अफ़ग़ान मर्द होने पर मैं क्यों शर्मिंदा हूँ?

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अफ़ग़ानिस्तान में फ़रखंदा को पीट-पीटकर मारने और फिर उसे जलाए जाने की घटना के चार दिन हो गए हैं और मुझे नींद नहीं आ रही है.

मुझे गुस्साई भीड़ का शोर और खून से लथपथ और जली हुई महिला की तस्वीर जगाए हुए है.

काबुल के मेरे गृह नगर से हज़ारों मील दूर फ़रखंदा पर उन्मादी भीड़ का हमला हुआ था, लेकिन इन हिंसक दृश्यों ने मेरा लंदन तक पीछा नहीं छोड़ा.

अपराध बोध

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पुरुष होने की वजह से शायद मुझमें अपराध बोध का भाव आ गया है.

अाखिर सभी युद्धों के कर्ताधर्ता तो मर्द ही हैं. या इस अपराध बोध की वजह मेरा अफ़ग़ानी मर्द होना है.

मेरे देश के किसी न किसी कोने में महिलाओं के ख़िलाफ़ इसी तरह की वारदात होती रहती है.

फ़रखंदा ने शाह दू शमशेर (यानी, दो बादशाहों की तलवार) मज़ार की सरज़मीं पर जब अपने पैर रखे थे, उसके कई हफ़्ते पहले ही मैं काबुल छोड़ चुका था.

यह शहर के बीचोंबीच क़ाबुल नदी के किनारे बहुत ख़ूबसूरत इमारत है. राष्ट्रपति भवन और मुख्य बाज़ार भी पास ही है.

मज़ार पर मन्नत!

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यहां लोग मन्नत मांगने और किसी समस्या के हल के लिए फ़ीता बांधने आते हैं. क़ाबुल छो़ड़ने से पहले, मैं भी कैलीफ़ोर्निया में रहने वाली अपनी एक दोस्त की तरफ से फ़ीता बांधने मज़ार पर गया था. उसने मुझे एक तस्वीर लेने और इसे भेजने को कहा था.

मैं सीढियां चढ़ते हुए जब ऊपर पहुंचा तो वहां औरतों के एक समूह पर मेरा ध्यान गया. यह बुधवार का दिन था. पूरे देश भर में औरतें इस पारम्परिक दिन मज़ारों पर जाती हैं.

यहां कपड़ों से ढंकी चार मीनारों में से एक पर मैंने चमकते हुए पॉलीस्टर का धागा बांध दिया.

मज़ार के ऊपर और अंदर दीवारों पर रंग बिरंगे ढेर सारे कपड़े बंधे थे.

भीड़ के शोर में अपनी आवाज़ को तेज़ करते हुए, एक अधेड़ औरत ने मुझसे पूछ ही लिया, “तुमने क्या मन्नत मांगी है?”

पर मैंने टालते हुए कहा, “खाला! मन्नत तो गोपनीय होती है.”

ताबीज़ का कारोबार?

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वहां से निकलते वक़्त मैंने गौर किया कि औरतों के पास बैठे लंबी दाढ़ी और सफ़ेद पगड़ी बांधे दो बुज़ुर्ग एक काग़ज़ पर कुछ लिख रहे थे.

पर यह भी कोई अजीब बात नहीं थी और ऐसा तो होता ही रहता है कि महिलाएं अपनी घरेलू समस्याओं को हल करने, पतियों की सेहत की दुआ मांगने, सेना में अपने बेटों को सुरक्षित रखने या अपनी बेटियों के लिए अच्छे पति तलाशने के लिए ऐसे लोगों के पास आती हैं.

और कम पढ़े लिखे मुल्ला ताबीज़ बेच कर कुछ पैसे कमा लेते हैं.

अफ़ग़ानिस्तान के सोशल मीडिया और टेलीविज़न पर इसे लेकर ज़ोरदार बहस छिड़ी हुई है. यह तर्क दिया जा रहा है कि यह इस्लाम का दुरुपयोग तो है ही, धोखाधड़ी भी है.

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धार्मिक मामलों में ग्रैजुएशन करने वाली फ़रखंदा भी इन आलोचकों में से एक थी. उसने एक क़दम आगे बढ़ कर मीडिया में इसका विरोध भी किया था.

वास्तव में उन्होंने निःसंतान महिलाओं को तावीज़ बेचने वाले मुल्लाओं का विरोध भी किया था.

बहस के दौरान ही उस पर क़ुरान जलाने का आरोप लगा दिया गया. ऐसा लगता है कि भीड़ ने यह सुना और उस पर हमला बोल दिया.

मर्द क्या कुछ कर सकते हैं, फ़रखंदा ने इसे आंकने में ग़लती की थी. पुरुष किसी महिला को बेवकूफ़ ही नहीं बना सकते, वे पुलिस की मौजूदगी में उसकी जान भी ले सकते हैं.

अौरत होेने का दर्द

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मज़ार के बाहर हमेशा ही नौजवान मर्दों की भीड़ लगी रहती है. वो महिलाओं को ताकने और इस उम्मीद में यहां आते हैं कि शायद किसी से उनकी नज़रें दो चार हो जाए.

फ़रखंदा की हत्या के मामले में अभी तक 20 लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया है. इनमें कई युवा और आधुनिक शहरी मर्द हैं. इनमें से कई के फ़ेसबुक अकाउंट हैं, जिन पर उन्होंने हत्या की ज़िम्मेदारी का दावा किया है.

मेरे समेत कई अफ़ग़ानों के लिए यह परेशान करने वाली बात है कि इस तरह के युवा लोग अचानक ख़ुद को क़ुरान के दिग्भ्रमित रक्षक के रूप में तब्दील कर सकते हैं और इस तरह की घृणित हिंसा कर सकते हैं.

एक युवा जान दर्दनाक ढंग से ख़त्म कर दी गई. यह उस देश में हुआ है जहां लोगों में मज़हब की समझ बहुत अच्छी नहीं है, जहां विद्वान लोग कई बार केवल वापस लेने के लिए ज़ल्दबाजी में फ़ैसले ले लेते हैं.

यह वह समाज है, जहां पुलिस बल भ्रष्ट और अयोग्य है और जहां औरतों की तक़लीफ़ें ख़त्म होने के कोई आसार फ़िलहाल नहीं दिखते.

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