आईएस की दोस्ती से मज़बूत होगा बोको हराम?

बोको हराम इमेज कॉपीरइट AFP

अंतरराष्ट्रीय जिहादियों की दुनिया में इन दिनों काफी चहल पहल है और एक मायने में काफ़ी उथल पुथल भी.

पिछले हफ्ते नाइजीरिया के चरमपंथी संगठन बोको हराम ने इराक़ और सीरिया में स्थित इस्लामिक स्टेट (आईएस) के साथ औपचारिक सम्बन्ध बनाने के लिए इसके प्रति वफ़ादारी का एलान किया.

अपने ट्विटर अकाउंट पर इसकी घोषणा करते हुए बोको हराम ने कहा, "हम पूरी दुनिया के मुसलमानों से अपील करते हैं कि वो ख़लीफ़ा से अपनी वफ़ादारी का एलान करें."

जिस ख़लीफ़ा का ज़िक्र इस पैग़ाम में किया गया है वो आईएस का नेतृत्व करने वाले अबु बकर अल बग़दादी हैं, जिन्होंने खुद को दुनिया भर के मुसलमानों का ख़लीफ़ा घोषित कर रखा है.

बोको हराम के इस ताज़ा पैग़ाम से साफ़ पता लगता है कि इनका इरादा पूरी दुनिया में इस्लामी सरकारें या ख़िलाफ़त स्थापित करने का है.

पढ़ें विस्तार से

इमेज कॉपीरइट AFP

बोको हराम और आईएस के बीच भौगोलिक दूरी ज़रूर है, लेकिन वैचारिक नज़दीकियों ने सरहदों को बेमानी कर दिया है.

बोको हराम से पहले लीबिया, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के चरमपंथी संगठनों ने भी आईएस की शागिर्दी क़ुबूल की है.

अब पाकिस्तान से लेकर अफ़्रीका तक चरमपंथी इस्लामी संगठनों के परचम लहरते नज़र आ रहे हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के पतन और अलक़ायदा के घटते हुए असर के बाद आईएस के उदय ने पश्चिमी देशों को परेशान कर रखा है.

अमरीका के नेतृत्व वाले आतंकवाद के ख़िलाफ़ वैश्विक युद्ध के बावजूद आईएस और बोको हराम कैसे उभरने में कामयाब हुए?

बड़ा ख़तरा

इमेज कॉपीरइट AFP

इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं. अब अमरीका ने स्वीकार किया है कि आईएस अलक़ायदा से कहीं बड़ा खतरा है.

यदि पिछले साल आईएस का दौरा करने वाले जर्मन लेखक यूर्गन टोडेनहोफ़र की मानें तो आईएस पश्चिमी देशों के अनुमान से अधिक शक्तिशाली और संगठित है.

उन्होंने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, "मुझे ऐसा लगा कि पश्चिमी राजनेता जितना समझते हैं, आईएस उससे भी कहीं अधिक मज़बूत है. मैं तालिबान के नेताओं से कई बार मिल चूका हूँ. मैंने अल्जीरिया के चरमपंथियों के बीच समय बिताया है लेकिन मेरे विचार में आईएस इन सब से अधिक शक्तिशाली है."

यूर्गन के मुताबिक़, "उनके विचार में वो एक ऐतिहासिक मिशन के लिए काम कर रहे हैं. वो समझते हैं कि ईसाई, यहूदी और सेक्युलर मुसलमानों को क़त्ल करना उनका धार्मिक फ़र्ज़ है. वो हर उस व्यक्ति की हत्या को सही मानते हैं जो शरिया क़ानून के बजाय दुनयावी क़ानून पर चलते हैं."

फ़र्क पड़ेगा?

इमेज कॉपीरइट AFP

बोको हराम का मक़सद भी शरिया क़ानून की स्थापना है. इसके नेता अबु बकर शेकाउ आईएस के लीडर अल बग़दादी की स्टाइल में मस्जिद में भाषण देते हैं और प्रचार की दौड़ में आईएस की नकल भी करते हैं.

मरने -मारने में भी वो आईएस की बेरहम नीति को ही अपनाते हैं.

तो अब बोको हराम की तरफ़ से आईएस की वफ़ादारी के एलान से दुनिया भर में क्या असर पड़ेगा?

दिल्ली में रहने वाले अजय साहनी इस्लामी चरमपंथ पर गहरी नज़र रखते हैं. वो कहते हैं, "अधिक फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. यह संभव है कि नए लोगों को भर्ती करने में कुछ फ़र्क़ पड़े."

इमेज कॉपीरइट Reuters

कुछ दूसरे लोग कहते हैं कि जिहादियों की दुनिया में वैचारिक रूप से अब बोको हराम, आईएस के बराबर आ जाएगा.

आईएस के सक्रिय चरमपंथियों में यूरोप से आए युवाओं की संख्या दूसरे देशों के मुकाबले कहीं ज़्यादा है.

हवाई हमले कितने कारगर?

इमेज कॉपीरइट EPA

डेनमार्क में भारतीय मूल के लेखक ताबिश खैर ने चरमपंथी संगठनों पर आधारित एक उपन्यास लिखा है.

उनके विचार में, "बोको हराम के इस नए एलान से आईएस की तरह युवा इससे नहीं जुड़ेंगे."

वो कहते हैं, "बोको हराम स्थानीय समस्याओं के ख़िलाफ़ उभरी संस्था है. आईएस की अपील वैश्विक है. इसका इस्लामी ख़िलाफ़त का पैग़ाम पश्चिमी देशों के मोहभंग युवाओं को लुभाने में क़ामयाब है. बोको हराम के इस नए एलान से कोई अधिक फ़र्क़ नहीं पड़ेगा."

तो अब बोको हराम इस्लामिक स्टेट का भविष्य उज्जवल है? क्या अब इन्हें कोई रोक नहीं सकता?

नाइजीरिया के साथ साथ चार अफ़्रीकी देशों की सेनाओं ने बोको हराम के खिलाफ जंग छेड़ दी है. इससे बोको हराम को काफी नुक़सान हुआ है.

अजित साहिन कहते हैं, "बोको हराम का आईएस के क़रीब जाने के पीछे इसके ख़िलाफ़ सैनिक एक्शन भी है. लेकिन हवाई हमले तो अमरीका भी आईएस के ख़िलाफ़ करता चला आ रहा है. मगर इसका असर कुछ ख़ास अब तक देखने को नहीं मिला है."

तालिबान जैसा हश्र

इमेज कॉपीरइट EPA

तालिबान की सरकार दस सालों तक चली. अलक़ायदा पिछले 13 सालों से सक्रिय है, लेकिन पहले से काफी कमज़ोर है.

आईएस और बोको हराम के भविष्य के बारे में अजय साहनी कहते हैं कि चार पांच सालों के बाद इनका वही हाल होगा जो तालिबान और अलक़ायदा का हुआ.

लेकिन ताबिश खैर के विचार में ये पेचीदा मामला है, "आईएस एक कट्टर सुन्नी संगठन है, जिसने क्षेत्र में शिया ईरान के बढ़ते हुए असर को रोक रखा है. आस पास के सुन्नी राज्य भी यही चाहेंगे कि आईएस का पतन न हो. हाँ वो ऐसा खुलकर नहीं कहेंगे."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार