चीन के चाउ को 67,980 अंकों का नंबर कैसे याद?

  • 8 अप्रैल 2015
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आपके और हमारे मस्तिष्क में कितनी मेमोरी जमा हो सकती है? क्या किसी दिन डिजिटल कैमरा की तरह हमारा मेमोरी कॉर्ड फ़ुल हो सकता है? आप और तस्वीरें, घटनाएँ, सूचनाएँ याद करना चाहें, और दिमाग सिगनल दे - 'मेमोरी फ़ुल, कुछ फ़ाइलें डिलीट करें.'

हममें से कई लोग सरल से फ़ोन नंबर, शॉपिंग लिस्ट ही याद नहीं रख पाते हैं. ऐसे में 67, 980 अंकों को याद रखना कितना मुश्किल होगा?

चीन के 24 साल के चाउ लू ने 2005 में पाई (π) के मान को इतनी बड़ी संख्या तक, 24 घंटे तक बिना ब्रेक लिए सुनाया. इस ग्रेजुएट स्टूडेंट ने ऐसा करके वर्ल्ड रिकॉर्ड बना दिया.

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आरलैंडो सेरेल जब दस साल के थे, तो उनके सिर के बायीं ओर बेसबाल से चोट लगी. इसके बाद अचानक उन्हें कई लाइसेंस प्लेट के नंबर याद आने लगे. दशकों पहले किसी साल की ख़ास तरीख को क्या दिन रहा होगा, कौन सा सप्ताह रहा होगा, ये सब वे आसानी से बताने लगे.

तो इन लोगों ने क्या अपने दिमाग के साथ कुछ ख़ास किया, कोई विशेष प्रशिक्षण पाया, कि आम इंसान इनके सामने अपने दिमाग और याददाश्त के बारे में शर्मिंदा महसूस करने लगता है.

और, ये तथ्य हमें अपने ब्रेन की कैपेसिटी के बारे में क्या बताते हैं?

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तंत्रिका विज्ञान के चिकित्सकों ने इंसानी दिमाग की अधिकतम स्टोरेज क्षमता मापने की बहुत कोशिश की है लेकिन ऊपर दिए गए उदाहरणों से स्पष्ट है कि इसका कोई सरल जवाब नहीं है.

ऐसी कोशिशों को इंसानी दिमाग अपने चौंकाने वाले कारनामों से और मुश्किल बना देता है.

टनों के हिसाब से स्पेस है

वैसे मस्तिष्क की मेमोरी कैपेसिटी का कोई ना कोई आधार तो होता है, जो दिमाग की फिज़ियोलॉजी पर निर्भर करता है. मोटे तौर पर अनुमान है कि हमारा मस्तिष्क करीब 100 अरब तंत्रिकाओं से बना हुआ. इसमें केवल एक अरब तंत्रिकाएं हमारे मेमोरी स्टोरेज का ख्याल रखती हैं. इन्हें पिरामिडल सेल्स कहते हैं.

लेकिन इससे ये अंदाजा नहीं लगाना चाहिए कि एक तंत्रिका कोशिका से एक यूनिट मेमोरी बनती होगी. नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर पॉल रेबर कहते हैं, "अगर मेमोरी उतनी ही होगी जितनी तंत्रिका कोशिकाएं हैं, तो फिर वह बड़ी संख्या नहीं है और इस तरह तो हमारे दिमाग में जगह कम पड़ने लगेगी."

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हालांकि शोधकर्ताओं का मानना है कि तंत्रिका कोशिकाओं और तंत्रिका तंत्र से मेमोरी का रिश्ता है. इसके मुताबिक प्रत्येक तंत्रिका हजारों तंत्रिका कोशिकाओं से जुड़ी होती है. रेबर के मुताबिक इसके ज़रिए स्टोरेज क्षमता बढ़ जाती है और पूरे मस्तिष्क को उपलब्ध होती है.

