पेशावरः ये ज़ख़्म कैसे भरेंगे?

  • 12 जनवरी 2015
आमिश, पेशावर स्कूल हमले का शिकार छात्र और मोहम्मद, पेशावर स्कूल का छात्र

पाकिस्तान के पेशावर वो स्कूल फिर से खुल रहा है जहां पिछले महीने हुए हमले में 140 से ज़्यादा स्कूली बच्चे और शिक्षक मारे गए थे.

यहां एक ऐसी मां की दास्तां पेश है जिसका बेटा इस चरमपंथी घटना में मारा गया और एक ऐसी मां भी है जिसका बेटा सोमवार को स्कूल जा रहा है.

सामया सलमान का 14 साल का बेटा आमिश इस हमले में मारा गया था. वह बताती हैं कि उस दिन क्या हुआ था और कैसे उन्होंने इसका सामना करने की हिम्मत जुटाई.

मारे गए एक बच्चे की मां की दास्तां

वह दिन भी किसी दूसरे दिनों की तरह ही था. मैं अपनी बहन की शादी में जाने की तैयारी कर रही थी.

मुझे उस वक्त तक कुछ भी नहीं पता था जब तक कि मेरी बहन ने मुझसे फ़ोन कर आमिश के बारे में पूछा नहीं.

उसने घबराते हुए आमिश के बारे में पूछा कि वो स्कूल में है क्या.

उसने मुझे टीवी खोलने को कहा और मैंने टीवी खोलते ही देखा कि आमिश के स्कूल पर हमला हुआ है.

मैं उस वक्त समझ नहीं पाई. मुझे लगा कि वे उन्हें बंधक बनाकर रखेंगे.

हमने उसे अस्पताल,स्कूल के पीछे के पार्क,स्कूल के नज़दीक के घरों में, हर जगह तलाशा लेकिन उसे कहीं नहीं पाया.

साढ़े चार बजे के करीब मेरे शौहर ने मुझे शांत होने को कहा. उन्होंने कहा, "मैं उसे वापस घर ले आ रहा हूं."

मेरे बहनोई ने उसे उसके हाथ के ज़ख़्म से पहचाना जो उसे कुछ दिनों पहले कटने की वजह से हो गया था.

लेकिन उसके हाथ में एक गोली की वजह से एक बड़ा छेद हो गया था. एक गोली उसके जबड़े से होते हुए गले से निकल गई थी.

मैं चाहती थी आमिश उस दिन स्कूल ना जाए. मैं उसको अपने साथ अपनी बहन की शादी की खरीददारी के लिए बाज़ार ले जाना चाहती थी लेकिन मेरे शौहर ने कहा कि उसका स्कूल का बहुत नुकसान हो जाएगा.

'जस्ट डोन्ट क्राई'

सुबह मेरे शौहर ने आमिश को बाल सहलाते हुए उठाया था.

मैंने आमिश को नाश्ते के लिए बोला तो उसने कहा कि आप मुझे नाश्ते के लिए कैसे पूछ सकती हैं जब मैं पहले से स्कूल के लिए लेट हो रहा हूं?

उसे गणित में और खेलकूद में रूचि थी. उसे कारों और शिकार का शौक था. उसे संगीत से भी लगाव था. मुझे लगता है कि उसने इधर के कुछ सालों में अपनी ज़िंदगी भरपूर जी.

वो अक्सर मेरे कमरे में अपने कानों में हेडफोन लगाकर आता और 'जस्ट डोन्ट क्राई' की धुन सुनता रहता.

मैं ये गाना पसंद नहीं करती थी और अब इसे सुनते हुए मुझे लगता है कि वह मुझे कुछ समझाने की कोशिश कर रहा था.

आमिश के एक दोस्त ने कहा कि उसने उसे स्कूल से बाहर भागते हुए देखा था लेकिन वो रुका और स्कूल में वापस आ गया.

मैं नहीं जानती हूं कि वह वापस क्यों स्कूल में आया. हो सकता है कि किसी को बचाने आया हो.

मेरे पास उसका जूता है

आमिश की एक टीचर ने कहा कि आमिश ऑडिटोरियम में वापस आया और उन्होंने उसे मार दिया.

उन्होंने उसके बाएं हिस्से में सिर से पैर तक नौ गोलियां दागी.

उसे शायद एक मिनट भी नहीं लगा होगा मरने में और वो समझ भी नहीं पाया कि क्या हो रहा था.

मेरे पास उसका जूता है जिसमें उसका ख़ून जम गया है लेकिन मैं उसके ख़ून को बर्बाद नहीं करना चाहती. मैं पाकिस्तान में बदलाव चाहती हूं.

मैं अब भी जब अकेली होती हूं तो आमिश को अपने आस-पास पाती हूं. मुझे लगता है कि मैं पागल हो जाऊंगी. लेकिन मैं तभी अल्लाह को याद करती हूं और हौसला देने की दुआ मांगती है.

हम सभी मांओं को सब्र की ज़रूरत है. लेकिन मैं उम्मीद करती हूं कि हमारी सरकार को अहसास है कि क्या हुआ है.

