'यस, वी कैन भइया, कोई मौका तो दे'

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जाने आपमें से कितनों ने बॉलीवुड की फ़िल्म 'फंस गए रे ओबामा' देखी होगी.

फ़िल्म के पहले ही सीन में यूपी के एक गांव के लोग ज़मीन पर बैठकर टीवी पर ओबामा की तकरीर सुन रहे थे.

जब ओबामा ने कहा 'यस वी कैन' तो यह तकरीर देखने वाले किसान ने पास में बैठे स्कूली बच्चे से पूछा कि ओबामा क्या कह रहे हैं.

बच्चे ने बताया कि ओबामा कह रहे हैं कि हम कर सकते हैं.

किसान ने अपनी मुट्ठी भींचकर एक अद्भुत इशारा करते हुए कहा कि कर तो हम भी सकते हैं.

परफॉर्मेंस

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और कराची में इस वक्त चल रहे अंतरराष्ट्रीय थिएटर फेस्टिवल में यह वाकई नज़र आ गया कि कर तो हम सकते हैं.

दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा (एनएसडी) के छह लड़के-लड़कियों और कराची के नेशनल एकेडमी ऑफ़ परफॉर्मिंग आर्ट (नापा) के इतने ही लड़के-लड़कियों ने एक ही मंच पर डेढ़ घंटे की एक जैसी परफॉर्मेंस दी.

ये लोग इससे पहले कभी एक-दूसरे से ज़िंदगी में नहीं मिले मगर सब ने मिलकर चार दिन के अंदर ख़ुद ही यह नाटक लिखा, डायरेक्शन संभाली और सोलह-सोलह घंटे रिहर्सल की.

और जब दो दिन परफॉर्म किया तो खड़े होने की भी जगह ना थी.

कहानी

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Image caption टोबा टेक सिंह मंटो की मशहूर कहानी है.

कहानी इस नाटक की यह है कि एक ऐसे माहौल में जहां सब कुछ उलटा हो रहा है और कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं, कराची की एक लड़की का रिश्ता दिल्ली के एक लड़के से तय कर दिया गया है लेकिन दोनों ही यह अंधी शादी करने को तैयार नहीं.

लड़की, लड़के को साफ-साफ कहती है कि ये शादी आत्महत्या जैसी होगी और हमारा हाल ही भी मंटो के टोबा टेक सिंह की तरह हो जाएगा.

लड़का कहता है निश्चिंत रहो हम नहीं करेंगे यह शादी. फिर दोनों गहरी सोच में डूब जाते हैं.

अचानक लड़की कहती है कि हम दोनों ने अपने-अपने मन की बात एक-दूसरे से बिल्कुल नहीं छुपाई तो क्यों ना अब शादी कर ले.

मुझे लगता है कि सच्चाई के सहारे यह रिश्ता चल सकता है. शायद हम ख़ुद को या एक-दूसरे को धोखा देने की काबिलियत ही नहीं रखते और फिर लड़का यह दलील भी मान जाता है.

मेरी तरह आपको भी शायद यह कोई घिसी-पिटी आम सी फ़िल्मी कहानी लग रही होगी लेकिन हममें से कौन है जिसकी कहानी खास हो.

इंतज़ार और वापसी

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हां, एक खास कहानी है और वे यह है कि एनएसडी की यह मंडली वक्त पर वीसा ना आने की वजह से अटारी बॉर्डर पर लंबा इंतज़ार करने के बाद वापस दिल्ली लौट गई.

लेकिन कराची वालों ने उम्मीद नहीं छोड़ी और वीसा की आस में फेस्टिवल एक हफ़्ते और बढ़ा दिया.

वीसा मिल तो गया लेकिन एक साथ स्क्रिप्ट और रिहर्सल के लिए तीन दिन और दो रातें ही हाथ आईं.

लेकिन दिल्ली और कराची के इन लड़के-लड़कियों ने यह चैलेंज भी मंजूर कर लिया और सिर्फ 72 घंटों में नाटक पूरा कर लिया.

यस वी कैन भइया पर कोई मौका तो दे, हां तो बोले.

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