ओबामा के चलते 'ख़फ़ा' चीन को मना पाएंगे मोदी

  • 1 फरवरी 2015
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मई में चीन जाएंगे. तारीख अभी साफ नहीं है.

लेकिन ज़ाहिर है कि भारत चीन को यह बताना चाहता है कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे के बाद यदि चीन यह समझता है कि भारत अब अमरीका की तरफ चला गया है और चीन के विरुद्ध साज़िश कर रहा है, तो यह बिलकुल ग़लत है.

भारत चीन के साथ रिश्तों को मज़बूत करना चाहता है.

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने मौजूदा चीन यात्रा के ज़रिए बीजिंग में चीनी नेताओं को इस बात का विश्वास दिलाने की कोशिश की है.

नरेंद्र मोदी का चीन के साथ पुराना रिश्ता रहा है. व्यापार और वाणिज्य के मामले में दोनों देशों के मिलकर काम करने की संभावनाएं ज्यादा हैं.

दो मुद्दों पर आपत्ति

चीनी विदेश मंत्रालय ने दो मुद्दों पर आपत्ति जताई है.

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इनमें से एक मुद्दा है कि परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में अब ओबामा ने भी भारत को सदस्यता देने की बात की है.

दूसरा मुद्दा है दक्षिण चीन सागर का. दक्षिण चीन सागर के मामले में भी भारत और अमरीका दोनों ने एक संयुक्त बयान में कहा है कि 'हम चिंतित हैं कि दक्षिण चीन सागर में नौपरिवहन को लेकर स्वतंत्रता ख़त्म हो रही है.'

परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में सदस्यता की बात पर चीन का कहना है इसके लिए भारत को पहले अनुबंध की अन्य शर्तों को पूरा करना होगा.

चीन ने आधिकारिक तौर पर साफ़ किया कि यदि भारत इन सभी शर्तों को पूरा कर सकता है तो 'हमारा सहयोग भारत के साथ है'.

वहीं दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर चीन ने नाराज़गी जताते हुए कहा कि इसमें स्वतंत्रता समाप्ति के लिए जिम्मेदार चीन को ही ठहराया जाता है. चीन के लिए ही अक्सर कहा जाता है कि वह वितयतनाम, फिलिपींस और अन्य देशों को आगे नहीं बढ़ने देता.

लेकिन जब भारत ने इस पर हस्ताक्षर किए तो चीन को बहुत बुरा लगा. इन दोनों मुद्दों से चीनी मीडिया में यह बात सामने आई कि अमरीका, भारत और जापान, ये सब चीन का विरोध करने के लिए साज़िश कर रहे हैं.

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इसलिए यह छवि सुधारने के लिए ओबामा की भारत यात्रा के तुरंत बाद भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज यहां आईं हैं और वह यह बताना चाहती हैं कि इससे भारत-चीन संबंधों में कोई खटास नहीं आएगी और 'हम इसको और आगे बढ़ाना चाहते हैं'.

भारत से चीन की उम्मीदें

चीन के एक मंत्री ने ये साफ़ किया है कि चीन भारत से क्या उम्मीद करता है. उन्होंने बताया कि वे जो सिल्क रोड बनाना चाहते हैं जो कुन्मींग से निकलकर बांग्लादेश, म्यांमार, भारत से होकर जाएगा, (जिसके लिए भारत तैयार नहीं है), यदि इसके लिए भारत स्वीकृति दे देता है तो चीन का एजेंडा बहुत आगे बढ़ जाएगा. क्योंकि चीन का मकसद है हिंद महासागर तक पहुंचना.

चीन चाहता है कि भारत इसके लिए तैयार हो जाए.

दूसरा मुद्दा है इंडस्ट्रीयल पार्क का. आज विदेश मंत्री ने साफ कह दिया कि 'चीनी लोग भारत के दो राज्यों में इंडस्ट्रीयल पार्क लगा रहे हैं इस फैसले का हम स्वागत करते हैं. हमें इसकी खुशी है और इसको हमारा पूरा सहयोग है.'

उन्होंने कहा कि 'हम तो चाहते हैं कि आप यहां उद्योग लगाएं, इससे हमारे लोगों को काम मिले और आप भी पैसे कमाएं'.

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तो इंडस्ट्रीयल पार्क की मांग पर तो भारत खुशी से तैयार है लेकिन सिल्क रोड वाले मामले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. क्योंकि यह एक बड़ी नीति का मामला है कि हिंद महासागर में चीन को प्रवेश देना है यह नहीं देना.

लेकिन आज जो सुषमा स्वराज ने कहा है कि प्रधानमंत्री मई में आएंगे और तारीख पर विचार किया जा रहा है, इससे यह बात ज़ाहिर होती है कि भारत और चीन दोनों मिलकर इस मुद्दे पर भी आगे विचार करने की तैयारियां कर रहे हैं.

दोनों देशों ने यह समझ लिया है कि अब एक दूसरे के साथ जुड़े रहना अनिवार्य है, लेकिन दोनों के भीतर जो संदेह और आशंकाएं हैं वे कुछ हद तक कम होती नज़र आ रही हैं लेकिन ख़त्म तो नहीं होंगी.

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