परमाणु डील: गेंद निजी कंपनियों के पाले में?

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राष्ट्रपति ओबामा के भारत दौरे के बाद विदेश मंत्रालय ने परमाणु समझौते को आगे बढ़ाने के लिए जो हल पेश किया है उससे अमरीकी सरकार काफ़ी हद तक संतुष्ट नज़र आ रही है लेकिन इसमें कोई प्रगति तभी होगी जब अमरीकी कंपनियां भी उसे स्वीकार करें.

व्हॉइट हाउस के उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बेन रोड्स ने उम्मीद ज़ाहिर की है अमरीकी निजी कंपनियों की जो चिंताएं थीं, इस समझौते को लेकर वो दूर हो जाएंगी और वो भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में हिस्सा ले सकेंगी.

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समझौता मुख्य रूप से दो बातों को लेकर रूका हुआ है. पहला ये कि अगर भोपाल गैस कांड की तरह परमाणु बिजली घरों में कोई हादसा होता है तो उसमें जो करोड़ों का हर्जाना होगा वो कौन देगा.

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और दूसरा ये कि इन बिजलीघरों से निकलनेवाले रेडियोधर्मी पदार्थ पर किस तरह से नज़र रखी जाएगी. ये देखने के लिए कि कहीं इनका प्रयोग परमाणु हथियार कार्यक्रमों में तो नहीं हो रहा.

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भारत ने हादसों की ज़िम्मेदारी से संबंधित एक न्यूक्लियर लायबिलिटी क़ानून 2010 में पारित किया था जिसके तहत परमाणु बिजली घर बनाने वाली कंपनी, उसके साजोसामान मुहैया कराने वाली कंपनी और उसे चलाने वाली कंपनी सबकी ज़िम्मेदारी बनती है.

जबकि अमरीकी कंपनियों का कहना है कि वो बिजलीघर का निर्माण करेंगी और उसके लिए सामान मुहैया करवाएंगी, बिजली घर को चलाएंगी नहीं इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी नहीं बनती.

बिजली घर

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भारत सरकार ने इस समझौते की बारीकियों को समझाने के लिए सात पन्नों का सवाल-जवाब जारी किया है जिसके तहत कहा गया है कि परमाणु बिजली घरों के लिए 1500 करोड़ रूपए का बीमा किया जाएगा.

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इसमें से 750 करोड़ भारत सरकार देगी और हादसे की प्राथमिक ज़िम्मेदारी बिजली घर चलाने वाले की यानी न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड की होगी.

लेकिन इसके साथ-साथ एक प्रावधान ये भी है कि एनपीसीआईएल बिजली घर बनाने वाली और सामान मुहैया करवाने वाली कंपनी पर भी दावा ठोक सकती है.

लायबिलिटी क़ानून

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वो इसके लिए बाध्य नहीं है लेकिन विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है किए एनपीसीआईएल एक सरकारी कंपनी है और वो अपने अनुबंध में इस प्रावधान को रखेगी.

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भारत सरकार का कहना है कि उसने लायबिलिटी क़ानून में कोई संशोधन नहीं किया है. तो फिर नया क्या हुआ है कि ओबामा और मोदी दोनों ही ने इस समझौते की अड़चनों के दूर होने का एलान किया?

साल 2005 में इस समझौते की बुनियाद रखनेवालों में से एक, ऐशले टेलिस, ने बीबीसी को बताया कि ये जो सवाल-जवाब पेश किए गए हैं वो भारत सरकार की तरफ़ से बहुत अच्छा प्रयास है बिना कोई संशोधन किए एक पेचीदा मामले का हल ढूंढने की.

रेडियोधर्मी पदार्थ

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उनका कहना है, "इस सवाल-जवाब के ज़रिए क़ानून को इस तरह से परिभाषित करने की कोशिश की गई है जो निजी कंपनियों को कबूल हो लेकिन अभी इसमें कई पहलू हैं जो अस्पष्ट हैं और जिन पर न्यायपालिका की राय जाननी ज़रूरी होगी और उनसे अभी तक हमने कुछ नहीं सुना है."

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बुश प्रशासन के सदस्य रह चुके भारतीय मूल के ऐशले टेलिस का कहना है कि रेडियोधर्मी पदार्थों पर किस तरह से नज़र रखी जाएगी उस पर भी कुछ स्पष्ट नहीं कहा गया है लेकिन अगर दोनों ही पक्ष कह रहे हैं कि वो संतुष्ट हैं तो फिर इससे बढ़िया कुछ नहीं हो सकता.

भारत में परमाणु बिजलीघर बनाने की इच्छुक एक अमरीकी कंपनी, जीई हिटैची न्यूक्लियर एनर्जी, ने बीबीसी को दिए एक बयान में इन अड़चनों का हल ढूंढने के प्रयास का स्वागत किया लेकिन फ़िलहाल ये नहीं कहा कि उन्हें ये स्वीकार है या नहीं.

कारगर हल

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कंपनी के प्रवक्ता जॉनाथन मार्क ऐलेन का कहना था, "हम इस समझौते पर गौर कर रहे हैं. हमारा मानना है कि वही हल कारगर होगा जिसके तहत भारतीय क़ानून इस मामले पर अंतरराष्ट्रीय क़ानून से मेल खाए."

भारत सरकार ने जो सवाल-जवाब पेश किए हैं उसमें कहा गया है कि दोनों ही क़ानून एक दूसरे से पूरी तरह से मेल खाते हैं.

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लेकिन जानकारों का ये भी कहना है कि सैद्धांतिक रूप से अगर दोनों ही पक्षों को ये प्रस्ताव मान्य हो तब भी सही मायने में परमाणु बिजली घरों के निर्माण का काम शुरू होने में अभी बरसों लगेंगे.

ऐशले टेलिस कहते हैं है कि जब उन्होंने 2005 में इस प्रक्रिया की शुरूआत की थी तो उनके कुछ सहयोगियों का कहना था कि चंद महीनों में सब कुछ तय हो जाएगा.

कहते हैं, "मैंने तब भी कहा था कि इसमें बरसों लगेंगे. इस समझौते से ये ज़रूर हुआ है भारत को कई फ़ायदे हुए हैं क्योंकि वो अब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से इंधन, पुर्जे जो चाहे खरीद सकता है लेकिन अमरीकी कंपनियों को उसमें भागीदारी नहीं मिल पाई है."

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