पाकिस्तान की लता मंगेशकर फिर गा पाएगी?

अफ़गान संगीत

उन्नीस सौ नब्बे के दशक में अफ़ग़ान जंग ख़त्म होने से पहले पाकिस्तान का ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह प्रांत अफ़ग़ानिस्तान के कलाकारों और संगीतकारों की पनाहगाह हुआ करता था.

सिर्फ़ यही नहीं पेशावर उनके लिए रोज़ी रोटी कमाने का बड़ा ज़रिया भी था.

(देखेंः अफ़ग़ान लोक कलाकार जरसंगा का वीडियो)

पेशावर के स्थानीय और अफ़ग़ान संगीतकारों ने रुबाब से बंदूक उठाने तक का सफ़र कब और कैसे तय करना शुरू किया इस पर तो अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन सभी पूर्व राष्ट्रपति और फौजी जनरल ज़िया उल हक़ को दुआएं देते मिले.

गायक का कोर्ट मार्शल

पश्तो भाषा के ग़ज़ल गायक गुलज़ार आलम तालिबान की धमकियों और ख़ुफ़िया एजेंसियों से परेशान तो हैं, लेकिन डरते नहीं और न ही उन्होंने अपना शहर छोड़ा.

वह बताते हैं, "जो कुछ आज हो रहा है उसका बीज जनरल ज़िया के दौर में 1980 में बोया गया था. 1981 में जब मैं पाकिस्तान एयर फ़ोर्स में था तो मैंने एक शादी में क्रांतिकारी शायर गुलज़ार रहमत शाह साइल का क्रांतिकारी गाना गया था."

वहां किसी ने न सिर्फ़ उनकी आवाज़ में यह गाना रिकॉर्ड कर लिया, बल्कि इस्लामाबाद की शालीमार रिकॉर्डिंग कंपनी ने उसे जारी भी कर दिया.

ज़िया का दौर और क्रांतिकारी गाना किसी तराने की तरह गूंज उठा. इसके बाद न सिर्फ़ गुलज़ार आलम की पाकिस्तान एयर फ़ोर्स से नौकरी गई और कोर्ट मार्शल हुआ बल्कि ख़ुफ़िया एजेंसियां भी पीछे लग गईं.

उनके सरकारी रेडियो, टीवी पर भी कार्यक्रमों पर भी प्रतिबंध लग गया. यहां से उनके क्रांतिकारी सफ़र की कहानी शुरू हुई.

'पैसे कम थे, ख़ुशी ज़्यादा'

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कहते हैं कि किसी कौम को मारना हो तो उनके शरीर पर ज़ख़्म करने के बजाय उनके सौंदर्यबोध को ज़ख़्मी करना चाहिए.

ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह के ज़िला नौशेरा के एक छोटे से कस्बे बीर पियाइ में ईंटों के कच्चे-पक्के मकान में पश्तून महिला ज़रसंगा से हमारी मुलाक़ात हुई.

सिगरेट के कश लगाते हुए उन्होंने कहा, "अब पैसा ज़्यादा मिल जाता है, लेकिन गाने का मज़ा नहीं रहा. मैं पहले कम पैसे में भी ख़ुश थी, आज़ादी से गाती थी, खुलकर बैठती थी, टीवी-रेडियो के कार्यक्रम रिकॉर्ड करती थी मगर अब सुरक्षा इंतजामों ने सब बर्बाद कर दिया."

राजसी व्यक्तित्व वाली ज़रसंगा सिगरेट के धुएं में बेहद दिलचस्प लग रही थीं, मगर उन्होंने हाथ जोड़ कर इस पोज़ में तस्वीर खिंचवाने से इनकार कर दिया. और ज़ाहिर है क्यों?

लोगों का मानना है कि उन्नीस सौ नब्बे में जब बेनज़ीर भुट्टो के नेतृत्व में पीपीपी की सरकार आई तब कलाकारों के दिन बेहतर हुए.

ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह प्रांत में भी यह महसूस किया गया, लेकिन फिर सियासी उतार चढ़ाव से सब बदलना शुरू हो गया.

उम्मीद अभी बाक़ी है

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साल 2002 में ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह में मुत्ताहिदा मजलिस अमाल, एमएमए, की अल्पमत सरकार बनी और एक बार फिर कलाकारों के बुरे दिन आ गए.

कराची के मशहूर मनोवैज्ञानिक डॉ. हारून से मैंने पूछा, "पाकिस्तानी लोगों की दिक्कत क्या है, हमारे ज़ेहन की गलियां तंग क्यों हैं?"

इससे वह परेशान नहीं हुए बल्कि उम्मीद से भरे नज़र आए. उऩ्होंने कहा, "अगर हमारी फ़ौज का तालिबान के ख़िलाफ़ हालिया सैन्य अभियान 'ज़र्ब ए असब' क़ामयाब हो जाता है तो यह सब ज़्यादा दिन नहीं चलने वाला."

उनका कहना था कि अगर सियासी सोच बदले और लोकतंत्र कायम रहे तो रोशनी दूर नहीं, नज़दीक है.

डॉक्टर हारून की बातों से मुझे ऐसा महसूस हुआ कि जैसे पेशावर के मशहूर निश्तार हॉल में ज़रसंगा और गुलज़ार आलन ने कोई राग छेड़ा हो और लोग झूम रहे हों- उम्मीद की धुन पर.

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