'अपराध वही जो दूसरों के संग हो'

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इससे भला क्या फ़र्क पड़ता है कि लाहौर के योहानाबाद चर्च विस्फ़ोट में एक ईसाई मरे कि 100 मरें, पश्चिम बंगाल के एक मिशनरी स्कूल में 74 वर्ष की एक नन का रेप हो या दिल्ली की एक बस में किसी 23 वर्ष की लड़की का रेप हो जाए, गुजरात के दंगों में हज़ार मुसलमान मारे जाएं कि इराक़ में दायिश के हाथों पाँच सौ यजीदी या शिया समुदाय के पाँच हज़ार लोग मारे जाएं....

पिछले दिनों भारत के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो ने ये रिपोर्ट छाप दी कि देश में हर 16वें मिनट में किसी दलित, किसी ग़ैर दलित के जुर्म के शिकार होता है और रोजाना चार दलित औरतें ऊंची माने वाली जाति के हाथों यौन हमले का शिकार होती हैं.

किस बात पर ग़ुस्सा

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पाकिस्तान में मानवाधिकार संस्थाएँ एक मुद्दत से चीख रही हैं कि जो औरतें जेल या पुलिस लॉकअप में हैं उनमें से 75 प्रतिशत पर कोई न कोई यौन हमला ज़रूर होता है. हर हफ़्ते किसी न किसी अल्पसंख्यक समुदाय की कोई महिला या पुरुष मारा जाता है.

अच्छा, एक बात तो बताएँ...जितना ग़ुस्सा हमें किसी एक क़त्ल पर आता है, क्या हमें तब भी उतना ग़ुस्सा आता है जब किसी दूसरे समुदाय, बिरादरी या गुट के सैकड़ों लोगों के किसी दंगे में मारे जाएँ?

कितनी मुट्ठियाँ भींचते हैं हम जब हमारे पड़ोस में कोई रेप हो जाए? तो क्या हम उतनी ही मुट्ठियाँ तब भी भींचते हैं जब शाम से सूचना आए कि वहाँ औरतों को मंडी में लाकर बोली लगाई जा रही है.

ख़बर जो नहीं पहुँची

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क्या तब भी हमारे मुँह से उतनी ही झाग निकली थी जब पूर्वी पाकिस्तान में हज़ारों औरतों का रेप हो रहा था और कश्मीर से जब कभी इत्तला आई कि किसी अर्धसैनिक बल ने झूठा एनकाउंटर रचा और पूरा खानदान मार डाला या मणिपुर में फलाँ यूनिट ने बाग़ियों की तलाश में पूरा गाँव ही भस्म कर दिया.

हाँ, हिटलर बहुत खबीश था जिसने 60 लाख यहूदियों को गैस चैंबर में मार डाला. लेकिन जब पूरब की तरफ़ से रेड आर्मी और पश्चिम की तरफ़ से ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका के सैनिकों ने जर्मनी को वहशी नाज़ियों से आज़ाद करवाया, तो उसके बाद मुक्ति दिलाने वालों के हाथों 10 लाख से अधिक जर्मन औरतों के रेप की ख़बर हममें से किसी ने सुनी?

ये सारी बकवास करने का आखिर मतलब क्या है? शायद मैं ये कहना चाह रहा हूँ कि जब आप किसी भी इंसान को उसके धर्म, नस्ल, बिरादरी, रंग, जेंडर या शक्लो-सूरत या लगातार प्रोपेगैंडे के बहकावे में आकर अपने से कमतर समझने लगते हैं तो फिर रेप हो कि अपहरण, लूटमार हो कि शोषण, या खड़े खड़े किसी की बेइज़्ज़ती...सब बहुत आसान हो जाता है.

लोकतंत्र का ढोल

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और जब आप सामने वाले को मानवता के मंडप से खींचकर अमानवीयता के दर्जे तक घसीट लाएँ तब किसी आदमी, गुट, समुदाय, कौम और देश को कुछ भी अपराध नहीं लगता. उस वक़्त हम सब कोई न कोई धार्मिक या सामाजिक कारण या नज़रिए के कपड़े पहनाकर अपनी आत्मा को मुक्त कर सकते हैं और सामूहिक जागरूकता को आराम से सुला सकते हैं.

इस समस्या का इलाज़ ढूंढे जाने तक आपको इजाज़त है कि मानवाधिकारों, लोकतंत्र, आज़ादी और बराबरी का ढोल पीटते रहें और एक फट जाए तो दूसरा उठा लें ताकि इसके शोर में सब दबा रहे.

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