लड़कियों को अधिक नंबर देते हैं टीचर?

  • 9 मार्च 2015
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स्कूल की परीक्षाओं में शिक्षक लड़कियों को दिल खोल कर नंबर देते हैं.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 60 देशों में कराए गए एक अध्ययन में पता चला है कि परीक्षाओं में छात्राओं को उनके ही बराबर क़ाबिल छात्रों के मुक़ाबले अधिक नंबर मिलते हैं.

शिक्षा में लैंगिक भेदभाव को लेकर ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) के अध्ययन में कहा गया है कि आत्मविश्वास में कमी और रुढ़िवादी सोच के चलते लड़कियां विज्ञान और गणित में करियर बनाने की ओर नहीं बढ़तीं.

दूसरी अोर, लड़कों में आक्रामकता अधिक होने की संभावना होती है और वो अपने होमवर्क पर कम समय देते हैं.

रुढ़िवादी सोच

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अध्ययन में कहा गया है, “छोटी उम्र से ही लड़के कक्षा में बोलने से कतराते हैं और जब तक कहा न जाए, वे नहीं बोलते हैं या किसी गतिविधि में हिस्सा नहीं लेते हैं. वो ध्यान लगा कर कम सुनते हैं और किसी गतिविधि के शुरू होने के पहले उस पर ध्यान भी कम देते हैं.”

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, लड़कों में कक्षाएं छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है. परीक्षा का समय नज़दीक अाने पर लड़कियों को अधिक नंबर देने का ढर्रा सामाजिक ढंग से नज़र आता है.

अध्ययन में कहा गया है कि लड़कों और लड़कियों की पढ़ाई से संबंधित ख़ूबियों और कमज़ोरियों को लेकर अध्यापक रूढ़िवादी सोच के शिकार होते हैं.

इसमें यह भी कहा गया है कि छात्र के कामों के वस्तुगत आकलन की बजाय, अध्यापक सांगठनिक कौशल, अच्छा व्यवहार और आज्ञाकारी होने को अधिक तवज्जो देते हैं.

लैंगिक भेदभाव?

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अध्ययन के नतीजों में कहा गया है कि अध्यापकों को ‘लैंगिक भेदभाव’ के प्रति सजग रहने की ज़रूरत है.

ओईसीडी के शिक्षा निदेशक एंड्रेियस श्लेशेयर कहते हैं, “लंबे दौर में यही अधिक नंबर आपको परेशान करेंगे, क्योंकि श्रम बाज़ार में स्कूली योग्यता से आपको नौकरी नहीं मिलती है.”

इसके साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विज्ञान और गणित में लड़कियां खुद की क्षमता को कम कर आंकती हैं.

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