रेबर कहते हैं, "लॉज़िकल अनुमान से मेमोरी पेटा बाइट रेंज तक पहुंचती है. एक पेटा बाइट यानी इतनी स्टोरेज क्षमता की अगर आप एमपी3 सांग्स की फाइलें डाउनलोड करें तो 2000 साल तक कर सकते हैं. यदि तुलनात्मक रूप से डिजिटल कंप्यूटर के साथ इसे न भी देखा जाए, तब भी ये समझ लेना पर्याप्त है टनों टन स्पेस मौजूद है."

एक सवाल ये भी उभरता है कि क्या लोगों के पास सुपर मेमोरीज होती हैं या फिर अनोखे दिमाग होते हैं?

इसका सीधा सा जवाब है - 'नहीं.' चाहे वो पाइ की संख्या वाला रिकॉर्ड होल्डर हो या किसी दूसरी मेमोरी चैंपियनशिप का विनर, हर कोई आम इंसान जैसे ही होता है. हां, ये ज़रूर है कि वे अपने दिमाग को काफ़ी ज़्यादा प्रशिक्षण देकर सूचना स्टोर करने और उसे दिमाग से निकालने का अभ्यास देते हैं.

मेमोरी चैंपियनशिप के विनर क्या कहते हैं?

यूएसए मेमोरी चैंपियनशिप के विनर नेल्सन डेलिस कहते हैं कि मेंटल एथलीट बनने से पहले उनकी याददाश्त अच्छी नहीं थी.

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डेलिस बताते हैं, "प्रतिस्पर्धी मानसिक टेस्ट में भाग लेते रहने से उनकी मेमोरी बेहतर हुई. कुछ ही हफ़्तों के अभ्यास और कई बार उससे भी कम समय में, आप वो कारनामे करने शुरू कर देते हैं जो सामान्य आदमी को असंभव लगते हैं. हम सबमें ऐसा करने की स्किल और क्षमता होती है."

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कई साल पहले डेलिस ने मानसिक अभ्यास शुरू किया. उन्होंने ताश के पत्तों से शुरूआत की और 20 मिनट के अभ्यास में क्या कहाँ है, उसे याद कर लिया. अब जब ताश के पत्ते एक बार फेंटे जाते हैं, तो वो सभी 52 कार्ड को जानने में मात्र 30 सेकेंड लगाते हैं.

कार्ड काउंटिंग करने का डेलिस रोज़ाना पांच घंटे प्रशिक्षण लेते हैं. उन्होंने न्यूयार्क सिटी में इसी 29 मार्च को आयोजित यूएसए मेमोरी चैंपियनशिप 2015 में अपने ख़िताब की सफलतापूर्वक रक्षा की है.

याददाश्त बढ़ाना मुमकिन

दूसरे मेमोरी चैंपियंस की तरह, डेलिस ने मेमोरी बढ़ाने के लिए कई रणनीतियां अपनाईं. इसमें एक रणनीति मेमोरी पैलेस बनाने जैसी है.

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डेलिस बताते हैं - 'इमें अपने घर या सबसे परिचित घर की तस्वीर को दिमाग में लाना होता है जैसे कि वो घर जिसमें बचपन बिताया हो. फिर जिन भी बातों या चीज़ों को याद रखना हो, उनको तस्वीर की शक्ल में घर के दरवाज़े के पास या फिर किचन की टेबल पर, या अन्य जगहों पर रख दें.'

डेलिस कहते हैं, "आप पहले जगह के बारे में सोचते हैं फिर वहां स्थित सामान के चित्रों के बारे में, ये सब आपकी याददाश्त में शामिल होता चल जाता है."

इन तकनीकों की कामयाबी से ज़ाहिर है कि कोई भी अपनी याददाश्त क्षमता को बढ़ा सकता है, लेकिन उसके लिए अपने दिमाग पर काम करना होगा. लेकिन क्या आप बिना किसी अभ्यास के ऐसा कर सकते हैं?

