अगर बॉस आपसे झूठ बोलने को कहे...

  • 8 अप्रैल 2015
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कामकाजी दुनिया में ऐसी भी नौबत आती है जब आपके बॉस आपसे झूठ बोलने को कह सकते हैं. ऐसी सूरत में आप क्या करेंगे?

बीबीसी कैपिटल में हर पखवाड़े छपने वाले कॉलम वर्क एथिक्स में इस बार इसी मुद्दे का हल तलाशने की कोशिश की गई है.

मान लीजिए की आप एक स्कूल में काम करते हैं. 60 बच्चों का एजुकेशनल ट्रिप होना है. लेकिन मात्र 16 पेरेंट्स इसके लिए तैयार हैं. स्कूल का प्रिंसिपल आपसे कहता है कि बुक किए सेंटर को ये ना बताएं कि कम बच्चे आ रहे हैं, नहीं तो बुकिंग कैंसल हो जाएगी.

वह ज्यादा पेरेंट्स को राज़ी करने की कोशिश कर रहा है. 16 पेरेंट्स को भी जानकारी नहीं देनी है, क्योंकि अगर मात्र 16 बच्चे ही ट्रिप पर जाते हैं तो 60 बच्चों की बुकिंग का खर्च उन्हें ही चुकाना होगा, जो महंगा पड़ेगा. ना ही स्कूल दूसरे ट्रिप की व्यवस्था करने की स्थिति में है.

तो क्या आप जानकारी छिपाकर और झूठ बोलकर काम चलाएँगे या फिर कुछ और करेंगे. आख़िर आपको करना क्या चाहिए?

सूचनाओं को छिपाना

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यहां मसला पारदर्शिता का है. आपका बॉस आपसे सूचनाएं छिपाने को कह रहा है, लेकिन इससे कई लोगों का नुकसान संभव है. ये स्थिति केवल स्कूली शिक्षकों की नहीं है.

(पढ़ें- कम समय में ज़्यादा काम करने की तरकीब)

हममें से कई लोगों को कामकाजी दुनिया में कटु सच्चाई छिपानी पड़ती है. लेकिन ज्यादातर मामलों का हल एक जैसा ही है.

ऐसे मामलों की विशेषज्ञ हैं बोस्टन लॉ कॉलेबोरेटिव की कार्यकारी निदेशक इसरेला ब्रिल कास.

ईमेल से भेजे जवाब में वे कहती हैं, "कारोबारी बातचीत का एक नियम है कि आपको झूठ नहीं बोलना चाहिए. इससे आपकी साख को नुकसान हो सकता है. नुकसान ऐसा भी हो सकता है जिसको लंबे समय तक बाद में दुरुस्त नहीं किया जा सके."

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प्रिसिंपल सच्चाई पर पर्दा डालने को कह रहा है. ट्रिप पर जाने के लिए ज़्यादा बच्चे तैयार नहीं हुए हैं, इससे बुकिंग सेंटर और पेरेंट्स दोनों प्रभावित हो सकते हैं. यह नैतिकता का उल्लंघन है. ब्रिल कास के मुताबिक आपको अपने बॉस का साथ नहीं देना चाहिए.

कास बताती हैं, "ऐसी स्थिति में आपकी नौकरी ख़तरे में आ जाएगी. हो सकता है आपको नोटिस मिल जाए. लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि आपको जो सही लगे वही आपको करना चाहिए. कम से कम बच्चों के पेरेंट्स को पूरी बात मालूम होनी चाहिए."

नौकरी का ख़तरा

ब्रिल कास ये भी चेतावनी देती हैं कि अगर आप अपनी नौकरी नहीं छोड़ना चाहते हैं तो आपको अपने बॉस के फ़ैसले का सम्मान करना चाहिए. इसलिए आपको सावधानी से काम करना चाहिए पर आपको अपने नैतिक दायित्व का भी बोध होना चाहिए.

अगर आप सीधे सीधे अपने बॉस के निर्देश की अवहेलना करते हैं तो इसकी क़ीमत चुकाने के लिए भी आपको तैयार होना होगा.

इसलिए सबसे बेहतर यह है कि आप अपने बॉस को प्रभावित करने की कोशिश करें और प्रिंसिपल से बात करके उन्हें अपने विचारों से अवगत कराएं. नैतिक दबाव बनाते हुए, कहें कि आपकी संस्था की प्रतिष्ठा ख़तरे में आ सकती हैं.

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ब्रिल कास के मुताबिक आपकी सबसे बड़ी चिंता पेरेंट्स की होनी चाहिए क्योंकि उन्हें पहले से तय रकम से ज्यादा रकम चुकानी पड़ सकती है.

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वैसे इस समस्या का एक हल हो सकता है- स्कूल प्रबंधन बाक़ी बचे पैसों का भुगतान कर सकता है ताकि पेरेंट्स पर अतिरिक्त बोझ न पड़े. अगर आपने इस समस्या का हल नहीं तलाशा, तो आप बच्चों के परिवारों के भरोसे का कत्ल कर रहे हैं. यह स्कूल के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है.

ब्रिल कास कहती हैं, "बिना नोटिस के नई परिस्थितियों की जानकारी देने पर पेरेंट्स अपने बच्चों को ट्रिप पर भेजने से भी इनकार कर सकते हैं या फिर बच्चे को भेजने के बाद ज़्यादा पैसे देने से इनकार कर सकते हैं."

अगर आपने गोपनीयता से जानकारी पेरेंट्स को दे दी तो आपका नैतिक दायित्व पूरा हो जाता है.

नैतिकता का बोध

स्कूल को पेरेंट्स को यह अधिकार देना चाहिए कि वे अतिरिक्त खर्चे के साथ अपने बच्चे को ट्रिप पर भेजना चाहते हैं या नहीं, इसका फैसला करें. बुकिंग सेंटर को भी बताना चाहिए कि ट्रिप में कम छात्र होंगे. वे बची जगह का दूसरा इस्तेमाल कर सकते हैं.

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यह सबके हित में होगा, लेकिन इससे स्कूल की साख बढ़ेगी.

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ब्रिल कास कहती हैं, "पारदर्शिता के अभाव में बदली हुई परिस्थितियों को गोपनीय बनाए रखने से स्कूल आउटडोर सेंटर, छात्रों और पेरेंट्स सबके साथ अपने रिश्ते को नुकसान पहुंचा सकता है."

यह नुकसान स्कूल ट्रिप रद्द करने से होने वाले नुकसान से कहीं ज्यादा है.

वैसे अपने बॉस के लिए झूठ बोलने से आपके करियर पर और आपके नैतिक मूल्य दोनों प्रभावित होंगे.

ब्रिल कास कहती हैं, "अगर आपसे एक बार झूठ बोलने को कहा गया, तो फिर किसी मोड़ पर दोबारा भी कहा जाएगा. अगर आपने पहली बार झूठ बोल दिया है तो दूसरी बार इनकार करना और नैतिक मूल्यों की दुहाई देना कहीं ज़्यादा मुश्किल होगा."

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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