मुझे उम्मीद है कि वह कुछ करेंगे. आज की तारीख में पाकिस्तान में हर कोई ख़ुद के बारे में सोच रहा है.

अगर हम एक-दूसरे का ख़्याल नहीं रखेंगे तो दुश्मनों को हमें अपना शिकार बनाना हमेशा आसान होगा.

कोई जवाब नहीं है

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अधिकारियों ने स्कूल के प्रधानाध्यापकों को स्कूल और बच्चों की सुरक्षा निश्चित करने को कहा है. वे क्या करने की उम्मीद करते हैं?

क्या स्कूल में बच्चों को गोलीबारी में कैसे बचा जाए इसकी पढ़ाई करानी चाहिए. क्या उन्हें अक्षरों की जगह बंदूक का ट्रिगर दबाने का प्रशिक्षण देना चाहिए.

मैं अपने बचपन को याद करती हूं जो कि बिल्कुल भी ऐसा नहीं था. मैंने कभी बमबारी नहीं देखी. मुझे जहां तक याद आता है जब मैं तीसरे दर्जे में थी तो एक बमबारी की घटना हुई थी. लेकिन अब यह एक आम बात हो गई है. हमारे बच्चे हमेशा मौत के बारे में बात करते रहते है और हमारे पास इसका कोई जवाब नहीं है.

मोहम्मद स्कूल जाएगा

17 साल का मोहम्मद उस दिन स्कूल नहीं गया था. वो घर पर ही था.

उसकी माँ ने अपना नाम ज़ाहिर ना करने की शर्त पर बताया कि वो क्यों मोहम्मद को दोबारा उस स्कूल में भेजना चाहती है जहां उनके दोस्त मारे गए.

वो बताती है कि हमले की घटना से वो सिहर गईं थीं.

वो कहती हैं, "मैं नहीं जानती कि इसे कैसे बयां करूं लेकिन कहीं ना कहीं मुझे इस बात का सुकून था कि मेरा बेटा घर पर था."

परीक्षा की तारीख की वज़ह से उसे एक दिन की छुट्टी मिली थी. जब मैं घर पर लौटी तो वो रो रहा था.

'कुर्बान होने को तैयार'

उस वक्त मुझे लगा कि मैं अपने बेटे से उतना प्यार नहीं करती हूं जितना उसके दोस्तों से जो मारे गए.

मेरा बेटा समझदार और बहादुर है और उसका कहना है कि उसे अब डर नहीं लगता.

वो कहता है कि अगर वो वहां होता तो अपने दोस्तों और टीचर को बचाने की कोशिश करता.

इस घटना ने दुख की घड़ी में हमें एक कर दिया है. हर किसी का दिल टूट चुका है.

अपने बच्चे को स्कूल भेजते हुए मुझे दो तरह के अहसास हो रहे हैं.

एक टीचर और पाकिस्तानी होने के नाते मुझे लगता है कि मैं और मेरे बच्चे इस देश पर कुर्बान होने के लिए तैयार है.

मैं अपने बच्चों को स्कूल भेजना चाहती हूं और उन्हें इतना बहादुर बनाना चाहती हूं कि वे इस देश की रक्षा कर सकें.

लेकिन मैं एक मां भी हूं और मेरे अंदर की मां अपने बच्चों को स्कूल भेजते हुए घबराती है.

कैसे भरेंगे जख़्म?

जो बच्चे मारे गए, वह भविष्य के अब्दुस सलाम (नोबेल पुरस्कार विजेता पाकिस्तानी भौतिकशास्त्री) और बिल गेट्स थे. लेकिन गोलियों से छलनी और खून से लथपथ उन मासूमों को देखकर मैं सिर्फ यह चाहती हूं कि मेरे बच्चे ज़िंदा रहे बजाए इसके कि उनके भविष्य को लेकर चिंतित होती रहूं.

लेकिन मुझे उन्हें स्कूल भेजना है. और मुझे लगता है कि मैं उनके साथ स्कूल जा सकती हूं जब तक कि उनका स्कूल ख़त्म ना हो जाए मैं वहां रह कर उनका इंतजार करूं और उन्हें अपने साथ घर लाऊं.

मेरे दो बच्चे हैं. जब वे स्कूल जाते हैं तो मेरी देह और रूह उनके साथ आपस में बंट जाती है.

मेरा बेटा वापस अपने खेल के मैदान में जाते हुए उदास है. वो अब खेल के बारे में नहीं सोचेगा. उसके जेहन में अब ख़ूनखराबे की घटना होगी.

मैं ख़ुशनसीब हूं और अल्लाह का शुक्रिया अदा करती हूं कि उसने मुझे इस मुश्किल घड़ी का सामना करने से जाहिरा तौर पर बचा लिया.

लेकिन मैं उन माँओं के बारे में सोचती हूं जिनके सपने बिखर गए हैं.

बम विस्फोट की घटना पेशावर में नई नहीं है लेकिन इस बार उन्होंने माँओं के कलेजों को उड़ाया है. मैं नहीं जानती हूं कि ये ज़ख़्म कैसे भरेंगे.

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