तेज़ तर्रार सीईओ अपनाते हैं ये 7 तरीके

  • 20 मार्च 2015
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मार्च की शुरुआत में, मुझे काम के सिलसिले में एक सप्ताह सड़क पर ही बिताना पड़ा. ये एक सामान्य कामकाजी दौरा था. दो दिन में मैं तीन शहरों में रही, अगले दो दिन दो अन्य शहर में बिताए.

इस दौरान मैं कुछ बोर्ड मीटिंगों में शामिल हुई. कुछ जगहों पर टॉक्स दिए और कुछ निजी बैठकें भी हुईं.

इस दौरान कई लोगों से मिली और कार, ट्रेन, विमान, बोट और बस, इन सब में मैंने यात्रा की.

ऐसी यात्राएँ और इनके साथ ही काम, काफी चुनौती भरा होता है. हर बैठक से संबंधित दस्तावेज़ और ज़रूरी कागज़ात भी पास रखने मुश्किल होते हैं.

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अहम बात ये है कि मैं सड़क पर होते हुए भी कुछ सार्थक काम जारी रखना चाहती थी, क्योंकि डेडलाइन किसी का इंतज़ार नहीं करती.

यात्रा के बावजूद काम करते रहने की कला

जब काम पूरा करना हो तो आप ये नहीं कह सकते हैं कि 'मैं विमान में फंसी हुई हूं.' ज़ाहिर है यात्राओं के दौरान भी कुछ करते रहना एक कला है.

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ये वो हुनर है जो कठिन परिस्थितियों में भी आपके काम को प्रभावित नहीं होने देता.

मैं ऐसे 7 तरीकों का ज़िक्र कर रही हूं जिन्हें हम या कोई भी व्यस्त एक्ज़ीक्यूटिव यात्राओं के दौरान प्रोडक्टिव रहने के लिए अपनाता है.

1. सोशल मीडिया पर सोचकर शेयर करें

मुझे सोशल मीडिया खूब पसंद है, लेकिन मैं अपनी यात्राओं के बारे में सब कुछ इस पर शेयर नहीं करती.

इससे गोपनीय कारोबारी समझौतों की जानकारी सार्वजनिक होने की आशंका होती है, कई बार तो निजी सुरक्षा भी ख़तरे में होती है.

मैं कहीं जाने से पहले अपनी सोशल मीडिया साइट का लोकेशन डिसएबल कर देती हूं. ना ही इस दौरान कोई ट्वीट करती हूं.

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कामकाजी यात्रा के दौरान फ़ेसबुक या लिंक्ड इन पर अपडेट नहीं करती हूं. इससे कंपनी के समझौते और बातचीत को लेकर गोपनीयता भंग हो सकती है. कई बार तो मैं उस शहर में रह रहे अपने दोस्तों तक को अपनी यात्रा के बारे में नहीं बताती.

2. बैठकें यात्रा के दौरान भी संभव

कई बार मौका मिलने पर कहीं भी बैठक करनी पड़ती है. मान लीजिए मैं रोम के लिए उड़ान पकड़ने वाली हूं, जबकि मुझे म्यूनिख में किसी से मिलना हो तो कुछ घंटे के लिए म्यूनिख एयरपोर्ट पर ही मीटिंग करने की कोशिश करती हूँ.

कुछ महीने पहले, मुझे दो लोगों से मिलना था जो ख़ुद भी फ़्लाई कर रहे थे. तो हमने तय किया कि फ़्रैंकफ़र्ट एयरपोर्ट पर ही मिल लेते हैं.

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मैंने दोनों लोगों से फ़्रैंकफ़र्ट एयरपोर्ट पर ही कुछ घंटे कि लिए मीटिंग की और फिर हम अपने अपने रास्ते निकल गए.

3. भीड़ के बीच एकांत में काम

मैं शोर का असर काम पर नहीं पड़ने देती. शोर बंद करने वाले ईयर फोन या ईयर प्लग लगा लेती हूं. कोई ये सुनना पसंद नहीं करता कि मैं पड़ोसियों की गपशप या फिर होटल के कमरे के बाहर चल रही पार्टी के शोर के कारण काम पूरा नहीं कर पाई.

