'भारत फांसी दे तो ठीक, पाक दे तो दिक़्क़त'

  • 21 दिसंबर 2014
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Image caption पेशावर के आर्मी स्कूल पर हुए तालिबान के हमले में कम से 140 लोग मारे गए जिनमें ज़्यादातर बच्चे थे

पेशावर में पिछले दिनों एक आर्मी स्कूल पर हुए हमले पर ही ख़ास तौर से पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में चर्चा हो रही है.

नवा-ए-वक़्त का संपादकीय है- दहशतगर्दों, उनके मददगारों और समर्थकों, सबके के ख़िलाफ़ ऑपरेशन लाज़िमी.

अख़बार लिखता है कि देश में पंख फैलाते दहशतगर्दों के ख़िलाफ़ बिना किसी भेदभाव के पहले ही कार्रवाई शुरू कर दी गई होती तो 'हमें वाघा बॉर्डर और पेशावर आर्मी स्कूल जैसे हमले न झेलने पड़ते.'

अख़बार कहता है कि देर आयद दुरुस्त आयद ही सही, लेकिन अब इस नासूर को पूरी तरह ख़त्म करने के लिए दहशतगर्दों, उनके हमदर्दों और समर्थकों के ख़िलाफ़ निर्णायक अभियान ज़रूरी है, क्योंकि इसी पर पाकिस्तान का अस्तित्व और भविष्य का दारोमदार टिका है.

कोई मिसाल नहीं

दैनिक ख़बरें ने लिखा है कि 13 साल से दहशतगर्दी की आग में जल रहे मुल्क का सब्र का पैमाना लबरेज़ हो चुका है और उसके कंधे लाशें उठा-उठाकर थक चुके हैं, लेकिन अब उसने ख़ून की होली खेलने वालों को उन्हीं की ज़ुबान में जवाब देने का फ़ैसला कर लिया है.

अख़बार लिखता है कि 16 दिसंबर का दिन पहले भी बांग्लादेश के अलग होने की वजह से पाकिस्तान के लिए काले दिन की हैसियत रखता था, लेकिन इसी दिन पेशावर के स्कूल में जो बर्बरता हुई, उसकी अतीत में कोई मिसाल नहीं मिलती.

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Image caption पाकिस्तानी सरकार का कहना है कि चरमपंथियों के खिलाफ अभियान में अच्छे और बुरे तालिबान में फ़र्क़ नहीं होगा

रोज़नामा दुनिया लिखता है कि पूरा देश आपसी मतभेदों को भुला कर दहशतगर्दों को ऐसी सज़ा देने पर तुल गया है कि वो आने वाले दिनों के लिए भी मिसाल हो.

अख़बार लिखता है कि दहशतगर्दी से निपटने के कई प्रस्ताव सामने आए हैं और एक राष्ट्रीय एक्शन प्लान कमेटी भी बनी है. साथ ही, कुछ यूरोपीय देशों के दबाव में मौत की सज़ा पर लगाई गई रोक भी अब हटा ली गई है.

इसका मतबल है कि जिन चरमपंथियों को अदालतों से मौत की सज़ा मिली है और उनकी दया याचिका ख़ारिज हो चुकी है, उन्हें फ़ौरन फांसी पर लटकाया जाएगा.

फांसी पर बहस

औसाफ़ ने पाकिस्तान में मौत की सज़ा पर रोक हटाने के फ़ैसले पर यूरोपीय संघ की आपत्ति को ख़ारिज किया है.

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अख़बार कहता है कि 'दहशतगर्द हमारे बच्चों का क़त्ले आम कर रहे हैं और यूरोपीय संघ अब भी पाकिस्तान में मौत की सज़ा का विरोध कर रहा है.'

अख़बार के मुताबिक़ भारत सज़ा-ए-मौत दे तो यूरोपीय संघ को कोई दिक़्क़त नहीं है, अमरीका, अफ़ग़ानिस्तान, ईरान और सऊदी अरब फांसियां दे तो कोई समस्या नहीं, लेकिन पाकिस्तान में सज़ा-ए-मौत पर यूरोपीय संघ को तकलीफ़ है.

उधर रोज़नामा एक्सप्रेस भी लिखता है कि दहशतगर्दों से कोई रियायत न बरती जाए.

'बेलगाम ज़ुबान'

रुख़ भारत का करें तो दिल्ली से छपने वाले हिंद न्यूज़ का संपादकीय है - पार्टी नेताओं की ज़हरीली बयानबाज़ी पर पीएम मोदी की ख़ामोशी.

अख़बार लिखता है कि लगता है नरेंद्र मोदी अपनी ख़ामोशी के ज़रिए सांप्रदायिक ताक़तों की अप्रत्यक्ष तौर पर हौसला अफ़ज़ाई ही कर रहे हैं. इसलिए ज़रूरी है कि वो चुप्पी तोड़ें और अपना रुख़ साफ़ करें.

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Image caption धर्मांतरण से लेकर गोडसे को महिमामंडित करने जैसे विषयों पर संसद में बार बार हंगामा हुआ है

हिंदोस्तान एक्सप्रेस ने भी इसी विषय को अपने संपादकीय में उठाया है और शीर्षक है- बेलगाम ज़ुबान.

अख़बार के मुताबिक़ प्रधानमंत्री मोदी अपनी पार्टी के नेताओं को लक्ष्मण रेखा पार न करने की हिदायत देते हैं, लेकिन एक के बाद एक विवादास्पद बयान आ रहे हैं.

अख़बार कहता है कि विडंबना यह है कि भाजपा नेता समझ नहीं रहे हैं कि वो सत्ता में हैं और उनके ऐसे बयानों से जनता में उनकी नकारात्मक छवि ही बनेगी.

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