बहस जारी है कि अमरीका और सऊदी अरब मिलकर कोई साज़िश रच रहे हैं और इसमें नैटो की आर्थिक मोर्चे पर भी जंग शुरू करने की रणनीति हो सकती है.

लेकिन हक़ीकत यह है कि जंग और रूबल का संकट टाला जा सकता था और तेल के निर्यात पर निर्भर किसी अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से इस बात को समझा जा सकता है.

रूस को यह बात अच्छी तरह से पता थी. तब से पता थी जब दस साल पहले तेल की क़ीमतें परवान चढ़नी शुरू हुई थीं.

उसी दौरान रूस में उस चीज़ की बुनियाद पर एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था पनप रही थी जिसे व्लादिमीर पुतिन नियंत्रित नहीं कर सकते थे और वह चीज़ थी- तेल की क़ीमत.

कटौती और बचत

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साल 2013 के लिए रूस के बजट में कहा गया था कि संघीय राजस्व का 50 फ़ीसदी हिस्सा तेल और गैस की बिक्री से आया था.

और सबसे ख़राब बात यह है कि रूस की तक़रीबन आधी आबादी का ख़र्चा सरकारी पैसे से चलता है. इनमें सरकारी कर्मचारी और पेंशनभोगियों का बड़ा तबक़ा है.

रूसियों को अब ख़र्चों में कटौती और बचत का रास्ता चुनना पड़ सकता है.

पुतिन ने अपने प्रेस कांफ्रेंस में कहा भी, "अगर हालात इसी तरह ख़राब रहें तो हमें अपनी योजनाएँ फिर से बनानी पड़ सकती है और निश्चित है कि कुछ चीज़ों में कटौती भी की जाएगी."

बजटीय संतुलन

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रूस का सोचना है कि तेल की क़ीमतें 100 डॉलर से ऊपर रहेंगी और साल 2015 के लिए उसने अपने ख़र्चों की योजना इसी मुताबिक़ बना रखी है.

यह देश अपने बजट में तभी संतुलन साध पाएगा जब तेल की क़ीमतें इस बिंदु के आस-पास रहे.

आने वाले समय में हो सकता है कि रूस के पास अपने लोगों की देशभक्ति को रिझाने के लिए बहुत ज़्यादा पैसा न रहे.

सोची ओलम्पिक में उसने 50 अरब डॉलर का ख़र्चा किया था और एक अनुमान के मुताबिक़ क्राइमिया अभियान में उसने 75 अरब डॉलर लगाए.

मौद्रिक संकट

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आम लोग जो अब तक यह सोचते आए थे कि पुतिन की वजह से उनका उच्च जीवन स्तर सुधरा है, वे शायद पहले जैसा न सोचें.

जबकि रूस का उच्च वर्ग अब रूसी राष्ट्रपति को आर्थिक स्थिरता की गारंटी के तौर पर नहीं देखेगा. सरकारी ख़र्चों में कटौती की योजनाओं में नौकरियों से छंटनी भी शामिल है.

इस बात का ख़तरा भी है कि रूस को इस मौद्रिक संकट से उबरने के लिए एक अर्से तक मुद्रास्फीति का भी सामना करना पड़ सकता है जो आम लोगों के जख़्मों पर नमक छिड़कने जैसा होगा.

पुतिन की ज़िम्मेदारी

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रूस का लगता है कि अमरीका और सऊदी अरब ने मिलकर तेल की क़ीमतों को गिराने की साज़िश की है ताकि ईरान और उसे नुक़सान पहुंचाया जा सके.

लेकिन इस बात से रूस के संकट के लिए पुतिन की ज़िम्मेदारी कम नहीं हो जाती.

रूस के उदारवादियों और परंपरावादियों के बीच बीते दशक से एक ऐसी अर्थव्यवस्था बनाने पर बहस जारी है जो तेल की क़ीमतों में होने वाले किसी भी तरह के परिवर्तनों से ज़्यादा प्रभावित न हो.

रूबल की नज़ाकत को भी ख़ूब समझा गया है और रूस के राजनीतिक वर्ग में इस बात को लेकर भी सहमति है कि जब तक निर्यात से होने वाली कमाई का 60 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सा तेल बेचकर आता रहेगा, उनकी मुद्रा को 'पेपर ऑयल' से ज़्यादा नहीं समझा जाएगा.

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