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मुझे हर परिस्थिति में काम करने का माहौल बनाना होता है. ट्रेन का इंतज़ार करते हुए लाउंज में किसी वीडियो के लिए वायस ओवर रिकॉर्ड करने के लिए मैं अपने सिर पर कोट डाल लेती हूं.

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कोट के अंदर मोबाइल रिकॉर्डिंग सिस्टम कुल मिलाकर रिकॉर्डिंग स्टूडियो की तरह काम करते हैं. हालांकि आपको ये ख्याल रखना होगा कि आप सार्वजनिक जगह पर काम कर रहे हैं और ज्यादा तेज आवाज़ में बातचीत से नुकसानदेह हो सकता है.

4. एक्सटेंशन कॉर्ड

मैं हमेशा एक्सटेंशन कॉर्ड अपने साथ रखती हूं. मैं एक बार ऐसे होटल में ठहरी जहां केवल बाथरूम में प्लग लगाने की जगह थी.

ज्यादातर ट्रेनों में एक सीट के पास एक ही प्लग होता है. मेरे पास चार्ज करने के लिए तीन डिवाइस होते हैं.

मैं एक्सटेंशन कॉर्ड के साथ मल्टीनेशनल कन्वर्टर लेकर चलती हूं.

5. सब कुछ मेल पर

मैं कामकाजी यात्राओं के दौरान कोई कागज-पत्र नहीं रखती. मैं सबसे अनुरोध करती हूं कि मुझे ईमेल करें या लिंक भेजें. मैं डाउनलोड कर लेती हूं.

पिछली यात्रा के दौरान मेरी कई बोर्ड और कमेटी मीटिंग्स थीं और यदि मैं उनके पेपर साथ ले जाना चाहती तो मुझे दूसरा सूटकेस उठाने की जरूरत पड़ती.

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अब बोर्ड मीटिंग में बड़ा बदलाव आ गया है, सब कुछ इलेक्ट्रानिक ढंग से उपलब्ध है. जब मुझे कोई पेपर या दस्तावेज़ इलेक्ट्रानिक ढंग से नहीं मिलता तो मैं फ़ोन से उसकी तस्वीर ले लेती हूं. उसे मैं अपने नोट के तौर पर ठीक से इस्तेमाल करती हूं.

सब कुछ पासवर्ड के जरिए सुरक्षित होता है और जिन डिवाइस पर फ़िंगरप्रिंट पहचान की सुविधा उपलब्ध हो, मैं उन डिवाइस पर इस सुविधा का इस्तेमाल करती हूं.

6. इलेक्ट्रॉनिक बैकअप

क्लाऊड मेरे जैसे लोगों के लिए वरदान साबित हुआ है. सूचनाओं की फाइल खोने का डर मुझे सताता रहता है. इसलिए मैं अलग अलग बैकअप सिस्टम का इस्तेमाल करती हूं. मैं नोट्स लेने के लिए इवरनोट का इस्तेमाल करती हूं.

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बोर्ड मीटिंग से संबंधित जानकारियों को भी मैं इवरनोट पर और वन ड्राइव में रखती हूं. मैं ड्रॉपबॉक्स का भी इस्तेमाल करती हूँ. कई बार ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स को ख़ुद को ईमेल भी कर लेती हूं ताकि वो मेरे फिंगरटिप्स पर हों.

7. प्रस्थान का ध्यान

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एक बार मैंने अपनी फ़्लाइट फ्लाइट मिस कर दी. मैं एयरपोर्ट लाउंज में काम करती रही, फ्लाइट का ध्यान ही नहीं रहा. अब मैं अपने एपॉन्टमेंट के हिसाब से सुबह ही पूरे दिन के अलार्म लगा देती हूं.

मुझे कब होटल से निकलना है, कब मीटिंग से निकलना है...इससे मुझे अगले काम के लिए ज्यादा वक्त मिल जाता है. इसके चलते मुझे बार-बार फोन या घड़ी नहीं देखनी पड़ती है, जिसे मीटिंग के दौरान बुरा माना जाता. और, मैं समय समय पर अपने सभी काम पूरे कर पाती हूँ.

(लुसी मार्कस पुरस्कार विजेता लेखिका हैं, बोर्ड चेयरमैन हैं और कई संस्थाओं की गैर-कार्यकारी निदेशक हैं. वे मार्कस वेंचर कंसल्टिंग की सीईओ भी हैं)

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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