सिंगापुर: सबसे महंगे शहर में 'आम' ज़िंदगी

  • 4 मार्च 2015
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सिंगापुर दुनिया के सबसे मंहगे शहरों में अव्वल स्थान पर है. इकॉनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (ईआईयू) के ताज़ा सर्वे के ये नतीजे हैं.

मंहगे शहर में रहने की कई चुनौतियां होती हैं.

आइए जानते हैं कि दुनिया के सबसे महंगे शहर में रहने का क्या मतलब है, यहां के लोग क्या सोचते हैं और उन्हें रोज़मर्रा की कौन सी परेशानियों से जूझना पड़ता है.

रफ़ीज़ा निजाल, ऑनलाइन बेकरी शॉप की मालकिन

दुनिया के सबसे महंगे शहर का नागरिक होने का मतलब है 24 घंटे एक तनावपूर्ण माहौल में रहना.

यहां का जीवन स्तर बहुत ऊंचा है और उसे ऊंचा बनाए रखने के लिए हमें लगातार काम करते रहना पड़ता है.

इस देश में कुछ भी मुफ्त नहीं है. यहां तक कि नींद भी नहीं. जब आप सोते हैं तब भी बिजली का मीटर अपनी रफ्तार से दौड़ता है.

इस देश में आम आदमी की तनख्वाह 1200 सिंगापुर डॉलर से लेकर 3500 सिंगापुर डॉलर है. लेकिन खर्च कहीं ज्यादा हैं.

अगर घर में सिर्फ एक ही कमाने वाला हो तो उसे एक नहीं बल्कि कई छोटे छोटे काम करने पड़ते हैं. एक ही समय में कई पार्ट टाइम नौकरियां करनी पड़ती हैं ताकि वो अपने बच्चों की पढ़ाई से लेकर घूमने फिरने और खाने के खर्च के लिए पैसे कमा पाए.

लगातार काम करने की वजह से आदमी की कार्यक्षमता और सेहत दोनों पर ही बुरा असर पड़ रहा है.

दुनिया के सबसे महंगे शहर में रहने की एक कीमत ये भी है कि मैं अपना बुढ़ापा सिंगापुर में नहीं देखती. अगर मैं बूढ़ी होने तक यहां रही तो इसका मतलब है मैं 65 या 70 साल की उम्र तक काम करती रहूंगी. क्योंकि अगर पेट भरना है तो कमाना तो पड़ेगा ही.

इश्तियाक़ अमजद

सिंगापुर में मैं दिल्ली से दो साल पहले ही आकर बसा हूं. प्रवासी के रूप में मेरा अनुभव ये है कि यहां घर, बच्चों की पढ़ाई, इलाज, निजी यातायात बहुत ज्यादा महंगा है.

लेकिन दूसरी ओर अच्छा जीवन है यहां. मेरे दफ्तर में शीर्ष पद के अधिकारी भी सिटी बस में आम लोगों की तरह सफर करते हैं जो नई दिल्ली में आप सोच नहीं सकते.

यहां की सिटी बस, सबवे ट्रेन का नेटवर्क और कैब सर्विस बहुत अच्छी है. खाना और किराने का सामान सस्ता है. सामान पर किसी तरह का एमआरपी यानि अधिकतम खुदरा मूल्य नहीं देना पड़ता.

दीप्ति कार्की, गृहिणी

मैं सिंगापुर में साल भर से रह रही हूं. मगर मुझे शहर की महंगाई नहीं खलती. ऐसा इसलिए क्योंकि हमारी आमदनी यहां के मूल निवासियों की आमदनी से कुछ ज्यादा है.

मेरे पति जिस कंपनी में काम करते हैं वो हमें हेल्थ इंश्योरेंस से लेकर बच्चे की पढ़ाई में आने वाले खर्च तक में मदद करती है. इसलिए हमारा खर्च और हमारी चिंता दोनों आधी हो जाती है.

पढ़ाई और सेहत के बाद अगर कोई बात आपको अपनी ओर सबसे ज्यादा लुभाती है वो ये कि आप हफ्ते में कितने दिन बाहर खाते हैं या फिर महीने में कितनी बार घूमने जाते हैं. इन दोंनों बातों का ध्यान भी हम अपनी आमदनी में आराम से रख लेते हैं.

लेकिन ऐसा नहीं है कि यहां रहने की कोई कीमत हमें चुकानी नहीं पड़ रही.

साल भर पहले तक मैं दिल्ली शहर में रहती थी वहां हमारे पास तीन बेडरूम वाला फ्लैट और दो गाड़ियां थीं. डीटीसी की बसों में साल में ज्यादा से ज्यादा चार या पांच बार ही सफर करती थी.

लेकिन सिंगापुर में मैं एक बेडरूम के फ्लैट में रहती हूं. मेरे पास कार नहीं है इसलिए बस या फिर मेट्रो में सफर करती हूं.

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