चरमपंथ के ख़िलाफ़ भारत के साथ रूस और चीन

  • 2 फरवरी 2015
भारत, चीन, रूस विदेश मंत्री, सुषमा स्वराज इमेज कॉपीरइट AP

भारत में भाजपा की अगुआई वाली सरकार के सत्ता में आने के बाद आरआईसी यानी भारत, रूस और चीन की पहली बैठक बीजिंग में हुई.

बतौर विदेशमंत्री पहली बार भारत का पक्ष रखते हुए सुषमा स्वराज पाकिस्तान का नाम लिए बिना एक प्रस्ताव पारित करवाने में कामयाब रहीं, जिसमें कहा गया है कि आतंकवादियों को आश्रय और वित्तीय सहायता देने वालों पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

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बीजिंग से वरिष्ठ पत्रकार सैबल दास गुप्ता ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि मुंबई हमलों के बाद से भारत यह मांग करता रहा लेकिन चीन ने कभी सुना ही नहीं.

'एपेक, एससीओ में भारत'

अब पहली बार भारत और चीन ने स्वीकार किया है कि वह संयुक्त राष्ट्र में इस पर एक प्रस्ताव पारित करवाएंगे.

यह उपलब्धि इसलिए भी बड़ी है क्योंकि भारत ने 19 साल पहले संयुक्त राष्ट्र में यह प्रस्ताव रखा था लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया था.

चरमपंथ के मसले पर चीन इसलिए सहयोगी रुख अपना रहा है क्योंकि अब चीन को भी इस समस्या का सामना करना पड़ रहा है.

शिनजियांग में अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान से और कुछ मध्य एशिया से चरमपंथी घुस आ रहे हैं और खूनखराबा हो रहा है. चीन चाहता है कि इन्हें पकड़ा जाए और दूसरे देशों में जाकर पकड़ा जाए- इसलिए चीन ने इनका समर्थन किया.

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इसके अलावा भारत ने इस बार इस बात पर भी ज़ोर दिया कि एशिया पेसिफ़िक इकोनॉमिक कॉरपोरेशन मीटिंग का हिस्सा भारत को बनाया जाए और शंघाई कॉरपोरेशन में भी भारत को पूर्ण सदस्यता दी जाए.

इस त्रिपक्षीय बैठक में यह भी प्रस्ताव पारित किया गया कि भारत के दोनों संगठनों में शामिल किए जाने की मांग का समर्थन किया जाए.

सौदेबाज़ी

ओबामा के दौरे के बाद भारत को नज़दीक लाने के लिए दोनों यह बहुत बड़ा कदम उठाया है कि एपेक और शंघाई कॉरपोरेशन में भारत को शामिल करने का समर्थन किया है.

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लेकिन भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता की मांग का दोनों ने साफ़ तौर पर समर्थन नहीं किया बल्कि कहा कि भारत की संयुक्त राष्ट्र में बड़ी भूमिका निभाने की जो इच्छा है हम उसका समर्थन करते हैं.

इसका अर्थ यह हुआ कि इस मुद्दे पर सौदेबाज़ी अब जारी है. वह बात करने को तैयार हैं लेकिन देने को तैयार नहीं.

(बीबीसी संवाददाता अशोक कुमार से बातचीत पर आधारित)

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