कितनी गहरी होगी इंसानी हाथों से बनी सुरंग?

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मानव इतिहास में स्थापत्य कला के बेहतरीन और दिलचस्प नमूने प्राचीन काल से मिलते रहे हैं.

चाहे वो मिस्र के पिरामिड हों, या फिर वेटिकन सिटी में सेंट पीटर्स बेसलिका की इमारत या फिर आगरा का ताज महल हो. सबके सब ख़ूबसूरती के प्रतीक हैं.

इनकी मौजूदगी से हमें मालूम होता है कि लोगों ने किस तरह की चीज़ें तैयार की थीं.

लेकिन प्राचीन काल में लोगों ने हाथ के इस्तेमाल से ज़मीन के कितने नीचे तक खुदाई करने में कामयाबी हासिल की थी, इसके बारे में कम ही जानकारी है.

हमारी खास़ सिरीज़ पृथ्वी के केंद्र की यात्रा के दौरान हमने इन उपलब्धियों का ज़िक्र किया है, जिसके बाद कई लोगों ने हमसे सवाल पूछे कि हमारे पूर्वजों ने ज़मीन के अंदर सबसे अधिक, कितने मीटर तक की खुदाई करने में कामयाबी हासिल की थी.

सुरंग में बसा शहर

अगर ख़ूबसूरती और स्थापत्य के लिहाज से देखें तो प्राचीन शहर डेरिनक्यूयू में हाथ की खुदाई वाली अद्भुत सुरंग मिली थी.

तुर्की के इस शहर में इस सुरंग के लिए क़रीब 60 मीटर यानी 196 फीट की खुदाई हुई थी.

इस भूलभूलैया भरी सुरंग में करीब 20 हज़ार लोग रहते थे. उनके घर, शराब के ठेके और स्कूल भी मौजूद थे.

दरअसल ये सुरंग पांच स्तरों पर बनी थी और सबसे निचले स्तर पर चर्च बनाया गया था.

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Image caption एक सुरंग जो था भूमिगत नगर, जिसमें 20 हज़ार लोग रहते थे

कापाडोकिया का क्षेत्र मुलायम और ज्वालामुखी की चट्टानों का था, लिहाज़ा लोगों ने 700 ईसा पूर्व सुरंग खोद कर एक शहर ही बसा लिया था.

इसके बाद 1870 के शुरुआती सालों में दक्षिण अफ्रीका के किम्बरली में क़रीब 50 हजार मज़दूरों ने हीरे की तलाश में 22 टन मिट्टी खोद दी.

यह सिलसिला 1914 तक जारी रहा. ऑपरेशन के बंद होने तक इन मज़दूरों ने 240 मीटर (790 फीट) का गड्ढा खोद दिया था.

इसे बिग होल के नाम से जाना जाता है. अब तक इसके बारे में माना जाता है कि यह हाथों के ज़रिए हुई सबसे गहरी खुदाई है.

एंपायर स्टेट जितनी लंबी खुदाई

ब्रिटेन के ब्राइटन के पास वूडिंगडीन वैल इंसानी हाथों के ज़रिए खोदी गई सबसे गहरी सुरंग है.

यहां 390 मीटर यानी 1285 फीट की खुदाई हुई जो उतनी गहरी है जितनी एंपायर स्टेट की इमारत ऊँची है. लेकिन यह बड़े गड्ढे जैसा नहीं लगता.

इस सुरंग के बनने की कहानी चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास का हिस्सा लग सकती है.

एक इंडस्ट्रियल स्कूल में पानी मुहैया कराने के लिए इसकी शुरुआत हुई थी. इसके लिए स्थानीय वर्कहाउस के लोगों को काम पर लगाया गया.

वर्कहाउस के मज़दूरों ने 24 घंटे काम कर, मोमबत्ती की रोशनी में चार फुट की चौड़ाई वाला गड्ढा खोदा और बाद में उनकी खुदाई जारी रही.

इन लोगों ने अंत में पानी निकालने में कामयाबी हासिल की.

लिफ़्ट से एक घंटे की दूरी

आज तकनीकी दुनिया काफी संपन्न हो चुकी है. विस्फोटकों और विशाल उपकरणों और बिजली से चलने वाली ड्रिलों की मदद से सैकड़ों फीट गहरी सुरंग खोदना आम बात हो चुका है.

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दक्षिण अफ्रीका के टाउटोना और मपोनेंग की खानों में पहाड़ों के अंदर 4 किलोमीटर की खुदाई की गई है.

लिफ्ट के ज़रिए सतह तक पहुंचने में एक घंटे का वक्त लगता है, जहां का तापमान 59 डिग्री सेल्सियस होता है.

खान के अंदर तापमान को सही रखने के लिए विशाल फ्रीजिंग प्लांट भी लगाए गए हैं.

दिलचस्प ये भी है कि उच्च तापमान, ऑक्सीजन की कमी वाली खानों की अंदर की परिस्थितियों से हमें पृथ्वी के वायुमंडल से बाहर के जीवन की संभावनाओं के बारे में संकेत मिलता है.

क्योंकि बाहर की परिस्थितियां भी कुछ ऐसी ही हैं. गहरी खदानों की स्थितियों से हमें ब्रह्मांड के बारे में जानकारी जुटाने में मदद मिल सकती है, क्योंकि ब्रह्मांड के बाहर की स्थितियां भी इसी तरह बिषम होती हैं.

बेहतर होती तकनीक की मदद से भूमिगत दुनिया में प्रवेश करने में दिक्कतें कम हुई हैं, अब वो काम मशीनें करने लगी हैं.

लेकिन अभी भी हम कुछ लोगों को नहीं रोक सकते. ये इंसानी फितरत है कि वह दुनिया के बारे जानने को उत्सुक होता है. पहाड़ों की ऊंचाईयों से लेकर पृथ्वी की गहराईयों तक...

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.

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