अफ़ग़ानिस्तान: फिर होगा तालिबान का राज?

  • 31 दिसंबर 2014
तालिबान इमेज कॉपीरइट EPA

अफ़ग़ान तालिबान ने सोमवार को ये घोषणा कर आने वाले दिनों में टकराव की नई आशंकाओं को हवा दी कि वो विदेशी सेनाओं के जाने के बाद अफगानिस्तान में 'शुद्ध इस्लामी प्रणाली' लागू करेंगे.

रविवार को अंतरराष्ट्रीय सहायता सुरक्षा बल (आईएसएएफ़) के युद्धक मिशन को खत्म करने की घोषणा पर तालिबान ने कहा कि नैटो बल हार गए हैं और बीते 13 साल में कुछ हासिल किए बिना ही उन्होंने अपना 'झंडा लपेट लिया है'.

तालिबान का कहना है कि वो ''बाक़ी बचे हमलावरों को खदेड़कर एक शुद्ध इस्लामी राज्य की स्थापना करेंगे.''

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अफ़ग़ानिस्तान पर फिर से तालिबान का क़ब्ज़ा हो सकता है? और यदि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान मज़बूत होता है तो इसका भारत और पाकिस्तान पर क्या असर होगा?

पढ़े लेख विस्तार से

इमेज कॉपीरइट AFP

अफ़ग़ानिस्तान में फ़िलहाल पहले वाली स्थिति नहीं है जिसमें तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा कर लिया था.

कैसा होता है तालिबान के साए में रहना?

उस समय अफ़ग़ान मुजाहिद्दीन के कई नेता थे और वो आपस में बंटे हुए थे. वे आपस में लड़ रहे थे जिससे तालिबान को मौक़ा मिल गया.

यहां के लोग मुजाहिद्दीन और उनकी लड़ाइयों से तंग आ चुके थे. सफ़र करना मुश्किल हो गया था. सड़कों पर चेक-प्वाइंट थे जहां पैसे वसूल किए जाते थे.

मगर अब अफ़ग़ानिस्तान में हालात बदल चुके हैं. अभी यहां सरकार है और वो काफ़ी मज़बूत हो गई है.

मज़बूत सरकार

अमरीकी इतिहास का 'सबसे लंबा युद्ध ख़त्म'

इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption अशरफ़ ग़नी इसी साल अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति बने हैं

अब अफ़ग़ानिस्तान की अपनी सेना है जिसमें साढ़े तीन लाख सैनिक हैं. फिर अमरीकी सेना है. नैटो के भी तक़रीबन 13 हज़ार सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में बने रहेंगे.

उनके प्रशिक्षण और मदद से अफ़ग़ान फ़ौज इतनी क़ाबिल हो पाएगी कि तालिबान से निपट सके.

अफ़ग़ानिस्तान के पास बॉर्डर मिलिशिया है, उसकी अपनी वायु सेना भी बन गई है. अभी भले ये छोटी है लेकिन उसमें भी इज़ाफ़ा हो रहा है. इनके पास हर तरह के हथियार हैं.

कमी बस एक बात की है कि इनका प्रशिक्षण अभी पूरी नहीं हुआ है.

वैसे अमरीका और पश्चिमी देश अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का क़ब्ज़ा नहीं होने देंगे.

देखा जाए तो तालिबान के क़ब्ज़े में अभी एक शहर भी नहीं है.

तालिबान को कहां से ताक़त मिलती है

भारत पर असर

इमेज कॉपीरइट EPA

भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में पुनर्निमाण के लिए लगभग ढाई अरब डॉलर का निवेश किया है.

इसीलिए भारत कभी नहीं चाहेगा कि वहां पर तालिबान मज़बूत हों.

यही वजह है कि भारत अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ ग़नी की मौजूदा सरकार की पुरज़ोर हिमायत करेगा.

'प्यारी टीचर ताहिरा काज़ी, आप शहीद हैं'

इस बात की संभावना नहीं है कि तालिबान वहां से मुक्त होकर भारत या भारत प्रशासित कश्मीर पर हमला करेगा. वे अफ़ग़ानिस्तान में ही व्यस्त रहेंगे.

पाकिस्तान पर असर

ये सही है कि पाकिस्तान पर आरोप लगते रहे हैं कि वो अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को एक पूंजी मानता है.

लेकिन अब पाकिस्तान में सरकार और विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर तालिबान ने काबुल पर क़ब्ज़ा कर लिया और उनकी सरकार बन गई तो पाकिस्तानी तालिबान काफ़ी मज़बूत हो जाएंगे और वो भी चाहेंगे कि पाकिस्तान में भी वे ऐसा करें.

इमेज कॉपीरइट AFP

क्या पाकिस्तान हमेशा के लिए बदल जाएगा?

इससे पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ेंगी. पेशावर आर्मी स्कूल हमले में जिस तरह बच्चों को मारा गया, उसके बाद तो तालिबान ख़ासतौर पर पाकिस्तानी तालिबान के ख़िलाफ़ यहां काफ़ी नफ़रत है.

पाकिस्तान में ये भी कहा जाता है कि अफ़ग़ान तालिबान तक़रीबन इसी तरह के लोग हैं.

इमेज कॉपीरइट NA

आवाज़ उठाएं अफ़ग़ान औरतें: रूला ग़नी

हालांकि पाकिस्तान ये तो चाहता है कि तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में नई सरकार में शामिल हो जाए और वहां पर गठबंधन सरकार बन जाए.

लेकिन पाकिस्तान शायद ये नहीं चाहेगा कि वहां पर केवल तालिबान की सरकार हो. बाक़ी कोई उसमें शामिल ना हो.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार