'पाक चरमपंथ को हथियार बनाना बंद करे!'

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पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के संबंध बिगड़ते ही जा रहे हैं. पाकिस्तान पर ये आरोप लगते रहे हैं कि वो अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को एक सामरिक पूंजी मानता है.

पेशावर आर्मी स्कूल हमले में जिस तरह बच्चों को मारा गया, उसके बाद तो पाकिस्तानी तालिबान के ख़िलाफ़ अफ़ग़ानिस्तान में काफ़ी नफ़रत है.

यही नहीं पाकिस्तानी तालिबान गुट के नेता मुल्ला फ़ज़लुल्लाह के अफ़ग़ानिस्तान में छिपे होने की ख़बरें भी आ रही हैं.

तो दूसरी ओर अफ़ग़ानिस्तान से विदेशी सेनाओं की वापसी हो चुकी है.

ऐसे में नई परिस्थितियां, नई रुकावटें, नई अटकलें और नई चुनौतियां सामने हैं. इनके बारे में बीबीसी ऊर्दू ने अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई से बात की.

पाकिस्तान के साथ बिगड़ते संबंधों को संभालने की कोशिश हुई?

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मैंने बहुत ज़्यादा कोशिश की. किसी अफ़ग़ान हुकूमत, किसी अफ़ग़िन नेता ने पाकिस्तान के साथ दोस्ताना और गहरे सियासी, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध बनाने के लिए इतनी कोशिश नहीं की जितनी मैंने की.

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इसीलिए मैं 20 से ज़्यादा बार पाकिस्तान गया.

जब सोवियत यूनियन यहां से गया तो अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान को छोड़ दिया, ख़ासतौर पर पाकिस्तान की साज़िशों के लिए इसे छोड़ दिया.

और पाकिस्तान ने उस वक़्त एक पड़ोसी के तौर पर स्थायी, दोस्ताना और आज़ाद अफ़ग़ानिस्तान की कोशिश नहीं की.

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पाकिस्तान ने यही सोचा कि वो अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा करने के लिए तैयार है.

क्या आप वाक़ई ये सोचते हैं कि पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा करना चाहता था?

यक़ीनन.

बिल्कुल उसने ये किया. पाकिस्तान ने अफ़ग़ान लोगों में फूट के बीज बोए, और हद दर्जे तक चरमपंथ, उग्रवाद और हिंसा को हवा दी ताकि अफ़ग़ानिस्तान कमज़ोर पड़ जाए.

आपने 2011 में भारत के साथ सामरिक समझौता किया. आपको नहीं लगता कि उसने आपको पाकिस्तान से काफ़ी दूर कर दिया?

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पाकिस्तान को भारत के बारे में और अफ़ग़ानिस्तान के भारत के साथ संबंधों के बारे में कोई शक नहीं रखने चाहिए थे.

भारत अफ़ग़ानिस्तान का हमेशा से ख़ास दोस्त रहा है. भारत ज़बरदस्त तरीक़े से तालीम के क्षेत्र में और ग्रामीण इलाक़ों की तरक़्क़ी में अफ़ग़ानिस्तान की मदद कर रहा है.

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लेकिन आपने किसी और मुल्क के साथ इस तरह के समझौते की तो ज़रूरत महसूस नहीं की?

हम पाकिस्तान के साथ सामरिक संबंध चाहते थे. हम अब भी चाहते हैं.

पर पाकिस्तान को पहले अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ चरमपंथ का इस्तेमाल बंद करना होगा. पाकिस्तान में चरमपंथियों की पनाहगाहों को निशाना बनाना होगा.

और अफ़ग़ानिस्तान के साथ अच्छे संबंध शुरू करने होंगे.

पाकिस्तान ने मुल्ला फ़ज़लुल्लाह के अफ़ग़ानिस्तान में छिपे होने का आरोप लगाया है?

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Image caption पाकिस्तानी का आरोप है कि मुल्ला फजलुल्लाह अफगानिस्तान में छिपा हुआ है.

मैं इससे इंकार नहीं करता.

शायद पाकिस्तानी तालिबान के रहनुमा मुल्ला फ़ज़लुल्लाह अफ़ग़ानिस्तान में हो. मैं नहीं जानता इसीलिए मैं इससे इंकार भी नहीं करता.

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अगर अफ़ग़ानिस्तान के पास ये क्षमता है कि वो अपने यहां छिपे हुए पाकिस्तानी लड़ाकों को पकड़कर उसके हवाले करे तो इससे अफ़ग़ानिस्तान को ताक़त मिलेगी.

मगर मुझे मालूम है कि अफ़ग़ानिस्तान के पास ये क्षमता नहीं है.

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तो मुल्ला फ़ज़लुल्लाह और उनके जैसे दूसरे लड़ाकें अगर अफ़ग़ानिस्तान में हैं तो इसकी वजह इलाक़े में फैली वो अराजकता और अस्थायित्व है जिसे पाकिस्तान ने ख़ुद अपनी नीतियों की वजह से पैदा किया है.

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पेशावर हमले के बाद आपको लगता है कि पाकिस्तान सुरक्षा संगठनों की सोच में कोई तब्दीली आई है?

उम्मीद करता हूं. मैं सोचता था कि ये तब्दीली कई बरस पहले रावलपिंडी में सेना मुख्यालय पर हमले के बाद पैदा हो जाएगी, या पाकिस्तान के दूसरे इलाक़ों में होने वाले हमलों से ये तब्दीली आ जाएगी, मस्जिदों और आम नागरिकों पर होने वाले हमले से ये तब्दीली आ जाएगी.

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मगर ऐसा नहीं हुआ.

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अब मैं उम्मीद करता हूं कि स्कूल पर हुआ हमला शायद ये तब्दीली ले आए जिसमें कई बच्चे और बड़े मारे गए.

बुनियादी तौर पर पाकिस्तान को चरमपंथ को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना बंद करना होगा.

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जब ये रुक जाएगा तो सबकुछ ठीक हो जाएगा.

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