इंसानी हाव-भाव को कितना समझता है घोड़ा?

  • 20 मार्च 2015
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घोड़े को करीब 6000 साल पहले पहली बार पालतू बनाया गया था. इसके बाद घोड़े मनुष्यों के लिए आज तक कई भूमिकाएं निभाते आए हैं.

लेकिन घोड़ा इंसानों के हाव भाव को कैसे समझ लेता है, इसको लेकर हाल फिलहाल तक कोई अध्ययन नहीं आया है.

आज तक ये पता चला है कि घोड़ा कुछ संकेतों को समझता है जिसमें इशारा करना शामिल है. हालांकि घोड़े इन संकेतों के मुताबिक काम तभी करते हैं जब उन्हें इसका एहसास होता है कि ईनाम देने के लिए मनुष्य मौजूद रहेगा.

घोड़े की कुशलता के बारे में पहले ये समझा जाता था कि वह काफी हद तक बकरियों और बिल्लियों जैसा है. वह इंसानी संकतें को तब भी पकड़ लेता है जब उसे ये संकेत नहीं दिए जा रहे हों.

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2004 में हुए एक अध्ययन के मुताबिक घोड़ों में शार्ट टर्म मेमोरी होती है और संभवत: उसमें भविष्य के बारे में सोचने की क्षमता नहीं होती है.

अध्ययन के मुताबिक घोड़े अपने टास्क को पूरा करने के लिए शॉर्ट टर्म मेमोरी का इस्तेमाल करते हैं.

घोड़ों पर प्रयोग

इटली के एक वैज्ञानिकों दल ने पाया कि घोड़े ना केवल मनुष्यों के एक्शन को पकड़ लेते हैं बल्कि वे अपने अनुभव के आधार पर उस टॉस्क पर रिएक्ट भी करते हैं.

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शोध में शामिल यूनिवर्सिटी ऑफ़ पीसा के डॉ. पाउलो बारागली कहते हैं, "इंसानों के लिए ये समझना सहज होता है लेकिन जानवरों के लिए ये सामान्य नहीं होता."

वे कहते हैं, "अगर कोई जानवर हमारी उम्मीदों के मुताबिक काम नहीं करता तो इसका ये मतलब नहीं है कि वो सक्षम नहीं है. ये भी संभव है कि वो हमारी उम्मीद से अलग किसी दूसरी रणनीति पर काम कर रहा हो."

अध्ययन के नतीजों को एप्लाइड एनिमल बिहेवियर साइंस जर्नल में प्रकाशित किया गया है.

एक प्रयोग में अलग-अलग नस्लों के 24 व्यस्क घोड़ों को एक बड़ी बाल्टी में छिपी गाजर को ढूंढने के लिए प्रशिक्षित किया गया. इसके बाद इन्हें 12-12 घोड़ों के दो समूहों में बांट दिया गया.

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एक समूह को तीन उल्टी रखी बाल्टियों में से गाजर ढूंढने का काम दिया गया. घोड़ों ने एक शख्स को गाजर छिपाते देखा था. जब शख्स ने गाजर को छिपा दिया तब घोड़ों को 10 सेकेंड तक इंतज़ार करने दिया गया ताकि जब वो व्यक्ति वहां से हट जाए तब वे गाजर की खोज शुरू करें.

इंसानी संकतों का असर

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यही प्रयोग 12 घोड़ों के दूसरे समूह के साथ किया गया, लेकिन इन्होंने व्यक्ति को गाजर छिपाते हुए नहीं देखा. पहले समूह के घोड़े, जिन्होंने गाजर को छिपाते हुए देखा था, दूसरे समूह के मुकाबले में पहली बार में गाजर को खोजने में कामयाब रहे.

वहीं दूसरे समूह के घोड़ो ने गाजर को तलाशने की कई बार कोशिश की और कम वक्त के अंदर उसे तलाश लिया.

शोधकर्ताओं के मुताबिक ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बाद में घोड़ों ने इंसानी संकेत को ज्यादा अहमियत नहीं दी. घोड़ों को ये मालूम हो चुका था कि उन्होंने कम समय में खोजा या ज्यादा समय में उन्हें एक जैसा ही ईनाम मिलना है.

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इसी अभ्यास को कई बार करने पर शोधकर्ताओं ने देखा घोड़े उसी जगह पर गाजर को पहले तलाशते जहां पिछली बार उन्हें गाजर मिली थी. इससे ये जाहिर हुआ कि घोड़ों को कुछ अंतराल के बाद भी ये याद रहा कि गाजर कहां छिपाई गई थी.

पहली है रिपोर्ट

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घोड़े अपने निर्णय लेने की रणनीति को बदलते भी दिखे. यह वे इंसानी संकेतों और ईनाम की चाहत में कर रहे थे.

इससे ज़ाहिर है कि ये घोड़े पर निर्भर है कि वह मनुष्य के संकेतों को समझे या नहीं. डॉ. बारागली के मुताबिक घोड़ों में यह क्षमता से ज्यादा उनके अस्तित्व के लिए ज़रूरी है.

डॉ. बारागली कहते हैं, "हमारी जानकारी में ये पहला रिसर्च पेपर है जो बताता है कि घोड़ा इंसानों के व्यवहार से सूचना लेकर काम करता है और कुछ मुश्किल चुनौती आने पर अपने अनुभव के मुताबिक व्यवहार और रणनीति बदल भी सकता है."

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.

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