पाक: चरमपंथ मामलों के लिए सैन्य अदालतें

  • 25 दिसंबर 2014
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पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल 16 दिसंबर को हुए हमले के बाद पाकिस्तान ने आतंकवाद से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए सैन्य अदालतों के गठन का फ़ैसला किया है.

प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने कहा कि इस क़दम से ये सुनिश्चित होगा कि आतंकवादी अपनी नृशंस कार्रवाइयों की क़ीमत चुकाएँ.

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Image caption पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर हमले के बाद स्कूल की चारदीवारी ऊंची करते मज़दूर

पेशावर आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए हमले में 152 लोगों की मौत हो गई थी. इनमें ज़्यादातर बच्चे थे. आतंकवाद का मुक़ाबले करने की रणनीति पर चर्चा के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक दल इन अदालतों के गठन पर सहमत हुए.

विपक्ष के नेता सईद खुर्शीद शाह ने कहा कि सैन्य अदालतों का गठन दो साल के लिए किया जाएगा. समाचार एजेंसी एएफ़पी से उन्होंने कहा कि इसमें केवल चरमपंथियों से जुड़े मामले चलाए जाएंगे और इनका इस्तेमाल राजनीतिक कारणों से नहीं किया जाएगा.

वरिष्ठ पत्रकार रहिमुल्ला यूसुफ़ज़ई का विश्लेषण

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Image caption पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल में मारे गए बच्चे

नवाज शरीफ़ सरकार ने दो तरह की अदालतों के गठन की बात कही है. पहले दो साल के लिए सैन्य अदालत गठित की जाएंगी और दूसरे विशेष आतंकवाद विरोधी अदालतों का गठन किया जाएगा.

हालांकि पाकिस्तान में पहले से ही आतंकवाद विरोधी अदालतें मौज़ूद हैं. लेकिन इन नई अदालतों में विशेष शब्द जोड़ दिया गया है. यहां इसका ख़ासा विरोध हो रहा है.

अल्ताफ हुसैन की मुत्ताहिदा क़ौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) और जमाते इस्लामी ने सैन्य ट्रायल कोर्ट के गठन का विरोध किया है. वहीं पाकिस्तान में वकीलों की बार एसोसिएशनों ने इस क़दम का विरोध करते हुए कहा है कि यह न्यायपालिका के ऊपर अविश्वास है.

मुझे लगता है कि न्यायपालिका में न्यायाधीश भी इसका विरोध करेंगे, हालांकि अभी वो खुलकर कुछ कह नहीं रहे हैं.

सख़्त क़दम

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Image caption सैन्य अदालतों का गठन केवल दो साल के लिए किया जाएगा.

सरकार ने इन अदालतों के गठन का फ़ैसला इसलिए किया, क्योंकि उसे लगता है कि आम अदालतें इस तरह के मामलों में समय पर फ़ैसला नहीं कर पा रही हैं. इस फैसले से सरकार ने यह दिखाने की कोशिश की है कि वो आतंकवाद के खिलाफ सख्त क़दम उठा रही है.

जहां तक मदरसों पर निगरानी का सवाल है, परवेज़ मुशर्रफ ने मदरसों पर निगरानी का फैसला किया था, हालांकि उसका पालन नहीं हो पाया. इसका मुल्लाओं और मदरसों के संचालकों ने विरोध किया था.

वहीं मीडिया ने कहा है कि वो आतंकवादियों से जुड़ी ख़बरें तो दिखाएंगे. लेकिन उनका महिमामंडन नहीं करेंगे.

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