उर्दू मीडियाः बातचीत पर नरम, मुस्लिम कोटे पर गरम

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भारतीय विदेश सचिव एस जयशंकर का इस्लामाबाद दौरा, भारत का रक्षा बजट और महाराष्ट्र में मुस्लिम कोटा ख़त्म करने जैसी ख़बरें पाकिस्तानी मीडिया की सुर्ख़ियों में रहीं.

'जंग' ने लिखा है कि इस्लामाबाद में मंगलवार को दोनों देशों के विदेश सचिवों की बातचीत बेशक एक अहम प्रगति है.

अख़बार के मुताबिक़, बर्फ़ पिघलने के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन जब भी दोनों देशों के बीच बातचीत निर्णायक दिशा में बढ़ती है तो कोई न कोई ऐसा हादसा या घटना हो जाती है जिससे न सिर्फ़ बातचीत का सिलसिला टूट जाता है बल्कि ग़लतफ़हमी की ऐसी फ़िज़ा बन जाती है कि उससे निकलने में लंबा वक़्त लगता है.

अख़बार पूछता है कि क्या भारत और पाकिस्तान भी फ्रांस और जर्मनी की तरह पुरानी दुश्मनी भूल कर शांति, तरक़्क़ी और ख़ुशहाली की बुनियाद नहीं रख सकते?

ज़्यादा उम्मीद नहीं

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'दुनिया' ने लिखा है कि जिस तरह दोनों देशों के बीच सात-आठ महीनों से बातचीत रुकी पड़ी थी, उसे देखते हुए जयशंकर का इस्लामाबाद दौरा बड़ी कामयाबी है.

भारतीय विदेश सचिव के इस्लामाबाद दौरे पर ही 'एक्सप्रेस' का संपादकीय है- भारत-पाक वार्ता जल्द शुरू होने की उम्मीद.

अख़बार कहता है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद विदेश सचिव स्तर की ये पहली वार्ता स्वागत योग्य है.

अख़बार के मुताबिक़, लगता है, पाकिस्तान को लेकर मोदी के रुख़ में लचक आ रही है, लेकिन जिस तरह मोदी के अतिवादी इरादे सामने आते रहे हैं, उन्हें देखते हुए ज़्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

मुस्लिम कोटा

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अख़बार ने इस सिलसिले में महाराष्ट्र में शिक्षा और रोज़गार के क्षेत्र में मुसलमानों के पांच फ़ीसदी कोटे को ख़त्म किए जाने का भी ज़िक्र किया है.

'नवाए वक़्त' ने महाराष्ट्र सरकार के इस फ़ैसले को मुसलमानों की भावनाओं पर छुरी चलाना बताया है.

अख़बार के मुताबिक़, इस फ़ैसले से साफ़ हो गया है कि ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक कहने वाली भारत सरकार को देश के मुसलमानों से कोई इंसानी हमदर्दी नहीं है.

अख़बार लिखता है कि भारत में ईसाई भी सुरक्षित नहीं हैं और उनके चर्चों को जलाने और उनमें तोड़फोड़ के मामले अकसर सामने आते रहे हैं.

भारत के रक्षा बजट को बढ़ाकर 40 अरब डॉलर करने को औसाफ़ ने भारत का जंगी जुनून बताया है.

जंगी जुनून

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अख़बार लिखता है कि भारत की आधी आबादी को दो वक़्त की रोटी मय्यसर नहीं है और उसकी आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी रातें सड़कों, फुटपाथों और खुले में गुज़ारता है, तो दूसरी तरफ भारत का जंगी जुनून लगातार बढ़ता जा रहा है.

अख़बार के मुताबिक़, भारत ने कई देशों से हथियारों की ख़रीद के समझौते कर रखे हैं और लगता है कि अमरीका, रूस और इसराइल समेत दूसरे देश भारत को इतनी बड़ी संख्या में हथियार देकर इस क्षेत्र को युद्ध का मैदान बनाना चाहते हैं और वो नहीं चाहते कि यहां शांति कायम हो.

आम आदमी पार्टी

रुख़ भारत का करें तो आम आदमी पार्टी की खींचतान पर 'सहाफत' लिखता है कि जिस पार्टी को इतनी उम्मीदों के साथ पाल पोस कर चुनाव में इतनी कामयाबी दी गई हो, उसमें जीत के बाद ही मतभेद उभरना दुर्भाग्यपूर्ण है.

अख़बार की राय है कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की सियासी पहचान केजरीवाल की वजह से ही है और उन्हें ये बात मान लेनी चाहिए.

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दूसरी तरफ 'राष्ट्रीय सहारा' ने लिखा है कि सांप्रदायिकता और धार्मिक नफ़रत भड़काने के ख़िलाफ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कड़े रुख़ के बावजूद योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज और साध्वी प्राची जैसे नेता लगातार भड़काऊ बयानबाजी कर रहे हैं.

अख़बार के मुताबिक़ गृहमंत्री ने इस बारे में सख्त क़दम उठाने का भरोसा दिलाया है, लेकिन ये क़दम उठाए कब जाएंगे, फिरकापरस्तों पर लगाम कब लगेगी.

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