चर्च जिसमें एक भी कील नहीं लगी

  • 11 मार्च 2015
सेंट मैथ्यूज़ चर्च, पाकिस्तान

पाकिस्तान में ईसाइयों की घटती आबादी के बावजूद ब्रिटिश ज़माने के बने ज़्यादातर गिरजाघर आज भी कायम हैं. यह जानना दिलचस्प होगा कि ये गिरजाघर किस हाल में हैं.

यही जानने के लिए मैं मुरी और एबटाबाद के बीच बनी नथिया गली के सौ साल पुराने सेंट मैथ्यूज़ चर्च जा पहुंचा.

जब मैं वहाँ पहुँचा तो काफ़ी ठंड थी. गिरजाघर के चारों ओर तक़रीबन दो फीट मोटी बर्फ़ की चादर थी.

गिरजाघर तक पंहुचने वाला रास्ता आधा बंद था. पर वहां चौकीदार वहीद मुराद से मुलाक़ात हुई.

सौ साल पुराना गिरजाघर

वहीद के दादा इस गिरजाघर की चौकीदारी किया करते थे. इस तरह वहीद इसकी चौकीदारी करने वाले तीसरी पीढ़ी के हैं.

इस मौसम में भी देवदार की लकड़ी का बना पुराना सेंट मैथ्यूज़ चर्च चमक रहा था और निहायत ही सुंदर दिख रहा था.

सेंट मैथ्यूज़ चर्च बहुत बड़ा तो नहीं है, पर एक साथ 80 लोग वहां प्रार्थना कर सकते हैं. इसकी बनावट की ख़ूबी यह है कि इसमें कहीं भी कील का इस्तेमाल नहीं किया गया है.

पूरा गिरजाघर ही नट बोल्ट की मदद से तैयार किया गया है और ज़रूरत पड़ने पर इसे खोल कर आसानी से कहीं दूसरी जगह ले जाया जा सकता है.

सेंट मैथ्यूज़ चर्च सिर्फ़ गर्मियों में ही खुला रहता है. उस दौरान यहां प्रार्थना भी होती है, लोग जमा भी होते हैं और रोज़ाना इसका घंटा भी बजाया जाता है.

सर्दियों में जब बर्फ़बारी होती है, पहाड़ बर्फ़ से ढंक जाते हैं और तमाम रास्ते भी बंद हो जाते हैं.

उस समय भी कई लोग गिरजाघर पंहुच कर बर्फ़ से खेलते हैं और तरह-तरह की चीज़ें बनाते हैं. उस समय भी यहां रौनक रहती है.

सुरक्षा का मसला

सेंट मैथ्यूज़ चर्च से लौट कर एबटाबाद में मैंने बिशप रेवरेंड रफ़ीक जावेद से फ़ोन पर बात की. उन्होंने बताया कि पाकिस्तान बनने से पहले यह गिरजाघर कलकत्ता डायोसीज के तहत था.

पाकिस्तान में क़रीब दस लाख ईसाई हैं. इनमें ज़्यादातर पंजाबी ईसाई हैं जिनके पूर्वज ब्रिटिश सेना में थे और धर्म बदल कर ईसाई बन गए.

रफ़ीक एबटाबाद स्थित सेंट ल्यूक्स चर्च के पादरी हैं. वे सेंट मैथ्यूज़ चर्च से भी जुड़े हुए हैं क्योंकि उसका अपना अलग पादरी नहीं है.

फ़ादर जावेद यह भी कहते हैं कि सुनसान जगह पर बना होने की वजह से सेंट मैथ्यूज़ चर्च के साथ सुरक्षा का मसला भी है. रविवार को यहां पुलिस का बंदोबस्त रहता है और प्रशासन चौकन्ना रहता है.

बीते साल 26 सितंबर को इस चर्च ने सौ साल पूरे कर लिए. इस मौक़े पर ख़ास आयोजन किया गया था. इस गिरजाघर में क्रिसमस में आने का वादा मैंने खुद से किया है.

उम्मीद है मेरे लौटकर आने तक इसे खोलकर कहीं और नहीं ले जाया जाएगा.

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