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यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिडनी के सेंटर फॉर द माइंड के निदेशक एलन स्नायडर का उद्देश्य यही है. उन्होंने एक विवादास्पद बात कही है जिसके मुताबिक हम सभी के अंदर एक 'विद्वान' मौजूद है या फिर ऐसी बौद्धिकता होती है जो सही तकनीक के इस्तेमाल से संचालित होती है.

स्नायडर के मुताबिक ज्यादातर इंसानी दिमाग वैचारिक स्तर पर काम करते हैं, न कि छोटी-छोटी विस्तृत डीटेल को याद करके. हम ज़्यादातर पूरी तस्वीर से जो बनता है, उसे ही याद रखते हैं, उसके अलग-अलग हिस्सों को नहीं. हमारी मानसिक सोच को दर्शाने के लिए स्नायडर अपने साथियों के बीच प्रयोग करते हैं.

इस प्रयोग के दौरान वे अपने साथियों को खरीददारी के लिए एक लंबी लिस्ट देते हैं, जिसमें स्टीयरिंग व्हील, विंडशील्ड वाइपर, हेडलाइन इत्यादि शामिल हैं. लोगों के लिए इसे याद रखना खासा मुश्किल है लेकिन स्नायडर कहते हैं कि लोग इस लिस्ट को 'कार' के तौर पर याद रखते हैं, जबकि ये सब कार के असेंबल्ड पार्ट्स होते हैं.

दरअसल हमारे दिमाग का विकास कुछ इसी तरह हुआ है. उदाहरण के लिए शेर को देखते ही हमारा दिमाग उसके चेहरे और बाल के रंग को नहीं देखता, बल्कि एक सैकेंड से भी कम समय में, सबसे पहले ख़तरे के प्रति आगाह करता है, और भागने को कहता है.

लेकिन ज़्यादा बौद्धिक क्षमता के लोग एक एक चीज का बारीक विवरण पकड़ लेते हैं, लिहाजा़ वे हेडलाइट, वाइपर इत्यादि को अलग अलग याद रखते हैं.

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स्नायडर अपने प्रयोग में शामिल लोगों के दिमाग की बायीं तरफ़ एक मेडिकल डिवाइस फ़िट करते हैं, जो मैग्नेटिक फ़ील्ड पैदा करता है और दिमाग के उस हिस्से के काम को अस्थायी तौर पर रोक देता है. वे बताते हैं कि ऐसा होने के बाद, इन लोगों की ड्रॉइंग बेहतर हो जाती है, प्रूफ़ रीडिंग की क्षमता सुधर जाती है और गिनने की क्षमता में भी वृद्धि होती है.

हालांकि स्नायडर ने अब तक दीर्घकालीन यादाश्त के लिए कोई प्रयोग नहीं किया है. यही वजह है कि स्नायडर के दावों का कुछ वैज्ञानिक मज़ाक भी उड़ाते हैं लेकिन मस्तिष्क उत्तेजना के बारे में लोगों की दिलचस्पी बढ़ती जा रहा है. उनके प्रयोगों से ये भी ज़ाहिर होता है कि हमारा दिमाग हम लोगों को अचरज में डालता रहता है.

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वैसे एक बात तय है कि इंसानी दिमाग की अपनी एक सीमा है. यही वजह है कि हम सब कुछ याद नहीं कर पाते हैं. लेकिन नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर रेबर इस पहलू पर कहते हैं कि सब कुछ याद नहीं हो पाने से ये नहीं ज़ाहिर होता है कि हमारा दिमाग भर चुका है.

रेबर कहते हैं, "दिमाग के हार्ड ड्राइव में स्पेस की कोई कमी नहीं है, ये कमी डाउनलोड स्पीड के चलते हैं. दिमाग के पास इतनी तेजी से सूचनाएँ पहुंच रही हैं कि वो सबको दर्ज नहीं कर पाता है."

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.

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