नंबर बढ़ाओ चाहे ज़बान की बैंड बजाओ

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"हम जिन्हें वोट देकर संसद भेजते हैं, वे हमें मामू बनाते हैं." रेडियो पर किसी दिलजले की यह बात सुन कर मुझे 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' याद आ गई.

मुन्ना भाई फ़िल्म में एक मवाली किरदार है जो भले-चंगे लोगों का इलाज करता है. लेकिन ज़बान के मामले में उसने बैंड बजा दी है.

फ़िल्मों के डायलॉग सुनकर एफ़एम रेडियो के प्रेज़ेंटरों ने पंगा लेना सीखा- बातूनी की जगह पकाऊ कहने लगे, अहमक़ की जगह ढक्कन कहना शुरू कर दिया. इस तरह अब गानों के साथ ज़बान का बैंड बजाया जा रहा है.

भारत में रेडियो

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रेडियो पकिस्तान के पहले मुख्य निदेशक, जेडए बुख़ारी ने लिखा है कि भारत में जब रेडियो शुरू हुआ तो उन्हें अच्छी भाषा बोलने वाले लोगों की तलाश में क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े, कभी भाषाविदों के कदमों में बैठना पड़ा और कभी सीढ़ियां चढ़नी पड़ीं.

उनके दौर में रेडियो पर पुतरस बुखारी, मीरा जी, असरार उल हक मजाज़, एनएमआर असद, हफीज़ होशियारपुरी, कृष्ण चंदर और राजेंद्र सिंह बेदी जैसे लेखक और कवि रेडियो के लिए काम करत थे.

ख्वाजा हसन निजामी, डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन, मुंशी प्रेमचंद, मिर्ज़ा फ़रहतुल्लाह बेग और रशीद अहमद सिद्दीकी रेडियो पर नियमित रूप से बोलने आते थे.

अभी के दौर में रेडियो?

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नौजवान शायर फ़ारुख़ इज़हार एक रेडियो चैनल से जुड़े हैं. उनका कहना है कि वो जमाने गए जब रेडियो पर भर्ती के लिए सबसे पहले भाषा और उच्चारण देखा जाता था.

वे कहते हैं, "अब इसका नंबर सबसे आखिर में आता है. रेडियो जौकी अगर प्रोग्राम में 'हिट गया' और 'बजा दी' जैसे शब्द न कहे तो प्रोड्यूसर कहता है कि शो ठंडा गया."

फारुख़ इज़हार का कहना है कि चौबीस घंटे ट्रांसमिशन चलाना आसान काम नहीं. घंटे पूरे करने लिए हर तरह के लोग भर्ती कर लिए जाते हैं.

उन्होंने कहा, "रेडियो प्रेजेंटर पार्ट टाइम काम करते हैं. उनके पास रेडियो को देने के लिए कम समय होता है, भाषा ठीक करने के लिए समय कहाँ से लाएं."

चलताऊ गुफ़्तगू

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आफ़ताब इक़बाल अपने टीवी प्रोग्राम में ज़बान को बेहतर करने के लिए चंद मिनट देते हैं.

यह एक अच्छी कोशिश है लेकिन उन पर एतराज़ किया जाता है कि चार-छह मिनट के इस सुधार से पहले और बाद पैंतीस-चालीस मिनट तक चलताऊ गुफ़्तगू सब किए-कराए पर पानी फेर देती है.

आफ़ताब इक़बाल के चैनल में नुसरत अमीन एक सीनियर पद पर काम करते हैं.

उनका मानना है कि ज़बान में भाषाविद नहीं बल्कि. अक्सर कम पढ़े-लिखे लोग ही बदलाव करते हैं. सही शब्द 'मौसिम' है लेकिन जिन्हें नहीं पता वह 'मौसम' बोलते हैं और अब उसी का चलन है. आसिफ और आसिफ़ भी ऐसा ही उदाहरण है.

भाषा का स्वरूप

उन्होंनें कहा कि ज़बान का विकास पिछड़े तबकों में होता है और यह जानबूझ कर नहीं होता.

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उनका कहना है कि इलैक्ट्रानिक मीडिया के विकास से ज़बान में फर्क पड़ा है. पहले सौ साल में ज़बान जितनी बदलती थी, वह अब बीस साल में हो जाती है. 'पंगा' और 'ढक्कन' जैसे शब्दों पढ़े-लिखे लोग नहीं गढ़ सकते.

प्रमुख लेखक और प्रसारक आग़ा नासिर कहते हैं कि उनके दौर में भी नए शब्द गढ़े जाते थे लेकिन इसके लिए बहुत सोच विचार किया जाता था.

फ़ैज़ का दौर

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Image caption फ़ैज़ पाकिस्तान टाइम्स के संपादक हुआ करते थे.

आग़ा नासिर ने अपना करियर 50 के दशक में शुरू किया था. उन्होंनें बताया कि इस दौर में हर स्टेशन पर भाषा का स्वरूप का ख्याल रखने के लिए भाषा के जानकार रखे जाते थे.

रेडियो पाकिस्तान के प्रमुख जेडए बुख़ारी थे. मीडिया के प्रमुख कवि और साहित्यकार होते थे. जंग के संपादक सैयद मोहम्मद तक़ी थे.

पाकिस्तान टाइम्स के संपादक फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ थे. वो अंग्रेजी, अरबी, फ़ारसी यानी कई भाषाएँ जानते थे और उनकी अपनी भाषा मीठी थी.

वरिष्ठ संवाददाता मुबश्शिर अली ज़ैदी ने अपने ग़िरेबान में झांका. सूखी, फीकी लेकिन गज-भर लंबी ज़बान दिखाई दी.

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