ऑस्ट्रेलिया: नस्ली हमला बंद हो गया है?

मेलबर्न इमेज कॉपीरइट Getty

तकरीबन छह से सात वर्ष पहले ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के लोगों पर एकाएक नस्लभेदी हमलों का ख़ौफ़ मँडराने लगा था.

एक के बाद एक हुए दर्जनों हमलों में कई भारतीय निशाना बने, जिसमें एक बड़ी संख्या छात्रों की थी.

इन घटनाओं के चलते दोनों देशों के आपसी संबंधों में दरार पड़ने की नौबत आ गई थी.

शृंखला के दूसरे हिस्से में पढ़ें, उन लोगों के बारे में जो इन हमलों का शिकार हुए और क्या आज भारतीय मूल के लोगों पर नस्लभेदी हमलों का ख़तरा पूरी तरह ख़त्म हो चुका है?

कहानी विस्तार से

Image caption एक नस्लभेदी हमले में श्रवन कुमार के आंख की रोशनी पर असर पड़ा.

श्रवन कुमार अब 30 वर्ष के हो चुके हैं और बतौर छात्र जब वह ऑस्ट्रेलिया आए थे तब उनकी आँखों में सपने थे. अब श्रवन को बीस फ़ुट के आगे का कुछ भी साफ़ नहीं दिखता.

मेलबर्न में वर्ष 2009 में रात के समय श्रवन के घर पर कथित नस्लभेदी हमला हुआ.

वह 15 दिन के कोमा से तो बाहर आ गए, लेकिन आँख की पूरी रोशनी के बिना.

श्रवन अब ऑस्ट्रेलिया के नागरिक बन चुके हैं और पिछले वर्ष उनका विवाह हुआ.

उन्होंने बताया, "ज़िन्दगी भर मुझे ऐसे ही रहना है और कमज़ोर आँखें होने की वजह से मुझे काम मिलने में मुश्किल हो रही है. हालांकि मुझे स्थानीय सरकार से समर्थन मिलता है, लेकिन उससे होता ही क्या है."

छात्र निशाने पर

इन नस्लभेदी हमलों के बाद ऑस्ट्रेलिया आकर पढ़ने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में भी ज़बरदस्त गिरावट आई थी.

क्योंकि छह वर्ष पहले तक ऑस्ट्रेलिया में सालाना लगभग सत्तर से अस्सी हज़ार भारतीय छात्र पढ़ने आते थे.

लेकिन जब छात्रों पर हमले के मामले सैंकड़ों में पहुंचे तो उनकी संख्या घटी.

ऐसा क्या हुआ था कि ज़्यादातर हमलों का शिकार भारतीय छात्र ही बने?

'हेट क्राइम एक्ट'

उन दिनों छात्र हित के लिए आवाज़ उठाने वाली डॉक्टर अनु शेरगिल को लगता है कि मामले को शुरुआत से गलत मोड़ दे दिया गया.

उन्होंने बताया, "यहाँ पर भारतीय समुदाय वाली संस्थाओं ने ही कहना शुरू कर दिया कि भारतीय छात्र असुरक्षित होते हैं. इसके बाद हमलों में तेज़ी आ गई."

Image caption गौतम गुप्ता मेलबर्न में भारतीय बहुल इलाक़े के काउंसिलर हैं.

जब छात्रों पर हमले हो रहे थे तब जिस शख़्स ने उनके हक़ लिए एक आंदोलन शुरू किया उसका नाम था गौतम गुप्ता.

अजीब इत्तेफ़ाक़ है कि इन दिनों गौतम गुप्ता मेलबर्न में एक भारतीय बहुल इलाके विंढम के निर्वाचित काउंसिलर भी हैं.

उनके अनुसार, "देखिए सच्चाई यह है कि हमले हुए थे, लेकिन भारतीय इसमें प्रमुख निशाना बन रहे थे. मेरी लड़ाई थी कि सिर्फ़ भारतीय ही क्यों पिटें. आंदोलन के बाद विक्टोरिया में हेट क्राइम एक्ट पास किया गया."

भारतीय छात्रों पर हमलों का सीधा असर पड़ा था ऑस्ट्रेलिया में फल-फूल रहे सैंकड़ों कॉलेजों पर, जिन पर बाद में ताले पड़ गए.

अधिकांश मामले अपराध के

लेकिन इस बात का जवाब कम लोगों के पास था कि हमले नस्लभेदी थे या फिर हिंसा से प्रेरित.

मेलबर्न में रहने वाले वासन श्रीनिवासन भारतीय मूल के ऑस्ट्रेलियाई नागरिक हैं जो हमलों के बाद गठित की गई जांच समिति सदस्य थे.

उन्होंने कहा, "उस समय मैं विक्टोरिया के पुलिस रेफरेंस बोर्ड का सदस्य था. हमने 114 मामलों की जांच की जिनमें से 95% मामले सिर्फ क्राइम से प्रेरित थे न कि नस्लभेदी."

हालांकि हमलों के बाद हुए सामाजिक और आर्थिक नुकसान का अंदाजा ऑस्ट्रेलिया की सरकार को बखूबी था और उसने भी कई सकारात्मक क़दम उठाए गए.

सच ये भी है कि हमले का शिकार हुए कई भारतीयों ने ऑस्ट्रेलिया में ही बस जाने का फ़ैसला लिया.

शायद उन्हें भी लगा कि वे ग़लत समय पर ग़लत जगह फँस गए थे, बस.

हालात बेहतर

विक्टोरिया प्रांत के प्रीमियर डैनियल एन्ड्रूज़ के एक सलाहकार भारतीय मूल के जसविंदर सिद्धू भी हैं.

उन्होंने बताया, "तब से लेकर हालात बहुत बेहतर हो चुके हैं और सरकार ने कई प्रोग्राम शुरू किए हैं जिनसे आने वाले छात्रों को हर तरह की जानकारी दी जाए."

आज ऑस्ट्रेलिया में ज़्यादातर भारतीय उन हमलों के बारे में भूल चुके हैं, जिन्होंने दोनों देशों के बीच दूरियां तक ला दीं थीं.

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