पेरिस हमला: क्या बोले पाकिस्तानी अख़बार?

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पाकिस्तान में उर्दू और अंग्रेज़ी अख़बारों में पेरिस हमले को लेकर अलग-अलग रुख़ नज़र आया हैं.

उर्दू अख़बारों ने जहां 'अपमानजनक कार्टूनों' और 'ईशनिंदा' जैसी बातों को उठाया है, वहीं अंग्रेज़ी अख़बारों ने हमले को अनुचित बताया है.

उर्दू अख़बार

डेली एक्सप्रेस ने लिखा, "फ्रांस में हुई आतंकी घटना कड़ी निंदा के लायक है लेकिन मुसलमानों को आतंक की इस घटना के नाम पर निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए..यह पता चलना चाहिए कि यह पत्रिका अपमानजनक कार्टून क्यों छापती है? उनके इरादे क्या हैं? क्या यह फ्रांस और यूरोप में मुसलमानों की घेराबंदी की साज़िश हो सकती है? यूरोपीय देशों के मुसलमानों को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर एक संयुक्त रणनीति बनानी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचा जा सके."

उम्मत ने लिखा, "मुसलमानों का मानना है कि अल्लाह के सम्मान से जुड़े किसी पाप के लिए माफ़ी दी जा सकती है, लेकिन पैगंबर से जुड़ी ईशनिंदा सहन नहीं की जा सकती. हर मुसलमान अपनी जान ज़ोखिम में डालकर भी कथित मुसलमान या ग़ैर मुसलमान को ईशनिंदा के लिए सज़ा देगा."

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इस्लामाबाद से निकलने वाले उर्दू अख़बार पाकिस्तान के मुताबिक़,"यह पूरी तरह इस्लाम की शिक्षा के ख़िलाफ़ है. यह सच है कि इस पत्रिका ने हमेशा मुसलमानों की भावनाओं को चोट पहुंचाई है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसका जवाब हिंसा से दिया जाए और लोगों को मारा जाए."

नवा-ए-वक़्त ने इस घटना पर लिखा, "आज दुनिया को ज़्यादा शांति की ज़रूरत है, जो आपसी सम्मान के जरिए ही संभव है."

अंग्रेजी अख़बार

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द नेशन ने लिखा, "इस बात का कोई महत्व नहीं कि शार्ली एब्डो का प्रकाशन इस्लाम से डरता है या नहीं. इसका भी कोई महत्व नहीं कि उनकी संपादकीय नीति में कोई समस्या है. उन्हें सांस्कृतिक संवेदनाओं के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होना चाहिए..इस नरसंहार का कोई औचित्य नहीं है."

द न्यूज़ के मुताबिक़, "बोलने की आज़ादी, संबंध और अभिव्यक्ति पर दुनिया भर में बंदिश लग रही है और फ्रांस इसमें गुनहगार है. ख़ासतौर से यहां बुरक़े पर प्रतिबंध के कारण..शार्ली एब्डो को फिर से उठना चाहिए क्योंकि कोई नहीं चाहता कि मीडिया को चुप किया जाए, चाहे वो कितनी भी ग़ैरज़िम्मेदार हो."

अंग्रेज़ी अख़बार डॉन ने पूछा, "क्या हमले के दोषी अपना धर्म मानते हैं और इसे मानने वाले 1.6 अरब लोगों के लिए कोई सकारात्मक काम करते हैं? या उनकी हरकतों ने पश्चिम के कई हिस्सों में मुसलमानों के प्रति बढ़ती दुर्भावना की आग में और घी डाला है? तुच्छ चरमपंथी तत्वों ने जैसे धर्म का दुरुपयोग और गलत उद्धरण किया है, उससे इसके प्रति ग़लतफ़हमी बढ़ रही है."

डेली टाइम्स ने लिखा, "मुसलमानों को अपमान और उकसावे के सामने पैग़ंबर के जवाब को फिर से जानना चाहिए जिससे यह समझा जा सके कि जो लोग हथियार चलाते हैं, दरअसल उनके पास असरदार तरीक़ों की कमी होती है और जो उनके साथ भाषा के हथियार से लड़ते हैं, आखिर में जीत उनकी होती है."

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