पेरिस आईना है इस्लाम से संघर्ष का

  • 9 जनवरी 2015
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पेरिस में इस्लाम के पैग़ंबर मोहम्मद के कथित अपमान के नाम पर कार्टूनिस्टों और पत्रकारों पर हमले से पूरी दुनिया स्तब्ध है.

पेरिस हमले ने यूरोप में इस्लाम पर एक नई बहस को जन्म दिया है.

दो पक्ष उभरकर सामने आ रहे हैं. एक इस्लाम विरोधी तो दूसरा इस्लाम समर्थक.

कैसे निपटें इस्लामोफ़ोबिया से, पढ़ें विश्लेषण

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यूरोप में पुनर्जागरण के बाद धर्म समाज के केंद्र में नहीं रहा था. ऐसे में जब धर्मनिरपेक्ष पश्चिमी देश यहूदियों और ईसाइयों पर तंज़ कसते थे, तो इसे कोई गंभीरता से नहीं लेता था.

मगर इस्लाम के मामले में ऐसा नहीं है. इस्लाम का अंदरूनी संघर्ष मध्य पूर्व हमले में सुन्नी और शिया के झगड़ों के रूप में सामने आया.

इस्लाम की कट्टर व्याख्या करने वाले चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट के हमलों से ईरान-इराक़ जैसे इस्लामी देश आज जूझ रहे हैं.

मध्य पूर्व में कट्टरवादी और उदारवादी व्याख्या करने वालों के बीच हिंसा का जो सिलसिला चल रहा है, वही अब यूरोप की सड़कों पर उतर आया है.

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ताज़ा हमले को भले 'क्रूर व्यक्ति' का कारनामा भले कह लें लेकिन पिछले दशकों में हुए शांति प्रयासों की विफलता पर यदि आत्मविश्लेषण नहीं किया गया, तो इसके परिणाम पूरे यूरोप को भुगतने पड़ेंगे.

अधिक मुस्लिम आबादी

फ्रांस और जर्मनी ही नहीं, ब्रिटेन में भी बाहरी देशों से आकर बसने वालों, जिसमें मुस्लिम आबादी अधिक है, को शक की नज़रों से देखा जाता है.

यूरोप में सबसे ज़्यादा मुसलमान फ्रांस में रहते हैं जो क़रीब 50 लाख या आबादी का साढ़े सात फ़ीसदी हैं.

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जर्मनी में मुसलमानों की संख्या 40 लाख या पांच फ़ीसदी जबकि ब्रिटेन में 30 लाख या पांच फ़ीसदी है.

तीनों जगह मुख्य राजनीतिक दलों को आप्रवासियों की बढ़ती संख्या के मसले पर लोगों के ग़ुस्से और असंतोष का सामना करना पड़ रहा है.

ब्रिटेन में वह ग़ुस्सा और असंतोष 'ब्रितानी मूल्यों' पर बहस और हाल के ट्रोज़न हॉर्स स्कूल मामले पर बड़े रूप में पर शांतिपूर्ण ढंग से सामने आता रहा है.

सलमान रुश्दी

20 साल पहले विवादित किताब 'द सैटेनिक वर्सेज़' छपने के बाद भारतीय मूल के ब्रितानी लेखक सलमान रुश्दी के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी किया गया था.

मुसलमानों के मुताबिक़ रुश्दी ने इस्लाम की तौहीन की है. बाद में उन्हें कई साल छिपकर रहने को मजबूर होना पड़ा.

इस्लाम से ब्रिटेन की यह पहली मुठभेड़ थी.

हालांकि लंदन के 7/7 हमले ने भी ब्रिटेन को आगाह कर दिया था कि वह चरमपंथी हिंसा का शिकार हो सकता है.

यहूदियों का पलायन

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फ्रांस ने पिछले दशकों में धर्म के नाम पर अपनी सड़कों पर हिंसा का खूब तमाशा देखा है.

यहां यहूदियों के प्रति गंभीर होते पूर्वाग्रह और नफ़रत और फ्रांस और बेल्जियम में इस्लामी चरमपंथियों के हाथों यहूदियों की मौत के बाद यहूदी समाज का बड़ा तबक़ा फ्रांस छोड़कर इसराइल और दूसरे देशों में बसने लगा.

पेरिस के सारसेल्स जैसे ग़रीब उपनगरीय इलाक़ों में, जहां अब तक यहूदी और मुसलमान साथ-साथ रहते हैं, हाल के दिनों में यहूदियों और उनके उपासनास्थलों पर हमले तेज़ होते गए.

उनमें यह आशंका भी बढ़ी कि अफ्रीका और मध्य पूर्व में धर्म के नाम पर हिंसा की धमक धीरे-धीरे उन तक पहुंच रही है और जिसके चलते बड़ी संख्या में लोग यूरोपीय देशों में पलायन कर रहे हैं.

इस्माल विरोधी आंदोलन 'पेगिडा'

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पिछले दिनों जर्मनी में भी इस्लाम विरोधी प्रदर्शन तेज हो गए.

यहां पश्चिम के इस्लामीकरण के ख़िलाफ़ यूरोप के राष्ट्रवादी यानी 'पेगिडा' के समर्थक मानते हैं कि इस्लामीकरण से ईसाई धर्म की संस्कृति और परंपराओं को ख़तरा है.

लाखों शरणार्थियों को भी निशाना बनाया जा रहा है.

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इसके बाद राजनीतिक और धार्मिक नेता पेगिडा आंदोलन के विरोध में और आप्रवासियों के समर्थन में आगे आए हैं.

रूढ़िवादी व्याख्या

शार्ली एब्डो पर हमला और कार्टूनिस्टों की हत्या भी एक तरह से पश्चिम को आगाह करता है.

ये हमला इसका प्रतीक है कि कट्टरपंथी लोगों ख़ासकर युवाओं के लिए धर्म की रूढ़िवादी व्याख्या इतनी मायने रखती है कि अगर कोई इस पर सवाल उठाए या इसका अपमान करे तो वो उसकी हत्या भी कर सकते हैं.

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पश्चिमी यूरोप में धर्म की उदारवादी व्याख्या करने वाले भी इस बात पर बंटने लगे हैं कि कट्टरपंथी इस्लाम का उनके देश पर क्या असर होगा और इसके साथ बेहतर तरीक़े से कैसे निपटें.

सरकारें भी यूरोप के मुसलमानों के ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया की संभावना से गंभीर रूप से चिंतित हैं.

इस्लामोफोबिया

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ब्रिटेन और फ्रांस में मुख्यधारा के मुस्लिम संगठनों ने हमले की साफ़ तौर पर निंदा की और कहा कि चरमपंथ इस्लाम का अपमान है.

यदि इस हमले के बाद कोई भी संभावित प्रतिक्रिया होती है तो इससे तकलीफ़ संभवतः सबसे ज़्यादा मुसलमानों को ही होगी, जिसमें दक्षिणपंथी दलों और समूहों का समर्थन शामिल है.

पश्चिम यूरोप में अधिकारी और धर्मनेता उलझन में हैं कि अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए बिना या इस्लामोफ़ोबिया का शिकार हुए बिना वो धर्म के नाम पर हो रही हिंसा से कैसे निपटें.

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