अजित डोभाल के नाम पाकिस्तान से ख़त

  • 5 जनवरी 2015
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Image caption भारतीय के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल.

आज मेरे पास तो कहने को कुछ ख़ास नहीं इसलिए एक मित्र का ख़त सुनाए देता हूँ, जो उन्होंने मुझे ना जाने क्यों भेजा?

शायद बीबीसी में काम करने की सज़ा देने के लिए! तो लीजिए सुनिए...

आदरणीय अजित डोभाल जी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, भारत सरकार

नमस्कार

मैं आपके ब्लॉग और लेख बहुत ही शौक़ से पढ़ता हूँ. मुझे चीन और अफ़ग़ानिस्तान के संदर्भ में आपका विश्लेषण बहुत पसंद आया. कल फ़ेसबुक पर एक वीडियो भी देखा जिसमें आप पाकिस्तान एवं भारत के संबंधों और चरमपंथ से निपटने के तरीकों पर लेक्चर दे रहे थे.

आपकी ये बात ठीक है कि हम विरोधियों से तीन तरीकों से निपटते हैं.

पहला तरीका तो ये है कि हम किसी भी आक्रमण के ख़िलाफ़ अपनी रक्षा करते हैं.

दूसरा तरीका है आक्रामक सुरक्षा का है. हम दुश्मन के इलाक़े में जाकर पहल की सोचने वाले आक्रमणकारियों को निशाना बनाते हैं.

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तीसरा तरीका ये है कि हम खुलकर जंग करते हैं. आपकी ये बात भी ठीक है कि जब दो देशों के पास परमाणु शक्ति हो तो खुली जंग नहीं हो सकती, मगर आक्रामक सुरक्षा का तरीका बरता जा सकता है.

यानी अगर भारत, पाकिस्तान की आर्थिक और आंतरिक सुरक्षा को निशाना बनाए, उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक्सपोज करे और ये जतला दे कि अगर तुम मुंबई करोगे तो हम बलूचिस्तान करेंगे तो शायद पाकिस्तान इतनी भारी क़ीमत के डर से अपनी हरकतों से बाज आ जाए.

आपने अपने लेक्चर में ये भी कहा है कि चरमपंथियों पर नियंत्रण करना मुश्किल नहीं. अगर कोई किसी चरमपंथी गुट को 1200 करोड़ रुपए दे रहा है और हम उन्हें 1800 करोड़ रुपए दे दें तो वही चरमपंथी हमारे लिए काम करेंगे क्योंकि चरमपंथियों का कोई नज़रिया नहीं होता, वो किराए के लोग हैं.

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आदरणीय अजित डोभाल जी, पाकिस्तान में ऐसे बहुत से लोग सरकार में भी हैं और सरकार से बाहर भी जो बिल्कुल आप ही की तरह सोचते हैं. जैसे आप आंख के बदले आंख की बात करते हैं, वो भी यही करते हैं. किराए के चरमपंथियों की बात यहां भी होती है और आप भी कर रहे हैं.

इससे और भले कुछ हो न हो, चरमपंथियों का दोनों तरफ़ से भाड़ा बढ़ता रहेगा, तो फ़ायदे में फिर कौन रहा?

मगर गुंडे जमा करने का काम कोई सड़कछाप पहलवान भी कर सकता है तो फिर उसमें और करोड़ों की रखवाली सरकारों में क्या फ़र्क हुआ?

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अगर सरकारें भी एक आम नागरिक की तरह जज़्बाती होकर कच्चे कानों से सोचें और अपनी सच्चाई ख़ुद गढ़ने की आदी हों, और एक ख़ास तरह का वैचारिक एजेंडा लेकर चल पड़ें, भले ही करोड़ों लोगों की ज़िंदगियां बर्बाद हो जाएं, तो सोचिए क्या होगा....

आप लोगों को तो जनता इसलिए सम्मान देती है कि कोई ऐसा रास्ता निकालें कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे!

क्या देश सिर्फ़ लाशों का पुल पारकर ही भविष्य में छलांग लगा सकते हैं?

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क्या एक-दूसरे को आंखे दिखाकर ही अपना आत्मविश्वास और क़द बढ़ाया जा सकता है?

अगर यही एक तरीका है तो फिर आधुनिक राज्यों और सरकारों की क्या ज़रूरत है? क्या जंगल हम लोगों के रहने के लिए बुरा था?

आप की ओर से इस तरह की बातें, दरअसल पाकिस्तान में अंधराष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वालों के कानों के लिए रस हैं. लेकिन, अगर आप उनकी इसी तरह मदद करना चाहते हैं तो फिर ऐसे ही सही...

आपका मुखलिस

इरफ़ान कबीर

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