इसराइल नहीं, बहरीन के पास बसते यहूदी

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यहूदियों का उदय भले ही मध्यपूर्व में हुआ हो, लेकिन वे इससे बहुत पहले से खाड़ी समेत अन्य इलाकों में बहुत दूर-दूर तक फैले हुए थे.

मैथ्यू टेलर लिखते हैं कि एक शताब्दी पहले बहरीन के पास रेगिस्तान में यहूदी राज्य बनाने का एक प्रस्ताव था.

यह बात वर्ष 1859 में खाड़ी में मौजूद एक ब्रितानी नेवी अधिकारी ग्रीफ़िथ जेनकिन्स द्वारा अपने एक कनिष्ठ हिस्कल को लिखे पत्र से जाहिर होती है.

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हिस्कल (या येहेज़्केल) बिन यूसुफ़ मस्कट में ब्रितानी हितों की नुमाइंदगी करने वाले एक अदने अधिकारी थे.

और 1840 के दशक में इस पद पर रहे अपने पूर्व अधिकारी रयूबेन की तरह ही वो भी यहूदी थे.

यहूदी मस्कट में कम से कम 1625 से ही रहते आए थे. एक यात्री के अनुसार वर्ष 1673 में यहूदियों का एक पूजास्थल बनाया जा रहा था, जिसका अर्थ था यहां उनका स्थाई निवास.

1830 के दशक में एक दौरे पर आए ब्रितानी अधिकारी जेम्स वेलस्टेड ने भी यहां यहूदी समुदाय की मौजूदगी के बारे में बताया किया था.

जेनकिन्स की चिठ्ठी में इमाम और 'खाड़ी से एक व्यक्ति' के आने के बारे में घुमाफिरा कर कुछ बातें कही लिखी गई हैं. इमाम एक मुस्लिम शासक थे, जिन्हें ओमान के अंदरूनी हिस्से में धकेल दिया गया था.

ब्रिटिश लाइब्रेरी के अध्यक्ष डेनियल लोवी ने जब इस चिठ्ठी को हाल ही में दोबारा खोज निकाला तो वो ताज्जुब में पड़ गए. हिस्कल अरबी को रोजमर्रे की भाषा के रूप में इस्तेमाल करते थे और निःसंदेह वो अंग्रेज़ी भी पढ़ लेते थे. तब जेनकिन्स ने हिब्रू में क्यों ख़त लिखा?

ख़त का राज

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लोवी का अनुमान है कि हो सकता है कि गुप्त कोड के रूप में उन्होंने हिब्रू का इस्तेमाल किया हो, जिसे केवल हिस्कल ही समझ पाएं और संदेशवाहक भी इसे न पढ़ पाए, खास तौर पर इमाम और 'खाड़ी से आया वह व्यक्ति'.

लेकिन यह रहस्य बना भी रहता है तो भी यह अच्छी तरह पता है कि कभी यहूदी पूरे अरब में रहते थे.

क़ुरान में उन यहूदी कबीलों के बारे में ज़िक्र है, जो सातवीं शताब्दी में मदीना में और आसपास के इलाक़ों में रहते थे.

मध्ययुग के यात्री टुडेला के बेंजामिन लगभग 1170 में इस इलाके से होकर गुजरे थे.

उन्होंने भी आज के ईरान, इराक़ और सउदी अरब में पर्याप्त संख्या में यहूदी आबादी के बारे में लिखा है. खासकर खाड़ी के दोनों ओर बसे किश (ईरान) और क़ातिफ़ (सउदी अरब) में भी यहूदी आबादी का ज़िक्र है.

बगदाद

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ईसा पूर्व छठी शताब्दी से ही बगदाद यहूदियों की मातृभूमि थी. प्रथम विश्वयुद्ध के आसपास अधिकारियों का अनुमान था कि दो लाख की आबादी वाले इस शहर में यहूदियों की संख्या 55 से 80 हज़ार के बीच थी.

आज दस से भी कम यहूदी यहां बचे हुए हैं.

धार्मिक हिंसा, पलायन, राजनीतिक दबाव आदि के कारण और वर्ष 1948 में इसराइल राज्य की घोषणा के बाद खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग सभी यहूदी समुदाय यहां से चले गए.

शायद ईरान में 25,000 यहूदी बचे रह गए, जबकि बहरीन में गिनेचुने परिवारों वाला यहूदियों का एक छोटा सा अल्पसंख्यक समुदाय बचा है.

नस्लीय हमले

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Image caption ईरान में बहुत कम यहूदी बचे रह गए हैं.

पिछले साल तक अमरीका में बहरीन की राजदूत एक यहूदी महिला हाउदा नानू थीं.

हालांकि इनमें से किसी समुदाय की ज़िंदगी आसान नहीं रही थी.

ब्रिटेन द्वारा वर्ष 1929 में बहरीन में और 1905 में ईरान में नस्लीय हमले दर्ज किए गए.

इस बीच ब्रिटिश राजनयिक जॉन गार्डन लोरीमर ने कुवैत में एक यहूदी व्यवसायियों द्वारा उपजे तनाव की ओर संकेत किया.

ये स्प्रिट अल्कोहल से शराब बनाते थे और इस तरह उन्होंने मुसलमानों को अपना धर्म भ्रष्ट करने को प्रेरित किया था.

अलग राज्य

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वर्ष 1917 में बहरीन के पास रेगिस्तान में 'ज्यूइश स्टेट ऑफ़ ईस्टर्न अरबिया' बनाने की योजना सामने आई, लेकिन इसमें आगे कुछ नहीं हुआ.

इसके कुछ सप्ताह बाद ही ब्रिटेन के विदेश सचिव आर्थर बालफ़ोर ने फ़लस्तीन में यहूदी लोगों के लिए अलग राज्य बनाने के विचार को अपना समर्थन दिया.

आज अरबी यहूदियों की सांस्कृतिक विरासत संगीत में जीवित है.

'या शायेले अल गेरे' को 1930 के दशक में रिकॉर्ड किया गया था जिसमें इराक़ी यहूदी गायक सेट सालीमा पाशा की आवाज है और कुवैती यहूदी संगीतकार दाउद अल-कुवैती ने संगीत दिया और उनके भाई सालेह ने वायलिन बजाया है.

(इस लेख के लिए ब्रिटिश लाइब्रेरी के अध्यक्ष डेनियल लोवी ने मूल रूप से शोध किया है.)

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