कभी टेम्स नदी बीमारियों की जड़ थी

  • 2 अप्रैल 2015
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लंदन के बीचों-बीच बहती नदी टेम्स को आज देखें तो यह यक़ीन करना मुश्किल है कि कभी यही ख़ूबसूरत टेम्स बीमारियों की जड़ हुआ करती थी.

वर्ष 1858 में हालात यहां तक पहुंच गए थे कि इससे निकली बदबू की वजह से संसद की कार्यवाही रोकनी पड़ी थी.

टेम्स को एक तरह से मृत नदी घोषित कर दिया गया था. इसके बाद सरकार ने सीवेज ढांचे में भारी निवेश किया और प्रदूषण से निपटने के लिए कड़े क़दम उठाए.

अकेले टेम्स ही नहीं दुनिया की कई नदियां ऐसे ही साफ़ की गईं हैं. जैसे जर्मनी में राइन, दक्षिण कोरिया में हान और अमरीका में मिलवॉकी.

कड़े क़ानून

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इन नदियों की सफ़ाई के पीछे अहम बात थी- राजनीतिक इच्छाशक्ति और कड़े क़ानून.

ब्रिटेन में वॉटरएड के 'पॉलिसी एनालिस्ट' टिम ब्र्यूअर का कहना है, ‘‘50 साल तक सीवरेज ट्रीटमेंट और उसे नदी में जाने से रोकने का नतीजा है कि टेम्स के पानी की गुणवत्ता सुधरी है. मगर अब भी हमें नदी को साफ़ रखने के लिए अपने सिस्टम में सुधार की ज़रूरत है.’’

भारतीय नदियां

टेम्स के उलट हालात हैं भारत में गंगा नदी के. 80 के दशक में सरकारें गंगा की सफ़ाई के लिए करोड़ों रुपए बहा चुकी हैं. मगर कुछ नहीं बदला. ज़्यादातर शहरों और क़स्बों में कचरा हटाने की सुविधा ही नहीं है.

हालात इतने ख़राब हैं कि टॉयलेट का गंदा पानी और औद्योगिक कचरा सीधे नदियों में जा रहा है. तमिलनाडु के त्रिची में सीवरेज का पानी साफ़ होता है, तब भी उसका इस्तेमाल खेती में नहीं हो सकता.

तिरुचिरापल्ली सिटी कॉर्पोरेशन के चीफ़ इंजीनियर ई चंद्रन के मुताबिक़ ‘‘नई टेक्नोलॉजी मौजूद है जो कम जगह लेती है, पर उसके रखरखाव की लागत बेहद ज़्यादा है. 10 लाख लीटर पानी साफ़ करने के लिए कम से कम एक करोड़ रुपए चाहिए.’’

यानी 10 लाख की आबादी वाले त्रिची नगर निगम का कुल बजट भी लगा दें, तो भी इस पैसे से शहर में दो दिन में पैदा हुआ कचरा साफ़ नहीं किया जा सकता.

कावेरी

कावेरी के पानी की गुणवत्ता पिछले सालों में काफ़ी खराब हो चुकी है.

बिशप हैबर कॉलेज के पर्यावरण विज्ञान विभाग की डॉ एस कलावती का कहना था, ‘‘कावेरी नदी कुछ हद तक प्रदूषित है. मतलब यह कि इसका पानी पिया नहीं जा सकता. मगर इसका इस्तेमाल खेती में हो सकता है.’’

दूसरी तरफ़ पश्चिमी जगत में तकनीक उस जगह आ गई है कि अब मानव मल से भी साफ़ पानी निकालना संभव हो गया है.

प्रदूषण के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे लोगों के मुताबिक़ सिर्फ़ सही तकनीक में पैसा लगाने और गंदगी फैलाने वालों पर नकेल कसने से ही भारतीय नदियों का पानी पीने लायक बनाया जा सकता है.

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